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जीवन धारा: वसंत जड़ता में ऊष्मा का संचार है... यह योजनाओं और परियोजनाओं का समय

Mon, 03 Feb 2025 06:09 AM IST
शुभम कुमार विद्या निवास मिश्र
विद्या निवास मिश्र Published by: शुभम कुमार Updated Mon, 03 Feb 2025 06:09 AM IST
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सार
वसंत से मेरा तात्पर्य एक दुर्निवार उत्कंठा से है, जो सब कुछ के बावजूद मनुष्य के मन में कहीं दुबकी रहती है। वसंत निहंगपन में समृद्धि का आगमन है, अनमनेपन में राग का अंकुरण है।
 
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Spring Season India in Basant Ritu transmission of heat in inertia time for plans and projects
वसंत - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

सिवाय इसके कि कुछ पेड़ों की पत्तियां बड़ी निर्मोही हो गई हैं, अपनी डाल पर रुकती नहीं, पेड़ की छाया तक भी नहीं रुकती, भागती चली जाती है, और कोई संकेत यहां बड़े शहर में वसंत का मिलता नहीं। क्या निर्मोहीपन को ही वसंत मान कर वसंत का स्वागत करें या इसे कोसें, फिर तुम आ गए! तुम आते हो, कितना कुछ गवां देना पड़ता है पास से और कुछ भी हाथ में हासिल नहीं आता।


राग की ऋतु हो, कितना विराग दे जाती हो, अपने आप से। ब्रजभाषा के किसी कवि ने ऐसा ही प्रश्न किया थाः झूरि से कौन लये बन बाग,/कौने जु आंयन की हरि भाई।/कोयल काहें कराहित है बन,/कौन धौं, कौन ने रारि मचाई।। (यह क्या हुआ है, किसने बन बाग झुलसा दिए, सब नंगे ठठरी-ठठरी रह गए, किसने आमों की हरियाली हर ली। किसने यह उपद्रव किया कि 'बन बन' कोयल कराहती रहती है।) हम वसंत से खीझते हैं, पर उसकी प्रतीक्षा भी करते हैं। जाने संस्कृतियों ने कितने मोड़ बदले, मनुष्य जाने कहां से कहां पहुंचा, मन आदिम का आदिम रह गया, वह एक साथ फुलसुंघनी चिड़िया, बिजली की कौंध, तितली की फुरकन, गुलाब की चिटक, स्मृति की चुभन, दखिनैया की विरस बयार, कोयल की आकुल कुहक, सुबह की अलसाई सिहरन, दिन का चढ़ता ताप, नए पल्लवों की कोमल लाली, पलाश की दहक, यह सब है और इसके अलावा भी अनिर्वचनीय कुछ है। वह सदा किशोर रहता है, इसीलिए वह इतना अतर्क्य बना रहता है। यह वसंत निगोड़ा उसी मन से कुछ सांठगांठ किए हुए है। इसीलिए सारी परिस्थितियां एक तरफ और वसंत का आगमन एक तरफ।


वसंत से मेरा तात्पर्य एक दुर्निवार उत्कंठा से है, जो सब कुछ के बावजूद मनुष्य के मन में कहीं दुबकी रहती है, यकायक उदग्र हो उठती है, कहां से संदेश आता है, कौन बुलाता है, कोई नहीं जानता। कौन बसंती रास के लिए वेणु बजाता है, उसका भी कुछ पता नहीं। वसंत स्वयं भी संहार में सृष्टि है। निहंगपन में समृद्धि का आगमन है, अनमनेपन में राग का अंकुरण है, जड़ता में ऊष्मा का संचार है। इसी से उसके दो रूप हैं-मधु और माधव। फागुन मधु है, मधु तो क्या, मधु के आस्वाद की लालसा है और माधव लालसाओं का उतार है। वसंत और कुछ नहीं करता, बस कुछ को न-कुछ और न-कुछ को कुछ करता रहता है। बार-बार बरजने पर भी मानता नहीं। कोई हितु है, जो इसे रोक सके? मैं जानता हूं कोई नहीं होगा, क्योंकि दिन में तो हवा की सवारी करता है। रात में चांद की सवारी करता है। वह कहां रोके रुकेगा! तो फिर आ जाओ अनचाहे पाहुन, आओ भीतर कुछ क्षण आ जाओ, इन कागदों के पत्रों के बीच आ जाओ, इन्हें ही कुछ रंग दो, सुरभि दो, गरमाहट का स्पर्श दो, स्वर दो। ये पत्ते प्राणवंत हो जाएं, भले ही अपने को गला दें, जला दें। कुछ नए बीजों को अंखुआने की ऊष्मा तो दे दें।

सूत्र: वसंत की तरह जीवन में रंग भरें
सुंदर वसंत आ गया है, और जब प्रकृति अपनी सुंदरता पुनः प्राप्त कर लेती है, तो मानव आत्मा भी पुनः जागृत हो जाती है। वसंत हंसती हुई मिट्टी को रंगने के लिए फूलों को खोल देता है। वसंत की तरह अपने जीवन में रंग भरें, एक बार फिर से अपने लक्ष्य की ओर बढ़ें। वसंत ऋतु योजनाओं और परियोजनाओं का समय है।
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