डिजिटल भारत को वक्त चाहिए
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पांच सौ और हजार रुपये के पुराने नोटों को अमान्य किए जाने के बाद पिछले एक महीने में काफी कुछ हुआ है। काले धन को खत्म करने का प्रारंभिक उत्साह कमजोर पड़ गया है और अब सारा जोर नकदी विहीन और डिजिटल भुगतान पर है। दीर्घकालीन अर्थों में यह कदम अच्छा है। अतीत से हम सीख सकते हैं कि कैसे भारत मोबाइल टेलीफोन से जुड़ा, जिसने लैंडलाइन फोन पर निर्भरता खत्म कर दी। आज देश की जितनी आबादी है, उससे ज्यादा मोबाइल फोन हैं। ऐसी ही क्रांति डिजिटल से भुगतान से होगी। कुछ वर्ष बाद नकदी पर निर्भरता घटाकर हम धन का निर्बाध हस्तांतरण देखेंगे। लोग अंगूठे के निशान, डेबिट कार्ड और स्मार्टफोन के जरिये भुगतान करेंगे। इससे बैंकिंग और वित्तीय सेवा उद्योग पर दबाव घटेगा।
आज अगर आप बैंक में पैसा जमा करने जाते हैं, तो उसमें समय लगता है। अगर आप चेक जमा करते हैं, तो उस पैसे को आपके खाते में आने में 48 घंटे से ज्यादा का समय लगता है। डिजिटल लेन-देन से तुरंत आपके खाते में पैसा आ सकता है। नकद का कम उपयोग करने और डिजिटल लेन-देन को बढ़ावा देने से सबको लाभ होगा। हर व्यक्ति को डिजिटल और कम नकदी वाले वातावरण का हिस्सा बनाने के लिए क्या करना होगा? इसके लिए हर व्यक्ति के पास एक बैंक खाता होना जरूरी है। बेशक इस खाई को पाटने के लिए मौजूदा डेबिट एवं क्रेडिट कार्ड के अलावा प्री-लोडेड कार्ड शुरू किया जा सकता है। क्रेडिट एवं डेबिट कार्ड तो बैंक खाता खुलने के बाद ही मिलता है, लेकिन प्री-लोडेड कार्ड उन लोगों की जरूरतें पूरा करेगा, जिनके बैंकों में खाते नहीं हैं। यह बहुत जरूरी है कि वस्तु एवं सेवा प्रदाता के साथ उपभोक्ता भी डिजिटल भुगतान करे। डिजिटल पर्स के जरिये लेन-देन का नया प्रारूप होगा, जिसे पेटीएम ने आज लोकप्रिय बना दिया है।
इसके बाद वस्तु एवं सेवा प्रदाताओं को इंटरबैंकिंग कनेक्टिविटी का हिस्सा बनने की जरूरत होगी। इसके अलावा एकाधिक मुद्रा स्वीकृति तंत्र के प्रावधान की भी जरूरत होगी। पॉइंट ऑफ सेल टर्मिनल (पोस्ट) के साथ, जहां स्वाइपिंग मशीन का इस्तेमाल होता है, उन ग्राहकों के डिजिटल पर्स वाले मोबाइल को पंजीकृत करने की भी आवश्यकता होगी, जो डिजिटल पर्स से भुगतान करना चाहेंगे। इन सभी तंत्रों के लिए दो चीजें बुनियादी तौर पर जरूरी हैं-बिजली और इंटरनेट। इसलिए डिजिटल भुगतान की सफलता के लिए प्रौद्योगिकी बहुत महत्वपूर्ण है।
