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व्यवस्था में बदलाव की आहटें

Tue, 18 Mar 2014 06:20 PM IST
सुभाष घई
सुभाष घई Updated Tue, 18 Mar 2014 06:20 PM IST
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Sound of change in System

यह बदलाव का वक्त है। बदलाव से मेरा आशय इस समय देश में चल रही उथल-पुथल से है। यह ऐसा दौर है, जिसमें हर व्यक्ति भय और आशंका में जी रहा है। हत्याएं और बलात्कार आम हो चुके हैं। गरीब तो गरीब है ही, जिसे आर्थिक रूप से स्थिर समझा जाता है, उसकी हालत भी खस्ता है। युवाओं में गुस्सा है और पिछले दो-तीन साल में यह बार-बार नजर आया है। वे सड़कों पर उतर कर अपनी बात करने को मजबूर हुए हैं, क्योंकि सिस्टम में सही ढंग से सुनवाई के लिए आज जगह ही नहीं बची है। अब लोकसभा चुनाव सामने है और हमारे सामने मौका है कि अपने वोटिंग पावर का इस्तेमाल कर ऐसे व्यक्ति को चुनें, जो सच्चाई का साथ दे और देश की उन्नति जिसके लिए सर्वोपरि हो। सही वोट देने का अर्थ सच की ताकत और देश की प्रगति में साथ देना है। एक बात हमें ठान लेनी चाहिए कि देश को चलाने के लिए सिर्फ जिम्मेदार लोगों को ही चुनना है।

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वक्त बदलाव का भले ही है, लेकिन इससे डरने की जरूरत नहीं है। पुरानी चीजें जाती हैं, पुराने लोग विदा लेते हैं, तो उनकी भरपाई होती रहती है। मुझे अपने वक्त की यह बात खूब अच्छे से याद है कि जब सुनील गावस्कर ने क्रिकेट से संन्यास लिया था, तब ऐसा लगता था कि उनकी जगह कोई नहीं ले सकता। परंतु सचिन तेंदुलकर आए और उन्होंने गावस्कर से आगे बढ़कर एक नया इतिहास रचा। इसलिए हमें युवाओं पर, देश की नई पीढ़ी पर विश्वास करना चाहिए। ऐसे युवाओं को आज राजनीति में आने की जरूरत है, जो सच्चाई के साथ देश और समाज के लिए काम करना चाहते हैं। जो राजनीति को सही मायनों में बदलना चाहते हैं। जो देश की तरक्की का सपना देखते हैं और जनता की जरूरतों को पूरा करने के लिए परिश्रम करना चाहते हैं। इस बात में कोई संदेह नहीं कि अगर हम ईमानदारी से आगे बढ़ें, तो बड़ी से बड़ी रुकावट को रास्ते से हटाया जा सकता है। लेकिन ऐसे लोगों को चुनकर संसद में भेजने की जिम्मदारी केवल हमारी यानी मतदाताओं की है। मैं मानता हूं कि आज का समाज ज्यादा जागरूक और सजग है। उसमें हिम्मत भी पहले से कहीं ज्यादा है।
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चुनाव के मौके पर लोग यह जानना चाहते हैं कि मैं अगले प्रधानमंत्री के रूप में किसे देखना पसंद करूंगा। सच यह है कि मेरी ‘विश-लिस्ट’ में कोई नाम नहीं है। मैं अपने देश के ऐसे लोगों को जनता के नुमाइंदों के रूप में देखना चाहता हूं, जो शिक्षित हों, समझदार हों, ईमानदार हों, किसी के दबाव में न आएं, घोटाले न करें और सच्चे मन से देश की हालत सुधारने के लिए काम करें। मुझे लगता है कि ऐसे ही लोगों को राजनीति में आना चाहिए। मैं नहीं चाहता कि कोई ऐसा व्यक्ति चुनकर आए, जो सदन में मारपीट करे या असंसदीय भाषा बोले। अगर वाकई योग्य लोग चुनकर आते हैं, तो देश की स्थिति में सुधार होगा और हर आदमी अपने आप को सुरक्षित महसूस करेगा।
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मैं यह साफ कर देना चाहता हूं कि मिली-जुली सरकार में मेरा विश्वास नहीं है। लोगों को ऐसी सरकार के लिए वोट नहीं देना चाहिए। मिली-जुली सरकारों और मिली-जुली बातों ने हमारा नुकसान ही किया है। जो लोग कहते हैं कि सब कुछ केवल ‘ब्लैक ऐंड ह्वाइट’ नहीं होता, उनकी बात पर फिर से विचार करने की जरूरत है। ‘ग्रे’ के चक्कर में बहुत घोटाले हुए हैं। समय आ चुका है कि हम चीजों को अब ‘ब्लैक’ और ‘ह्वाइट’ के रूप में देखें। कोई घालमेल न करें। अब इस देश को ऐसे नेता की जरूरत है, जो देश को फिर से ‘सोने की चिड़िया’ बनाने के बारे में सोचे। इस सवाल का जवाब ढूंढने की भी जरूरत है कि आज राजनीति में देशभक्ति कितनी दिखाई पड़ती है। राजनीति में देशभक्ति का भाव वापस लाना बहुत जरूरी है। देश और व्यवस्था को चलाने वालों को यह बात समझने की सख्त जरूरत है।

एक साधारण आदमी समूह में रहना और चलना पसंद करता है। लेकिन हमारे इन्हीं समूहों के बीच कुछ ऐसे लोग भी होते हैं, जिनका मनोबल बहुत मजबूत होता है। यही वे लोग होते हैं, जो समाज, देश और दुनिया में बदलाव लाते हैं। एक फिल्ममेकर के रूप में मेरी कोशिश हमेशा ऐसे किरदारों की कहानी कहने की रही है, जो परिस्थितियों से टकराते हैं और उनमें परिवर्तन करते हैं। फिल्मों में यही संदेश देने की भी कोशिश होती है कि अगर आप ठान लें, तो बदलाव असंभव नहीं है।


लोकसभा चुनाव के इसी दौर में मेरी फिल्म कांची रिलीज होगी। हमारे वक्त की आहटें इस फिल्म में भी सुनी जा सकेंगी। मैं जो सोचता हूं, वही इस फिल्म में दिखाने की कोशिश की गई है। हमारी व्यवस्था इतनी खराब और भ्रष्ट हो चुकी है कि आज आपको सरकारी दफ्तर में कोई छोटा-सा भी काम कराना हो, तो धक्के खाने पड़ते हैं। यह किसी यातना से कम नहीं है। जब व्यवस्था हमारी है, जिन्हें इसको चलाने का जिम्मा सौंपा गया है, वे हमारे द्वारा चुने गए हैं, तो फिर हम यातना क्यों सहें? एक निडर लड़की के माध्यम से मैंने आज के युवाओं की कहानी कही है। विश्वास कीजिए कि अगर कोई ठान ले, तो कामयाबी उसके कदम चूमती है। इस राजनीति और इस व्यवस्था में बदलाव बहुत जरूरी हो गया है। बदलाव से ही ‘सुंदर भारत’ का सपना साकार हो सकता है और यह ‘स्वच्छ राजनीति’ के द्वारा ही संभव है। राजनेता अगर यह बात समझेंगे, तो हमें स्वर्णिम परिवर्तन जरूर दिखाई पड़ेगा। मैं नहीं मानता कि आज के राजनेता बदलाव नहीं ला सकते। अच्छाई हर दिल में मौजूद होती है। भले ही वह किसी कोने में दबी हुई हो।

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