इंदिरा गांधी के रास्ते पर सोनिया
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जब भी मुझे लगता है कि मोदी सरकार विकास और परिवर्तन की दिशा में कुछ ज्यादा ही धीरे चल रही है, तब विपक्षी दल ऐसा कुछ करके यह याद दिलाते हैं कि विकल्प कितना बेअसर है। पिछले कुछ दिनों से सोनिया गांधी के नेतृत्व में विपक्ष हरकत में आ गया है। यह सिलसिला शुरू हुआ है दिल्ली विधानसभा चुनाव के बाद से, जिसमें आम आदमी पार्टी ने साबित किया कि भाजपा चुनाव हार सकती है। दिल्ली विधानसभा के चुनाव परिणाम आते ही राहुल गांधी अदृश्य हो गए, लेकिन उनके जाने के बाद उनकी माताजी ने ऐसा मोर्चा संभाला कांग्रेस का, कि इंदिरा गांधी की यादें ताजा हो गईं। सोनिया जी को राजस्थान में किसानों के साथ सहानुभूति जताते हुए देख कइयों ने लंबे-चौड़े लेख लिखे, जिनमें उन्होंने सोनिया जी की इस यात्रा की तुलना इंदिरा गांधी की बेलछी यात्रा के साथ की।
हार के बाद बेलछी से शुरू की थी इंदिरा गांधी ने सत्ता में वापस आने की यात्रा। सोनिया जी ने राजनीति में आने के बाद बार-बार यह स्पष्ट किया है कि उनके लिए वही रास्ता सही है, जो उनकी सास ने दिखाया था, सो उनकी नकल खुलकर करती हैं। उनकी समस्या है, तो यही कि इंदिरा जी एक कमजोर, विभाजित सरकार को गिराने की कोशिश कर रही थीं, और सोनिया जी एक ऐसे प्रधानमंत्री को हटाना चाहती हैं, जो पूर्ण बहुमत लेकर आए हैं। मोदी सरकार को हटाना आसान नहीं होगा, लेकिन सोनिया जी ऐसे तेवर दिखा रही हैं, जैसे बस कुछ ही दिनों की बात है और वह वापस सत्ता में आ जाएंगी।
भूमि अधिग्रहण अध्यादेश के खिलाफ आगामी 19 अप्रैल को रामलीला मैदान में विशाल किसान रैली बुलाई है कांग्रेस ने। किसानों के साथ हमदर्दी जताने का अच्छा समय है, क्योंकि बेमौसम बारिश ने फसलें तबाह कर दी हैं। लेकिन रैली सफल भी हुई, तो क्या बिगाड़ सकती हैं सोनिया जी मोदी का? कुछ खास नहीं बिगड़ेगा इस रैली से, और न ही कुछ बिगड़ेगा, अगर राहुल गांधी वतन लौटकर भारत देश की पदयात्रा पर निकल पड़ते हैं।
लेकिन कांग्रेस की रणनीति बिल्कुल स्पष्ट हो गई है इन हरकतों से। रणनीति यह है कि किसी भी हालात में मोदी सरकार को चलने नहीं दिया जाएगा। लोकसभा में क्योंकि सिर्फ 44 सीटें हैं कांग्रेस की, तो लड़ाई सड़कों पर लड़ी जाएगी और अन्य सेक्यूलर विपक्षी दलों को साथ लिया जाएगा। राज्यसभा में इन सेक्यूलर, वामपंथी दलों के समर्थन से मोदी सरकार को हर तरह से बदनाम किया जाएगा। मीडिया का दिल भी सेक्यूलर है, तो हर छोटी गलती को बड़ा बनाकर पेश किया जाता है। इसका उदाहरण पिछले सप्ताह मिला, जब गिरिराज सिंह ने कह दिया कि सोनिया गांधी अगर नाइजीरियन होतीं, तो कांग्रेस उनको कभी न स्वीकारती।
यहां यह स्पष्ट करना जरूरी है कि मैंने भी बरखा दत्त के शो में यह बात कही थी, जब मेरी किताब दरबार छपी थी 2012 में। मैंने कहा था कि सोनिया जी अगर सोमालिया से होतीं, तो कांग्रेस उनके हाथों में अपना भविष्य न देती। सच यह भी है कि हम भारतवासियों को गोरे रंग के सामने सिर झुकाने की आदत है। मैंने अपनी किताब में सोनिया जी के श्रीपेरेंबुदूर वाले पहले राजनीतिक जलसे के बारे में यह लिखा है कि कांग्रेस कार्यकर्ता उस सभा में तमिल में गाना गा रहे थे, जिसके शब्द थे-आपका रंग गोरा है, सो आप भगवान हैं। गिरिराज सिंह के बयान को लेकर इतना बवाल न खड़ा होता, अगर मीडिया न चाहता। सो, सावधान हो जाइए प्रधानमंत्री जी!