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एक छोटे से द्वीप-देश का विराट फैसला
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श्रीलंका
- फोटो : सोशल मीडिया
खूबसूरत सिंहल द्वीप - देश श्रीलंका का यह फैसला यकीनन सराहनीय है कि धार्मिक स्थलों का उपयोग आतंकवाद को संरक्षण देने के लिए नहीं होना चाहिए। सरकार ने सभी इस्लामिक संस्थाओं और मस्जिदों का संचालन करने वाली समितियों से कहा है कि वे ध्वनि विस्तारक यंत्रों और अंदर की सभी उपदेशात्मक गतिविधियों की ऑडियो रिकॉर्डिंग अनिवार्य रूप से स्थानीय प्रशासन के पास जमा करेंगे। प्रशासन उनका परीक्षण करेगा। यदि उन्हें आपत्तिजनक पाया गया तो उस धार्मिक स्थल के खिलाफ सख्त कार्रवाई होगी। उसे स्थाई तौर पर बंद किया जा सकता है और संचालकों के खिलाफ आतंकवादीकानून के तहत प्रकरण दर्ज हो सकता है।
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इससे पहले सरकार ने मुस्लिम महिलाओं के बुर्का पहनने पर पाबंदी लगा दी थी। श्रीलंका सरकार जांच के बाद इस निष्कर्ष पर पहुंची है कि तीन सप्ताह पहले गिरिजाघरों में शृंखलाबद्ध विस्फोटों के पीछे इस्लामी कटटरपंथी समूहों का हाथ है। इन धमाकों में तीन सौ से अधिक लोग मारे गए थे और सैकड़ों लोग घायल हुए थे। यह भी पता चला है कि न्यूजीलैंड में मस्जिदों में हमले का उत्तर देने के लिए श्रीलंका के चर्चों पर आक्रमण किए गए थे। मुस्लिम मामलों के मंत्रालय ने जोर देकर कहा है कि मुल्क में किसी भी धार्मिक स्थल को दहशतगर्दी को पनाह देने वाला अड्डा नहीं बनने दिया जाएगा।
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देश में अभी आपातकाल जारी है, लेकिन जनजीवन सामान्य होने लगा है। सरकार इस्लामिक कटटरपंथियों को उसी तरह अभियान चलाकर खत्म करना चाहती है, जिस तरह लिट्टे उग्रवादियों का सफाया किया गया था। गौरतलब है कि एक पखवाड़े पहले आईएसआईएस ने इन हमलों की जिम्मेदारी ली थी। अच्छी बात है कि श्रीलंका के मुस्लिम समुदाय ने अपने को इस तरह की हरकतों से एकदम अलग कर लिया है। हालांकि उसके और खुलकर सामने आने की आवश्यकता है। श्रीलंका सरकार ने अपनी लापरवाही से सबक लिया है। खुफिया रिपोर्टों ने पहले ही आगाह कर दिया था। लेकिन शीर्ष स्तरों पर इस चेतावनी को नहीं बताया गया।
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राष्ट्रपति और प्रधानमंत्री के अलग-अलग गुट और दल होने के कारण प्रशासन वहां सेंडविच बन गया है। दो पाटों के बीच पिस रही नौकरशाही और जनता इससे त्रस्त है। परदे के पीछे से चीन इसका फायदा उठा रहा है। श्रीलंका सरकार की स्थिति सांप-छछूंदर जैसी हो गई है। हंबनटोटा बंदरगाह पर चीन का नियंत्रण होने के बाद वह श्रीलंका के आंतरिक मामलों में भी दखलंदाजी कर रहा है। उंगली पकड़ने के बाद वह श्रीलंका की कलाई पकड़ना चाहता है। राष्ट्रपति महिंद्रा राजपक्षे चीन की गोद में बैठे हुए हैं। ऐसे में प्रधानमंत्री रानिल विक्रमसिंघे क्या कर सकते हैं ?
चर्चों पर हमले की सूचना राष्ट्रपति के दफ्तर को थी। वह प्रधानमंत्री कार्यालय को नहीं भेजी गई। आपको याद होगा कि न्यूजीलेंड में मस्जिदों पर हमला करने वाला भी चीन के रास्ते ही पाक अधिकृत कश्मीर पहुंचा था। उसने वहां हथियारों का आधुनिकीकरण कराया था। उस इलाके में इन दिनों चीन की सेना का कब्जा है, जो ग्वादर तक कॉरिडोर बना रही है। ऐसे में चीन के दोहरे चरित्र पर भी कूटनीतिक शंका होती है। श्रीलंका सरकार के दोनों शिखर पुरुषों को इस मामले में एक जुटता दिखानी होगी अन्यथा आने वाले दिनों में भी इस तरह के हमलों की आशंका नकारी नहीं जा सकती।
हिन्दुस्तान के लिए भी यह खतरे की घंटी है। एक छोटा मुल्क जो चारों तरफ पानी से घिरा हो, वह तो अपनी घेराबंदी और चौकसी सख्त कर सकता है। मगर भारत के मामले में ऐसा नहीं है। पाकिस्तान, चीन, नेपाल और बांग्लादेश की सीमाओं से आतंकवादियों की घुसपैठ होती रही है। इन देशों में भारत विरोधी भावनाओं को हवा दी जाती है। इसके अलावा भारतीय राजनीति जिस शर्मनाक दौर से गुजर रही है, वह विदेश और रक्षा नीति के जानकारों के लिए कठिन चुनौती है।
विडंबना है कि हिन्दुस्तान के राजनेता सोचते हैं कि हमारी स्वतंत्रता एक ऐसे अभेद्य और अजेयकिले में सुरक्षित है, जिस पर कभी कोई संकट नहीं आएगा। इस कारण वे सियासत को एक अराजक मोड़ तक ले जाने में भी नहीं हिचकिचा रहे हैं। श्रीलंका कोई आदर्श नहीं है, लेकिन कुछ तो हमें इस सुंदर द्वीप देश से सीखने की जरूरत है।