फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Something have to lost for gain

कुछ पाने के लिए कुछ धोना पड़ता है

Sat, 15 Mar 2014 09:52 PM IST
यशवंत व्यास
यशवंत व्यास Updated Sat, 15 Mar 2014 09:52 PM IST
विज्ञापन
Something have to lost for gain

जैसे भी हो, आदमी की कोशिश रहती है कि वह उजली कमीज पहने। कंपनियां कितने ही वर्षों से इस प्रयास में लगी हैं कि आप दाग लगाएं और वे चमकाएं-दमकाएं। खासतौर पर जब हर मां को गर्व हो कि हर शालू को इस बार इंग्लिश स्कूल में डाला गया है और हर इंग्लिश स्कूल में सफेदी पर दाग जरा भी नहीं चलता। आखिरकार ये कंपनियां मदद करती हैं और एक दिन 'शालुएं' क्लास की मॉनीटर हो जाती हैं तथा क्लास की सभी लड़कियों की ड्रेस वे ही जांचती हैं।

विज्ञापन


उस दिन प्रधानमंत्री हमेशा की तरह टेलीविजन पर भाषण दे रहे थे। बिटिया ने मुझे टोका, 'पापा, इनका कुर्ता इतना सफेद कैसे?' मैं आमतौर पर कमीज-कुर्ते पर नहीं जाता। भाषण और भंगिमा पर जाता हूं। चेहरे पर तेज हो, होंठों पर जीभ फिर-फिर फिराई जा रही हो और शब्दों में पांच-पच्चीस बार प्रगति या विकास आ जाए तो बहुत होता है, लेकिन बच्ची ने पूछा तो मुझे भी लगा कि आखिर पी.एम. का कुर्ता इतना सफेद कैसे? मैंने शुद्ध उत्तर दिया, 'प्रधानमंत्री क्लीन हैं। उनका नाम किसी घोटाले में नहीं है। इसलिए उनका कुर्ता स्वाभाविक रूप से उजला-उजला है।'
विज्ञापन


बच्ची को तसल्ली नहीं हुई। उसने कहा, 'मैंने एक बार एक दूसरे बड़े नेताजी को भी टीवी पर देखा था। उनका कुर्ता भी झक सफेद दिखा, पर कहते हैं कि उन पर किसी घोटाले में शामिल होने का अंदेशा है।' इस बहस के बाद मैं लगातार सोच रहा हूं कि दोनों की कमीजें कैसे उजली हो सकती हैं? आखिर हर राजनीतिज्ञ की कमीज उजली क्यों दिखाई देती है? टीवी पर किसी की कमीज में कोई दाग नजर नहीं आता। ये इंग्लिश स्कूल में भी नहीं पढ़ते! आखिर शालू की मां बच्चों के कपड़े उजले करने और उन्हें मॉनीटर बनवाने के बाद इतना पाउडर कैसे बचा लेती है कि उन लोगों की कमीज भी उजली दिखें।
विज्ञापन
विज्ञापन


एक पार्टी प्रवक्ता का कहना है कि उजलापन लाने-दिखलाने के लिए किसी सबूत की जरूरत नहीं। यदि आपकी कमीज उजली नहीं है, तो हमारे नेता की कमीज पर शक उठाकर वह मैलापन कम नहीं किया जा सकता। दूसरे पार्टी के प्रवक्ता का बयान है कि उनके यहां जो निक्कर-कमीजें हैं, वे हमेशा स्वदेशी साबुन से चकाचक धोकर ही पहनी जाती हैं। उनका उजलापन खांटी भारतीय है। उसमें संस्कृति की चमक है और मिट्टी का यदि कोई लेना-देना है भी, तो वह कमीज के दाग से नहीं, सौंधी खुशबू से ताल्लुक रखता है। एक तीसरे दल के नेता भी अचकन के भीतर काफी उजली कमीज वाले हैं। उनके एक समर्थक का कहना है कि वे तो उसी साबुन से बाल धोते हैं, जिससे कमीज धुलती है। इसलिए दोनों एक से चमकते हैं।

