दीप की ध्वनि, दीप की छवि
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दीपावली पर हर अंधेरे कोने पर दीप रखने की जो परंपरा हमारे देश में रही है, वही मुझे सबसे अधिक भाती है। और इस प्रसंग में मुझे हर दीपावली पर अपनी मां की बेहद याद आती है। हमारे बचपन में वह हमसे कहती थीं-जाओ, एक-एक दीया अमुक-अमुक पेड़ के नीचे भी रख आओ। हम भागते थे, पेड़ के तनों, उनकी जड़ों पर दीया जलाकर उससे फैलने वाली रोशनी को देखा करते थे। अंधेरे बाग में जहां तक वह रोशनी जाती थी, वह हमें दीपों की किसी लंबी कतार से भी अच्छी लगती थी। याद है, दीये केवल बाग में ही नहीं रखे जाते थे, रखे जाते थे कुएं के चबूतरे पर भी। वहां भी, जहां गाय-बैल बंधे होते थे। ऐसी किसी भी जगह, जिससे हमारा थोड़ा-सा भी वास्ता हो, उसका ध्यान रखा जाता था। अब भी दीये कहीं न कहीं रखे जाते होंगे जरूर, पर अब वे देखने में नहीं आते।
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हम महानगर में हैं और यहां के घर दीयों से नहीं, बिजली के लट्टुओं से भरे होते हैं। पर यह तो होता ही है, चीजें बदलती हैं पीढ़ियों के साथ। अब महानगरों में आंगन वाले घर भी कितना कम बचे हैं। चारों ओर बहुमंजिले फ्लैट। उनमें से कुछ की बालकनी पर ही दीये जले हुए मिलते हैं। पर कुछ भी हो जाए, दीप की छवि हमारे जीवन से जाने वाली नहीं है। 'दीपावली' शब्द में भी दीप-छवि और ध्वनि भरी हुई है। और हमारे काव्य-साहित्य में, संस्कृत वांग्मय से लेकर आधुनिक काल तक के साहित्य में उसकी उपस्थिति है, और हम कामना करते हैं कि आगे भी बनी रहेगी।
महादेवी जी की 'दीपशिखा' की बाती भला कभी बुझ सकती है! उनके यहां मानो एक पूरा दीप संसार बसा हुआ है-प्रतीक के रूप में, छवि के रूप में, जीवन-मर्म के रूप में। उनका यह 'दीप' उस दीप परंपरा से ही आया है, जो एक लंबे समय तक हमारे घरों में उजियाला भरती रही है। भला कहां नहीं होता था दीप, आले में, दरवाजे पर, चौखट के पास, सीढ़ियों पर, खेत में! उसकी लौ का ही रहता था भरोसा। वह आंधी में भी जलता रहे, यही रहती थी कामना। महादेवी जी की पंक्तियां हैं-मधुर-मधुर मेरे दीपक जल!/युग-युग, प्रतिदिन, प्रतिक्षण, प्रतिपल,/प्रियतम का पथ आलोकित कर/सौरभ फैला विपुल धूप बन, मृदुल मोम-सा घुलकर मृदु तन/दे प्रकाश का सिंधु अपरिमित/तेरे जीवन का अणु-अणु गल/पुलक-पुलक मेरे दीपक जल। सचमुच दीपक की यह पुलक सबमें एक पुलक ही तो भरती रही है।
आलोक का ही उत्सव है दीपावली। यह आलोक पर्व है। दीपावली के दिन यह आलोक अब अधिक दिखाई पड़ता है, कई जगह आंखों को चौंधियाता हुआ। बाजार भी लुभाता-चौंधियाता है अब। दीपावली है, यह भी ले लो, वह भी ले लो। सेल और डिस्काउंट खूब सुनने और देखने को मिलते हैं, उन दुकानों से भी, जिनका कोई सीधा संबंध दीपावली से नहीं होता। इस बार सेल और डिस्काउंट के साथ या आसपास जीएसटी भी जुड़ गया है, जिसे समझने की चेष्टा में बहुतेरे लगे हुए हैं। पर अभी बाजार की बात