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Solar Energy : सौर ऊर्जा कैसे बने ज्यादा टिकाऊ, 'सर्कुलर इकनॉमी' को प्रोत्साहित करना नीतिगत जरूरत

Thu, 04 Aug 2022 07:09 AM IST
Akanksha Tyagi आकांक्षा त्यागी
Updated Thu, 04 Aug 2022 07:09 AM IST
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सार
नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने नीति आयोग की मदद से सौर उद्योग में सर्कुलर इकनॉमी को अपनाने के लिए एक समिति का गठन किया है। हमारी सरकारों को सौर कचरा प्रबंधन, रीसाइकलिंग तकनीक के लिए वित्तीय सहायता देने, और टिकाऊ उत्पादों के लिए शोध एवं विकास को बढ़ावा देने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश देने चाहिए।
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Solar Energy : How to make it more sustainable, policy needed for circular economy
solar energy

विस्तार

सौर ऊर्जा स्वच्छ ऊर्जा की दिशा में भारत के प्रयासों में बहुत महत्वपूर्ण भूमिका निभाएगी। इसके लिए केंद्र सरकार ने अगले आठ वर्षों में सौर ऊर्जा की कुल स्थापित क्षमता को मौजूदा 57 गीगावाट से बढ़ाकर लगभग 280 गीगावाट करने की योजना बनाई है। सरकार ने पॉलीसिलिकॉन, इनगॉट्स, वेफर्स, सोलर फोटोवोल्टिक (पीवी) सेल्स और मॉड्यूल जैसे विभिन्न कल-पुर्जों का घरेलू विनिर्माण बढ़ाने के लिए उत्पादन आधारित प्रोत्साहन योजना शुरू की है। 



इसके लिए चालू वित्त वर्ष में 19 हजार 500 करोड़ रुपये का अतिरिक्त बजट दिया गया है। इन उपायों से भारत को ऊर्जा और रोजगार के क्षेत्र में अपनी बढ़ती जरूरतें पूरी करने में मदद मिलने की उम्मीद है। लेकिन इनके साथ कई तरह की पर्यावरणीय चुनौतियां भी सामने आने वाली हैं। इसलिए सौर ऊर्जा क्षेत्र में ‘सर्कुलर इकनॉमी’ को प्रोत्साहित करना नीतिगत जरूरत बन चुकी है। सर्कुलर इकनॉमी में संसाधनों के जिम्मेदारीपूर्ण इस्तेमाल, कचरों के सुरक्षित निपटान और प्राकृतिक व्यवस्था को पुनर्जीवित करने पर ध्यान दिया जाता है। 


इससे उत्पाद के पर्यावरणीय दुष्प्रभावों को सीमित करने में मदद मिलती है। काउंसिल ऑन एनर्जी, एनवायरनमेंट ऐंड वॉटर (सीईईडब्ल्यू) का एक अध्ययन बताता है कि उद्योग पहले से ही उतना कचरा उत्पादित कर रहे हैं, जितना आने वाले दशकों में पैदा होने का अनुमान था। सोलर सेल और मॉड्यूल के निर्माण में भी काफी कचरा पैदा होता है। इसके अलावा, सोलर मॉड्यूल की ढुलाई, परियोजना निर्माण और संचालन के दौरान भी कचरा पैदा होता है। 

सामान्यतः सौर ऊर्जा परियोजनाओं में लगने वाले सोलर मॉड्यूल की उपयोगी जीवन अवधि 25 साल होती है। इसके बाद उनसे बिजली उत्पादन घट जाता है, जिसके बाद उन्हें बदलना जरूरी हो जाता है। इस चरण में कचरे की मात्रा में भी बढ़ोतरी होने का अनुमान है। सौर मॉड्यूल में कैडमियम, टेल्यूरियम और सीसा जैसे जहरीले रसायन इस्तेमाल होते हैं। इनके उचित निस्तारण पर ज्यादा ध्यान देने की जरूरत है। लैंडफिलिंग साइट्स के जरिये सौर क्षेत्र से जुड़े कचरे का गैर-जिम्मेदार प्रबंधन और निपटान पर्यावरण पर विपरीत असर डाल सकता है। 

हानिकारक रसायनों का कोई भी रिसाव हमारे भोजन व जलापूर्ति को दूषित कर सकता है। इतना ही नहीं, आवश्यक कच्चे माल की बढ़ती मांग से जुड़ी चुनौतियां भी समय के साथ सामने आएंगी। ऐसी स्थिति में, सर्कुलर इकनॉमी को अपनाकर इन चुनौतियों से पार पाया जा सकता है। इसके लिए उद्योगों को ‘3 आर’ (रिड्यूस, री-यूज और रीसाइकल) को अपनाने में तेजी दिखानी चाहिए। निर्माण कार्य में ‘रिड्यूस’ (कटौती) सिद्धांत को अपनाते हुए सौर ऊर्जा उद्योग के हानिकारक पदार्थों को उनकी सुरक्षित सीमा में रखते हुए टिकाऊ सोलर सेल्स और मॉड्यूल्स बनाने के बारे में ध्यान देना चाहिए। 

इसके अलावा, डिजाइन बनाने के स्तर पर रीसाइकलिंग की सरलता का भी ध्यान रखा जाना चाहिए, जिससे कचरा प्रबंधन में कम से कम ऊर्जा का इस्तेमाल हो। ‘री-यूज’ (पुन: उपयोग) को बढ़ावा देते हुए, उद्योगों को क्षतिग्रस्त मॉड्यूल की मरम्मत को प्रोत्साहित करना चाहिए और उन्हें दोबारा इस्तेमाल करने के लिए नवाचार करने चाहिए, जो उन्हें बहुत जल्द बेकार होने या कचरे में बदलने से रोकते हैं। सर्कुलर इकनॉमी की इन खूबियों को ध्यान में रखकर, भारत ने सौर उद्योग में इसे प्रोत्साहित करने के लिए कई कदम उठाए हैं। 

नवीन और नवीकरणीय ऊर्जा मंत्रालय ने नीति आयोग की मदद से सौर उद्योग में सर्कुलर इकनॉमी को अपनाने के लिए एक समिति का गठन किया है। हमारी सरकारों को सौर कचरा प्रबंधन, रीसाइकलिंग तकनीक के लिए वित्तीय सहायता देने, और टिकाऊ उत्पादों के लिए शोध एवं विकास को बढ़ावा देने के लिए स्पष्ट दिशा-निर्देश देने चाहिए। मजबूत रीसाइकलिंग इकोसिस्टम के बगैर भारत का स्वच्छ ऊर्जा स्रोतों को अपनाने का प्रयास अधूरा रहेगा और जलवायु परिवर्तन रोकने का कदम भी अपर्याप्त होगा। (-लेखिका सीईईडब्ल्यू में प्रोग्राम एसोसिएट हैं।)

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