राम के आदर्शों के मानक
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राम को वाल्मीकि ने मूर्तिमान धर्म कहा है, लिखा है- रामोविग्रहवान धर्म:। इसलिए धर्म को समझना हो, तो राम के स्वरूप, उनके चरित और उनकी स्थापित मर्यादाओं को समझना चाहिए। संसार में पहली बार जब रामकथा गाई या लिखी गई, तो उसका आरंभ तप और स्वाध्याय से हुआ। रामायण का आरंभ इन दो शब्दों से हुआ है। कहते हैं कि रामायण संसार की पहली कविता है और इसके रचयिता वाल्मीकि पहले कवि। जब आदिकाव्य में विग्रहवान धर्म का स्वरूप उकेरा गया, तो इसका कोई महत्व नहीं रह जाता कि चरितनायक ऐतिहासिक है या नहीं, उसका स्वरूप आख्यानों तक ही तो सीमित नहीं है। ध्यान रहे इतिहास ज्यादा से ज्यादा बुद्ध और महावीर तक जाता है, पर मनुष्य जाति और उसके अनुभव हजारों-लाखों साल पुराने हैं। इसलिए रामकथा के होने-न होने से ज्यादा महत्वपूर्ण है कि वह मनुष्य के जीवन और धर्म की व्याख्या करती है।
रामायण का अर्थ है राम का अयन अर्थात उनका मार्ग। हमारा यह जगत प्रतिक्षण गतिमान है। संसार का अर्थ तो 'सरति इति संसार' है ही। रामायण राम का गतिपथ है। उसमें जिन निष्कर्षों, मूल्यों और मर्यादाओं का मानवीकरण हुआ है, उन्हें मनुष्य के रूप में भगवान का उतर आना कहें, तो गलत नहीं होगा। उसका चित्रण मनुष्य जाति के अनुभवों का उत्कट निचोड़ ही है।
मनुष्य उन उद्देश्यों या प्रेरणाओं को साकार करने में लगा है, जो रामचरित के रूप में व्यक्त की गई हैं। उद्देश्य क्या थे? मनुष्य से नरोत्तम बनने और सर्वश्रेष्ठता की दिशा में अग्रसर होना। अपने भीतर छिपी संभावना और सुख-शांति की अभीप्सा को पूरा कर सकने की आकांक्षा। इस आकांक्षा की दिशा में बढ़ना, रामचरित इस मार्ग का संकेत है कि मनुष्य के स्वरूप को चरितार्थ करने और उससे ऊपर उठने और अपने भीतर निहित संभावनाओं को साकार करने का कोई शार्टकट नहीं हैं। कोई शार्टकट होता, तो वह सभ्यता के प्रारंभिक दिनों में ही पा लिया गया होता। पर मनुष्य के चित्त में आकुल व्यग्रता अभी उसे प्रस्थान बिंदु के ईर्दगिर्द ही खड़ा बताती है।
पारिवारिक, सामाजिक और राज्य के क्षेत्र में राम ने अपने आचरण और व्यवहार से ऐसे मानक स्थापित किए, जिनसे उन्हें मर्यादा पुरुषोत्तम कहा जाता है। उन मानकों में यह संभावना हमेशा निहित रही कि व्यक्ति का व्यवहार परिस्थिति के अनुसार भले बदलता रहे, लेकिन उसका अंतरंग स्थिर रहे। उन्हीं मूल्यों का प्रतिनिधित्व करे, जो शाश्वत हों, जो मनुष्य और समाज के लिए हमेशा उपयोगी और ऊंचा उठाने वाले हों। उदाहरण के लिए परिवार को ही लें, राम के समय से परिवार में अनुशासन, सबके प्रति विश्वास, एक-दूसरे के सुखों और इच्छाओं का निर्वाह और उनके लिए त्याग की भावना का महत्व रहा है। इन मूल्यों का निर्वाह रामचरित के हर प्रसंग में होता दिखाई देता है। क्षण भर में राज्याभिषेक के लिए तैयार होते-होते राम वल्कल वस्त्र पहन लेते हैं। सीता के प्रति उनके मन में अगाध विश्वास है, पर लोक मर्यादा के लिए उसे अग्नि परीक्षा देने के लिए कहते हैं।