नहीं करेंगे, वह अपनी बात खुद कर रहा है चारों ओर। हम तो याद करेंगे कुछ पुराने दिन, नए भी। पुराने इसलिए कि अच्छी चीजों की स्मृति भी तो ऊर्जा देती है। क्या था पुराने दिनों में जो आज नहीं है? तो बात यह ध्यान में आती है कि मिलावट नहीं थी, जितनी आज है। टनों मिलावटी मावा पकड़ा जाता है, दीपावली में खास तौर पर। अब लोग मुड़ रहे हैं ड्राइ फ्रूट्स की ओर। हां, पुराने दिनों में पकवान-मिष्ठान बनते थे बहुत से, जिनकी सामग्री और रेसेपी भी अब बहुतों को याद नहीं है। गुझिया है और उसको तो रहना ही है, हर हाल में। बस पुराना घी अब भले न रह गया हो, खैर।
जिस स्वच्छता अभियान की बात अब तीव्र रूप से कही जा रही है, दीपावली का उससे गहरा संबंध रहा है। सफाई जिस दीपोत्सव के स्वागत के लिए की जाती रही है, उसके साथ 'धवलता' का एक स्वप्न जुड़ा हुआ है। वस्त्र इस दीप-उत्सव में उजले-धुले हों, घर की दीवारें भी उजली हों, यह इच्छा मन में रहती है। मुझे ही क्यों, बहुतों को यह उत्सव इसलिए भी प्रिय है कि यह 'दूरियों' को कम कर देता है। यह अलग बात है कि अब दूरियों को पहले की तरह नहीं देखा जाता। वाट्सऐप में छवियां, बधाइयां सभी हैं। बहुरंगी। फिर भी यह पास बुलाने का उत्सव है। जो दूर हैं, वे पास आ जाएं। जो पास हैं, जैसे पड़ोसी, वे और भी पास आ जाएं, यह अपने में मिला लेने वाला उत्सव है। 'सब अपने हैं' का भाव जगाने वाला। अज्ञेय की पंक्ति है न, यह दीप अकेला स्नेह भरा, मदमाता पर है, गर्व भरा, इसको भी पंक्ति को दे दो।
देख रहा हूं कि हर दीपावली के साथ अब रंगों की भरमार होती जा रही है। पटाखों पर पाबंदी लगी है, यह अच्छी बात है। हफ्तों पहले से दीपावली के उपहार जुटाने का क्रम और श्रम शुरू हो जाता है। सड़कों को छेक लेती हैं गाड़ियां, उपहारों की खोज में, उपहारों से लदी हुईं। एक संपन्नता चारों ओर बिखरी हुई दिखाई पड़ती है, पर दीये तले का अंधेरा अभी बाकी है। महंगाई घटाओ, रोजगार जुटाओ की एक धारा, अंतर्धारा बह रही है तमाम रोशनी के भीतर, उसके नीचे। पर यह दिन विशेष है, स्वागत का है। पुलक का है। सब कुछ भूलकर उत्सव मनाने का है। रोज-रोज थोड़े आती है दिवाली। साकेत में मैथिलीशरण जी ने लिखा है-स्वागत, स्वागत शरद भाग्य से मैंने दर्शन पाए। लेकिन वह शरद, आज का शरद नहीं है। ठंड का जो हल्का-सा मनभावन स्पर्श मिला करता था, वह अभी नहीं मिला है। ग्लोबल वार्मिंग का जमाना है सचमुच।
लेकिन जगमगाहट है आज दीपोत्सव की। मनाएं उसे। हर बार यह उत्सव याद दिला देता है कि हो सकती है अंधकार पर विजय। उस अंधकार पर, जहां-जहां भी है वह। तो मैं तो दीप ही जलाना चाहता हूं। बचपन की तरह हर उस कोने में, जिससे कोई वास्ता है और जहां अंधेरा है। अच्छा लग रहा है मन ही मन यह कल्पना करके कि रख रहा हूं एक दीप, अमुक-अमुक पेड़ के नीचे, पोखर-ताल के तट, जिनके आज भी खरे होने की बात कही थी एक अनुपम व्यक्ति अनुपम मिश्र ने। हरियाली के बिना उजियाली कहां, सचमुच वाली उजियाली।