हमारे देश में दो लाख से कुछ ही ज्यादा एटीएम हैं, जो इस बात का संकेत हैं कि नकद वितरण प्रणाली कितनी सीमित है। अभी पॉइट ऑफ सेल टर्मिनल भी बहुत कम हैं और बीस लाख से ज्यादा दुकानों पर डिजिटल पर्स को स्वीकार किए जाने का दावा भी विश्वास करने लायक नहीं है। संभावना है कि भौगोलिक रूप से देश के 30 फीसदी हिस्सों में ही 80 से 85 फीसदी मौजूदा एटीएम और पॉइंट ऑफ सेल टर्मिनल हैं। जाहिर है कि अभी हमारा देश डिजिटल भुगतान के लिए बुनियादी संरचनाओं के मामले में पूरी तरह तैयार नहीं है। हमारे देश में 98 फीसदी मौद्रिक लेन-देन नकद के रूप में होता है। इस मानसिकता को बदलने के लिए सौ दिन भी पर्याप्त नहीं हैं। इसके लिए वास्तविक लक्ष्य और सुधार के साथ पांच वर्षों की योजना बनानी होगी। आज कार्ड या एटीएम पर निर्भरता की तुलना में डिजिटल पर्स हमारे लिए बेहतर है। कौन जानता है कि कल कोई प्रौद्योगिकी इस परिदृश्य को बदल दे! फिर जब तक ग्राहकों को डिजिटल या नकद विहीन भुगतान के लाभ के बारे में नहीं बताया जाएगा, तब तक वे स्वैच्छिक रूप से इस तरफ कदम नहीं बढ़ाएंगे। ऐसी जागरूकता तीन से पांच वर्ष तक व्यापक पैमाने पर चलाई जानी चाहिए। स्वीडन और डेनमार्क जैसे देशों में भी ऐसा करने में काफी लंबा वक्त लगा, जहां 85 से 90 फीसदी डिजिटल लेन-देन होता है।
हमारे यहां उपभोक्ताओं और वस्तु व सेवा प्रदाताओं को डिजटल लेन-देन को बढ़ावा देने के लिए प्रोत्साहन नहीं दिया जाता है। उल्टे कार्ड से लेन-देन पर व्यापारी को शुल्क देना पड़ता है और उपभोक्ताओं को सेवा शुल्क चुकाना पड़ता है। कुछ दिनों पहले सरकार ने सेवा शुल्क से छूट देने की घोषणा की है, पर यह हमेशा के लिए नहीं है-क्योंकि कार्ड कंपनियों, भुगतान संस्थाओं और बैंकों को बुनियादी ढांचे का खर्च उठाने के लिए शुल्क लगाना पड़ता है। कुछ डिजिटल भुगतान पर आज छूट दिए जा रहे हैं, पर आगे इन्हीं सुविधाओं को हासिल करने के लिए ग्राहकों से शुल्क वसूले जा सकते हैं। यह भी चिंता का विषय है कि सरकार, जिसने पहले ही सेवा शुल्क के रूप में काफी धन अर्जित कर लिया है, बाद में डिजिटल लेन-देन पर शुल्क वसूल सकती है और डिजिटल अर्थव्यवस्था बनाने के बजाय इसे कर अर्जित करने का औजार बना सकती है।
ऐसे में आम लोगों के पास कम विकल्प हैं। आज बहुत से लोग डिजिटल भुगतान कर रहे हैं, क्योंकि बैंकों या एटीएम से अपना पैसा निकालना कठिन है। यह इसलिए नहीं है कि ऐसा करने में वे कोई मूल्य देखते हैं। सेवा प्रदाता भी अपना अस्तित्व बचाने के लिए डिजिटल भुगतान को स्वीकार कर रहे हैं। इससे उनकी आय और कर का अनुपालन बढ़ जाता है। उदाहरण के लिए, एक सब्जी बिक्रेता सौ रुपये की सब्जी बेचने पर दस रुपये कमा सकता है। लेकिन एक बार जब सब कुछ डिजिटल हो जाएगा, तो उसे खाते में आने वाले सौ रुपये पर सेवा कर चुकाना पड़ेगा। यानी डिजिटल भारत में उसे आज की तुलना में ज्यादा अप्रत्यक्ष कर चुकाना होगा।
अभी यह स्पष्ट नहीं कि परिदृश्य कितना बदलेगा। पर नकद विहीन अर्थव्यवस्था की दिशा में कदम उठाना चुनौतीपूर्ण है, जो पहले ही असंगठित क्षेत्रों और पूरी अर्थव्यवस्था को हिलाए हुए है। इस तिमाही में विकास दर घट गई है और यह स्पष्ट नहीं है कि कब हालात सामान्य होंगे। साथ ही इस कदम से हमारी बचत, खर्च और पैसे के निवेश का तरीका भी बदल सकता है।