निश्चित ही इन दिनों परिवार का ढांचा बदल रहा है, संयुक्त परिवार टूट रहे हैं और एकल परिवार बढ़ रहे हैं। कई जगह तो कामकाजी तकाजों के कारण पति-पत्नी और बच्चों के लिए भी अलग तरह से सोचना और व्यवस्था बनानी पड़ रही है। लेकिन इस दौर में भी रामयुगीन आदर्शों को निभाया जा सकता है। पारिवारिक स्तर पर राम का आदर्श-स्नेह, सहयोग, सद्भाव और विश्वास ही तो था। इसी आधार पर आपसी संबंधों, कर्तव्यों और दायित्वों को समझा-निबाहा जाता था। वह धर्म-मर्यादा निभाने में आज भी कोई कठिनाई नहीं होनी चाहिए।
पारिवारिक और व्यक्तिगत जीवन में राम ने जिन मर्यादाओं की प्रतिष्ठा की, उनका अनुकरण और निर्वाह इसलिए किया जा सका कि राम राजपुरुष थे। व्यक्तिगत जीवन में राम की शुचिता और निष्ठा ने उन्हें शीर्ष राजपुरुष के तौर पर प्रतिष्ठित किया। उन्होंने जहां जरूरी समझा, वहां पारिवारिक व्यवस्था में दखल भी दिया। शंबूक वध और एक कुत्ते के कहने पर भिक्षु को कालिंजर मठ का महंत बनाने जैसी छोटी-छोटी घटनाओं से लेकर सीता की अग्नि परीक्षा, फिर उन्हें वनवास भेजना, उससे भी पहले शूर्पणखा का अंग भंग, अहिल्या को पुनर्जीवन और प्रतिष्ठा आदि कई प्रसंग हैं, जिनमें वह परंपरा से हटकर काम करते हैं। यह सब करते हुए वह धर्म-मर्यादा की स्थापना करते हैं। यदि इन कामों को पारिवारिक और सांस्थानिक रचनाओं के भरोसे छोड़ा जाता, तो संभवतः पंचायतें, न्यायालय, दंडाधिकारी और इसी तरह का ढांचा भी उन्हीं नतीजों पर पहुंच जाता। लेकिन उन नतीजों पर पहुंचने में वर्षों लग जाते और न्याय की प्रक्रिया संपन्न होते-होते अर्थहीन व अनुपयोगी हो जाती।
राज्य के स्तर पर राम के स्थापित मानक हमेशा अनुकरणीय रहेंगे। राजा या शासक का काम होना चाहिए कि सुधार की प्रक्रिया शुरू करके व्यवस्था बना दे और बाकी काम समाज को स्वयं करने दे। पग-पग पर शासन का हस्तक्षेप राज्य और समाज को उसका मुखापेक्षी बनाता है और राजा या शासक भी निरंकुश होने लगता है। चित्रकुट में भरत को समझाते समय अथवा रामराज्य की स्थापना के समय राम इस बात पर जोर देते हैं कि राजा या शासन प्रमुख, अमात्य, राजधानी, देश, कोष, सेना और राज्य के शुभचिंतक किसी भी राज्य के सात आधार स्तंभ हैं। इन सातों में सामंजस्य रहे, तो सही निर्णय लिए जा सकते हैं।
लंका या रावण राज का खात्मा और वहां रामराज्य की स्थापना रामचरित का चरम उत्कर्ष है। वहां रावण के अनीति-अन्याय मूलक स्वेच्छाचारी राज्य का अंत कर राम विभीषण को शासक नियुक्त करते हैं। वह राम के स्थापित आदर्शों और मूल्यों के अनुसार शासन चलाता है। आसुरी आतंक को समाप्त करने के बाद वह अयोध्या के लिए चल पड़े। इस कथा का उपसंहार और रामराज्य की स्थापना सभी कालों में समाज के लिए अनुकरणीय रहेगी। उस भावना का निर्वाह किया जाना चाहिए।