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चुनावी फिजां में तैरते सवाल
कुमार प्रशांत
Updated Thu, 25 Jul 2013 07:46 PM IST
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लंबे समय से देश भूल ही चुका है कि उसके यहां कोई संसद भी है, जहां खुले में लोकतंत्र काम करता दिखाई देता है। संसद के बगैर लोकतंत्र चलाना अब सबको रास आने लगा है। लेकिन सांविधानिक मजबूरियां ऐसी हैं कि संसदीय मामलों की कैबिनेट कमेटी ने घोषणा की है कि संसद का मानसून सत्र पांच से 30 अगस्त के दौरान चलेगा।
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इस सत्र को जुलाई के दूसरे सप्ताह से शुरू होना चाहिए था। इस सत्र में सरकार क्या करेगी और विपक्ष क्या करेगा, यह पता नहीं, लेकिन जो पता चल रहा है, वह यह है कि देश का राजनीतिक मौसम तेजी से बदल रहा है। दिल्ली की गद्दी तय करने वाला चुनाव आया ही चाहता है।
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केंद्र में अपनी सरकार होने का कांग्रेस को एक ही मतलब समझ में आ रहा है कि वह जितनी लोकलुभावन घोषणाएं करना चाहे, करे और जैसे चाहे, उसे लागू भी करे। चुनाव आयोग जब तक प्रभावी हो, तब तक बहुत सारे काम कर डालने की होड़ में कांग्रेस पड़ी है। इसमें सबसे आपाधापी है, वैसे कदम उठाने की, जिससे आर्थिक दशा को सुधरता हुआ बताया जा सके।
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अभी थोड़े दिनों पहले ही सरकार कह रही थी कि लोग सोना खरीदें, क्योंकि यह सबसे सुरक्षित निवेश है, और अब वित्त मंत्री हाथ जोड़कर कह रहे हैं कि सोना न खरीदें। वह ऐसी व्यवस्था बना रहे हैं, जिससे सोना खरीदना-बेचना कठिनतर हो जाए। सरकार अंतरराष्ट्रीय देनदारियों पर लगाम कस कर, आंतरिक बाजार को स्थिर दिखाना चाहती है।
उसने बड़ी चालाकी से उन सारे आर्थिक आंकड़ों को मुट्ठी में कर लिया है, जो देश में सभी प्रकार के निवेश-बाजार का आधार हैं। औद्योगिक उत्पादन के सूचकांक, उपभोक्ता मूल्य सूचकांक तथा ग्रोथ नंबर आदि अभी-अभी तक शेयर बाजार के शुरू होने से पहले-पहल हमारे सामने होते थे कि जिनके आधार पर लोग निवेश करने या निवेश बाहर निकाल लेने का फैसला करते थे। अब सरकार ने ऐसी व्यवस्था कर दी है कि हर दिन ये आंकड़े बाजार बंद होने के बाद ही जारी होते हैं। कारण स्पष्ट है, बाजार से लोग पैसा न निकाल सकें और बाजार की स्थिरता का भ्रम बना रहे।
खाद्यान्न सुरक्षा अधिनियम सरकार ला ही चुकी है। अब वह इसे लोकसभा में स्वीकृति के लिए लाएगी, तो किसी दल की हिम्मत नहीं है कि वह इसका ऐसा विरोध करे कि सरकार को इसे वापस लेना पड़े। चुनाव का जिन्न किसी को भी ऐसा करने नहीं देगा।
ऐसा ही दूसरों मामलों में भी होगा। मतलब सीधा है कि पक्ष-विपक्ष, दोनों इस संसद के आखिरी काल में महज औपचारिकता निभाएंगे। पिछड़ी जातियों-जनजातियों के छात्रों के लिए वजीफे की ऊपरी सीमा बढ़ाना, केंद्रीय कर्मचारियों को मिलने वाली अतिरिक्त महंगाई भत्ते की किस्त जारी करना, खाद की कीमतें कम करना जैसे कई प्रयास किए गए हैं। ऐसी कई दूसरी घोषणाएं हो सकती हैं।
नरेंद्र मोदी प्रधानमंत्री बनने के लिए सज-धज चुके हैं। वह जब भी मुंह खोलते हैं, जमीन-आसमान के तमाम सवालों पर अपनी सुचिंतित घोषणाएं करते हैं। यह कहना कठिन है कि भाजपा के वरिष्ठों को और संघ परिवार के धाकड़ों को मोदी की सारी बातें कितनी रास आ रही हैं। हर बार इन लोगों को मोदी के बचाव में आगे आना पड़ रहा है। लेकिन जब आप पार्टी को बंधुआ मजदूर की स्थिति में ला देते हैं, तब इसके अलावा रास्ता भी क्या है!
भाजपा की इस परेशानी को कांग्रेसी बड़ी सुघड़ता से आसान बना रहे हैं। मोदी ने इधर कुछ टेढ़ा-मेढ़ा कहा और उधर सारी कांग्रेस हुआं-हुआं चिल्लाने लगी! इससे आलम यह बन रहा है, मानो राष्ट्रीय राजनीति का एजेंडा नरेंद्र मोदी तय कर रहे हैं। ऐसे में भाजपा और संघ परिवार के लिए चुपचाप तमाशा देखने से ज्यादा करने को कुछ बचता नहीं है।
ऐसे में सबसे दयनीय स्थिति बनती है मतदाता की। लेकिन वह जानता नहीं है कि दलों की इस आपसी रस्साकशी से बाहर निकलने का भी कोई रास्ता है। ऐसे में, दलों के इस दलदल में फंसे लोकतंत्र को अगर जीवित बचाना है, तो सजग, संगठित और उम्मीदवार के चयन के स्तर पर सक्रिय मतदाता ही इसकी एकमात्र आशा है।
मतदाता के सीधे हस्तक्षेप और अंकुश के भीतर चलने वाले लोकतंत्र की ऐसी दिशा महात्मा गांधी से लेकर जयप्रकाश नारायण तक के पास मिलती है। चुनाव के इस मौसम में ऐसा भी एक बीज लगाकर तो कोई देखे!