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तेलंगाना बनाएंगे तो गोरखालैंड क्यों नहीं

Fri, 22 Feb 2013 09:46 PM IST
कृपाशंकर चौबे
कृपाशंकर चौबे Updated Fri, 22 Feb 2013 09:46 PM IST
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so why not create gorkhaland

यह विचित्र है कि सत्ता में आने के बाद ममता बनर्जी ने जिस गोरखा जन मुक्ति मोर्चा के हक में कदम उठाया, वही अब स्वतंत्र गोरखालैंड राज्य की मांग को लेकर अगले नौ मार्च से आंदोलन करने जा रहा है।

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दरअसल अखिल भारतीय गोरखा लीग के नेता मदन तमांग की हत्या के मामले में इधर पुलिस-सीबीआई की बढ़ी सक्रियता ने मोर्चे की मुश्किलें बढ़ा दी हैं। फिर पश्चिम बंगाल मंत्रिमंडल द्वारा दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में लेपचा विकास परिषद बनाने के प्रस्ताव को बीते दिनों अनुमोदित कर देने से मोर्चा आशंकित है कि लेपचावासी उनसे दूर हो सकते हैं।
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लेपचा समुदाय को दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र का मूल निवासी माना जाता है और वहां उनकी आबादी तीस प्रतिशत है। बदली परिस्थितियों में मोर्चा अब प्रस्तावित लेपचा विकास परिषद को गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) के अंतर्गत रखने की मांग कर रहा है। लेकिन मुख्यमंत्री का स्पष्ट कहना है कि अलग गोरखालैंड राज्य की मांग वह कतई स्वीकार नहीं करेंगी।
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जबकि डेढ़ साल के अंतराल के बाद मोर्चा ने अलग गोरखालैंड राज्य के लिए नए सिरे से आंदोलन शुरू करते हुए पिछले दिनों दिल्ली के जंतर मंतर में चार दिनों का धरना भी दिया था। मोर्चे की मांग है कि तेलंगाना का गठन करने पर अलग गोरखालैंड भी बनाना होगा, क्योंकि गोरखालैंड की मांग तेलंगाना से काफी पुरानी है। गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) से भी उसके सभी सदस्य इस्तीफा दे सकते हैं।

इसी तरह का आंदोलन मोर्चा ने 2007 में छेड़ा था, जिसके फलस्वरूप तब दार्जिलिंग पर्वतीय क्षेत्र में पर्यटकों का जाना दूभर हो गया था। 2007 से 2011 के पूर्वार्ध तक उसके जंगी आंदोलन के कारण वह इलाका बेतरह अशांत रहा। मुख्यमंत्री बनने के बाद ममता बनर्जी ने ऐसा सकारात्मक कदम उठाया कि मोर्चे को जंगी आंदोलन स्थगित करने पर विवश होना पड़ा था।

ममता ने 2011 में ही गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन (जीटीए) समझौता किया। उस समझौते के आलोक में बीते वर्ष 29 जुलाई को 45 सीटों वाले जीटीए का चुनाव हुआ, जिसमें मोर्चे को एकतरफा जीत मिली। जीटीए का मुखिया बनने के बाद बिमल गुरुंग के पास 59 विभागों का प्रशासन आ गया, तो उनका जंगी आंदोलन स्थगित हो गया था।

दार्जिलिंग को अलग प्रशासनिक इकाई का दर्जा देने की मांग एक शताब्दी से भी ज्यादा पुरानी है। हिलमैंस एसोसिएशन ने 1907 में मिंटो-मोर्ले कमीशन को ज्ञापन देकर दार्जिलिंग को स्वायत्त प्रशासनिक इकाई का दर्जा देने की मांग की थी। आजादी के बाद भी ऑल इंडिया गोरखा लीग ने अलग गोरखालैंड राज्य की मांग जीवित रखी। उसके नेता देवप्रकाश राई दार्जिलिंग के सबसे ताकतवर नेता थे।

उनकी मृत्यु के बाद जब लीग निष्प्रभावी हो गई, तब गोरखा राष्ट्रीय मुक्ति मोर्चा के अध्यक्ष सुभाष घीसिंग ने वह जगह भरी। उन्हीं की कोशिशों से दार्जिलिंग पर्वतीय परिषद का गठन हुआ। लेकिन दो दशकों तक परिषद का मुखिया बने रहने के बावजूद वह पहाड़ का विकास करने में तो विफल रहे ही, करोड़ों रुपये की आर्थिक गड़बड़ी के आरोपों से भी घिर गए। उसके बाद से पहाड़ पर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा का दबदबा है।

मोर्चे की मांगों के प्रति ममता बनर्जी की सरकार ने अतीत में कभी सख्त रुख अख्तियार नहीं किया था। इसका लाभ यह हुआ था कि वे गोरखालैंड टेरिटोरियल एडमिनिस्ट्रेशन की स्थापना के लिए मोर्चे को राजी करा सकीं। नतीजतन केंद्र व राज्य की सरकारों तथा गोरखा जनमुक्ति मोर्चे के बीच त्रिपक्षीय समझौता हुआ था। लेकिन जाहिर है, यह अंतिम समाधान नहीं था।


दार्जिलिंग के लोगों की बड़ी शिकायत यह रही है कि सरकार इस क्षेत्र से राजस्व तो खूब उगाहती है, पर यहां के विकास पर मामूली खर्च करती है। तितरफा समझौते में जीटीए को भारी बजट दिया गया और उसे विकास कार्यों में अपने हिसाब से खर्च करने की आजादी भी दी गई। पर गोरखा जनमुक्ति मोर्चा अब उससे भी बड़ा स्वप्न देख रहा है। इसी कारण स्वतंत्र गोरखालैंड की मांग फिर जोर पकड़ रही है।

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