एक लीडर ने मंजूर किया कि उन्होंने चंदा लिया था, तो इसका यह अर्थ नहीं है कि उनकी कमीज मैली थी। कॉलर पर दाग था बस, जो एक कमीज को दो दिन पहनने पर ही हो जाता है। एक दिन में दो पार्टियां इतना निशान तो छोड़ती ही हैं। इस देश में आम लोग, जिनका सामाजिक न्याय में विश्वास है, बचत की दृष्टि से ऐसा करते आए हैं। नेता तो सिर्फ जनविश्वास के मारे हैं। फिर जो राशि ली गई, उसे पार्टी की कमीजों की धुलाई में ही तो खर्च किया गया, ताकि सब लोग उजली कमीजें पहन सकें। जिन लोगों पर घोटाले का नाम नहीं चिपका है, वे आजकल कमीजों के मामले में बहुत मुखर हैं। जैसे एक वित्त मंत्री ने कहा था कि वे एक हवाला आरोपी के साथ गोल्फ खेलते थे, पर उससे पैसे कभी नहीं लिए। यानी उनकी कमीज उजली है और गोल्फ खेलने से कमीज के मैले होने का कोई संबंध नहीं होता।

निष्कर्ष यह कि सभी लोगों को चाहिए कि वे हवाला लेन-देन में माहिर लोगों के साथ गोल्फ खेलें। सवाल सिर्फ कमीज और साबुन के ब्रांड का है। हमारे एक मित्र कह रहे थे कि कुछ पाने के लिए कुछ धोना पड़ता है। एक हवाला-सम्राट राजनीति की लॉन्ड्री चलाते थे। कई कमीजें धोते-प्रेस करते उन्होंने लोकतंत्र की सेवा की। आजकल वे सीबीआई के अस्पताल में हैं। अब यदि उन्हें कुछ हो गया, तो लोकतंत्र की कमीजों का क्या होगा। राजनीतिक लॉन्ड्री के अनुभवी कहते हैं कि कुछ पाने के लिए निश्चित रूप से बहुत कुछ धोना पड़ता है। हाथ धो बैठना या हाथ धोकर पीछे पड़ जाना, दोनों के लिए जिगर चाहिए।

धोने के पाउडर बनाने वाली कंपनियां पहले उजली कमीजों पर तुलनात्मक अध्ययन करवा चुकी हैं। उसमें पाया गया कि राजनेता मैली-उजली कमीजों के विज्ञापन के बाद से लगातार रंगीन और गहरे रंग की वेशभूषा धारण करने लगे हैं, ताकि उजलेपन के बेवकूफाना मामलों से छुट्टी पाई जा सके। जैसे दांत मांजने वाली कंपनियों ने उजलेपन को एक ट्यूब में बंद करके महारत पा ली है, वैसे ही सिर्फ दो कमीजों से वॉशिंग पाउडर वाले दुनिया भर का उजलापन पॉलीथीन की थैलियों में पकड़कर डाल चुके हैं।

एक बच्चा जीतते-जीतते रह गया। एक घर वाला इनाम पाते-पाते कमीज के उजलेपन की कमी से पिट गया। एक लड़की इसी उजलेपन की वजह से क्लास में मॉनीटर बन गई। एक औरत अपनी सहेली के साथ साड़ी की ऊंची दुकान में घुसी, तो चौकीदार तक ने उसे हिकारत से और सहेली को इज्जत से देखा, क्योंकि सहेली के कपड़ों की धुलाई किसी और डिटर्जेंट से हुई थी। लेकिन इतनी उजली बातें मेरी बेटी को समझ नहीं आतीं। उसे एक कमीज का असली उजलापन तभी समझ में आता है, जब साबुन की प्रचारक बाई साथ में एक मैली कमीज भी रखे, वरना दो मैली भी साथ हों, तो दोनों उजली लगती हैं।


मुझे लगता है बिटिया ने दोनों ही कमीजें एक-सी देखी थीं। और अब तो कीचड़ को पीटते बच्चे, बहन की गंदी होती यूनिफॉर्म को देखकर कहते हैं- दाग अच्छे हैं। बेटी पूछती है, 'नेताजी भी बचपन में यही खेल खेलते होंगे?'  मैं कहता हूं, 'बेटा, कुछ पाने के लिए कुछ धोना पड़ता है। नेताजी के बचपन-जवानी दोनों के खेल एक ही होते हैं।'

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed