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मुद्दा: व्यवस्थाएं भी तो खुद का विकास करें, यह चुनौती भी है बड़ी

Mon, 13 Jan 2025 06:40 AM IST
patralekha chatterjee पत्रलेखा चटर्जी
Updated Mon, 13 Jan 2025 06:40 AM IST
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सार
तिरुपति बालाजी मंदिर में मची भगदड़ बढ़ते धार्मिक पर्यटन के अनुपात में व्यवस्थाओं के विकास की चुनौती को रेखांकित करती है।
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Stampede at Tirupati Balaji temple highlights challenge to keep pace with growing religious tourism
तिरुपति भगदड़ - फोटो : ANI

विस्तार

राष्ट्रीय और अंतरराष्ट्रीय स्तर पर वर्ष 2025 की शुरुआत उथल-पुथल भरी हुई है। तमाम दुखद घटनाओं के बीच में आंध्र प्रदेश में हिंदुओं के सबसे प्रतिष्ठित मंदिरों में से एक तिरुपति मंदिर के पास हुई भगदड़ का समाचार भी शामिल है। भगवान श्री वेंकटेश्वर को समर्पित यह मंदिर तिरुपति बालाजी मंदिर के नाम से भी प्रसिद्ध है। देश-विदेश के लाखों श्रद्धालु प्रतिवर्ष भगवान वेंकटेश्वर के दर्शन करने के लिए पहुंचते हैं। वर्ष में दस दिन के लिए खुलने वाले मंदिर के वैकुंठ द्वार के दर्शन को श्रद्धालु काफी शुभ मानते हैं और उनका विश्वास है कि इससे उन्हें स्वर्ग के दैवीय द्वार की झलक मिलेगी।


लेकिन हाल में यहां भक्तों की भीड़ में मची भगदड़ में छह श्रद्धालुओं की मौत हो गई और कई घायल भी हुए। यह हादसा तिरुमाला श्रीवारी वैकुंठ द्वार के टिकट काउंटर के नजदीक विष्णु निवासम के पास ‘दर्शन’ टोकन के वितरण के दौरान हुआ। बीते साल हाथरस में एक धार्मिक आयोजन में मची भगदड़ में करीब सवा सौ लोगों की मौत हुई थी और अनेक लोग घायल हुए थे। भारत में धार्मिक आयोजनों में खराब भीड़ प्रबंधन और सुरक्षा चूक के कारण होने वाली घातक घटनाओं का एक गंभीर ट्रैक रिकॉर्ड है। अगस्त 2024 की वैश्विक कंसल्टिंग फर्म केपीएमजी और पंजाब हरियाणा दिल्ली चैंबर ऑफ कॉमर्स की एक रिपोर्ट में बताया गया, ‘भारत में 60 फीसदी से अधिक घरेलू यात्राएं धार्मिक उत्साह के कारण होती हैं। खासकर, कोरोना महामारी के बाद यात्रियों की संख्या में हुई उल्लेखनीय वृद्धि के साथ आध्यात्मिक पर्यटन केंद्र में आ गया है।’ भारत साढ़े चार लाख से ज्यादा धार्मिक और सांस्कृतिक विरासत स्थलों का घर है। जम्मू-कश्मीर स्थित वैष्णो देवी मंदिर में 32 से 40 हजार श्रद्धालु प्रतिदिन दर्शन करने के लिए आते हैं, जबकि कोविड से पहले प्रतिदिन दस से पंद्रह हजार यात्री प्रतिदिन आते थे। अमृतसर के स्वर्ण मंदिर में मत्था टेकने के लिए प्रतिदिन करीब एक लाख लोग आते हैं, जो महामारी के पहले की तुलना में काफी अधिक है। ठीक ऐसी ही स्थिति दक्षिण में केरल के गुरुवायूर मंदिर की है, जहां छह से सात हजार श्रद्धालु रोजाना पहुंचते हैं, जबकि महामारी से पहले यह संख्या चार हजार के करीब थी। उत्तर प्रदेश के मंदिर वाले शहरों की बढ़ती लोकप्रियता उनकी क्षेत्रीय अर्थव्यवस्था को भी मजबूत बना रही है।


काशी विश्वनाथ कॉरिडोर के पुनर्निर्माण और अयोध्या में राम मंदिर बनने के बाद से इन स्थलों पर, खासकर कोविड के बाद कहीं ज्यादा संख्या में लोग पहुंच रहे हैं। वर्ष 2023 में अकेले काशी में दस करोड़ से ज्यादा यात्री आए। अयोध्या के राम मंदिर में प्रतिदिन एक से डेढ़ लाख भक्त दर्शन करने के लिए आ रहे हैं। आप भले ही धार्मिक न हों, फिर भी आपको यह बात तो स्वीकार करनी होगी कि धार्मिक और आध्यात्मिक पर्यटन आर्थिक उन्नति और सांस्कृतिक आदान-प्रदान में अहम योगदान देते हैं। भारत सरकार ने धार्मिक और पर्यटन स्थलों पर बुनियादी ढांचे को बेहतर बनाने में मदद करने के लिए कई बेहतरीन योजनाएं लागू की हैं। लेकिन मुख्य चुनौती किसी तीर्थ स्थल की भक्तों को धारण करने की क्षमता से जुड़ी है। सड़क, सार्वजनिक परिवहन, स्वच्छता सेवाओं समेत स्थानीय बुनियादी ढांचा श्रद्धालुओं की बढ़ती संख्या के बोझ तले पहले ही दबा हुआ है, जिससे वहां के स्थानीय लोगों के जीवन की गुणवत्ता प्रभावित होती है और इससे कालांतर में तीर्थयात्रा कर रहे लोगों के लिए जरूरी सुविधाओं पर असर पड़ना भी तय है। अति पर्यटन के दबाव की वजह से न केवल पारिस्थितिकी संतुलन गड़बड़ाता है, बल्कि तीर्थस्थलों का सौंदर्य और आध्यात्मिक माहौल भी प्रभावित होता है। केपीएमजी-पीएचडीसीसी रिपोर्ट में कहा गया है कि भारत के प्रसिद्ध आध्यात्मिक स्थलों पर भीड़भाड़ की चुनौतियों से निपटने के लिए स्तरीय उपायों, रणनीतियों और विशिष्ट कार्यों को शामिल करते हुए एक व्यापक दृष्टिकोण जरूरी है। इन उपायों का उद्देश्य स्थानीय संसाधनों पर दबाव को कम करना, तीर्थ स्थलों की पवित्रता को बनाए रखना और सभी आगंतुकों के लिए आध्यात्मिक अनुभव को बढ़ाना होना चाहिए। वैश्विक धार्मिक पर्यटन बाजार के वर्ष 2032 तक 2.22 अरब डॉलर के आसपास पहुंचने का अनुमान है। इस बाजार में भारत की स्थिति काफी अच्छी है, लेकिन तीर्थयात्रियों की बढ़ती संख्या के लिए जरूरी सुविधाओं के इंतजाम करने के लिए अपनी क्षमता को बढ़ाने के मुद्दे की ज्यादा समय तक अनदेखी नहीं की जा सकती। सिर्फ सतत और समग्र विकास मॉडल को अपनाकर ही हम अपनी सांस्कृतिक और धार्मिक विरासत को भावी पीढ़ियों के लिए संरक्षित कर सकते हैं।
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