{"_id":"5a366a4a4f1c1b6a118b8504","slug":"so-that-rivers-stay","type":"story","status":"publish","title_hn":"ताकि बची रहें नदियां","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
ताकि बची रहें नदियां
पत्रलेखा चटर्जी
Updated Wed, 20 Dec 2017 09:16 AM IST
विज्ञापन
निरंतर एक्सेस के लिए सब्सक्राइब करें
बावड़ी
दुनिया के सबसे प्रसिद्ध पर्यावरणविदों में से एक और दिल्ली स्थित विज्ञान एवं पर्यावरण केंद्र (सीएसई) की महानिदेशक सुनीता नारायण जीवंत किंवदंतियों में से एक हैं। हाल ही में सुनीता नारायण से मेरी मुलाकात हुई, हालांकि मैं उन्हें बीती सदी के नब्बे के दशक से ही जानती हूं। सुनीता नारायण की नई किताब कॉन्फ्लिक्ट ऑफ इंटरेस्ट हाल ही में प्रकाशित हुई हैं, जिसमें भारत के हरित आंदोलन के माध्यम से उनके जीवन-सफर का वर्णन है। और इस किताब ने प्रकाशित होते ही धूम मचा दी है। इस पुस्तक में सबसे सम्मोहक अध्याय पानी के बारे में है, जिसमें पानी के प्रबंधन से संबंधित विज्ञान और कला को फिर से सीखने की जरूरत बताई गई है और मृतप्राय ज्ञान-धारा को पुनर्जीवित करने की बात कही गई है।
आगे पढ़ने के लिए लॉगिन या रजिस्टर करें
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ रजिस्टर्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
अमर उजाला प्रीमियम लेख सिर्फ सब्सक्राइब्ड पाठकों के लिए ही उपलब्ध हैं
फ्री ई-पेपर
सभी विशेष आलेख
सीमित विज्ञापन
सब्सक्राइब करें
देश के समक्ष मौजूदा कई चुनौतियों से जूझने के लिए अपने तकनीकी-प्रबंधकीय प्रतिक्रियाओं के जुनून में भारत ने अपने प्राचीन स्वदेशी ज्ञान से मुंह फेर लिया है, जबकि राजनीतिक वर्ग अतीत की महिमा के बारे में जोर-जोर से गुणगान करता है। क्या हम एक ही समय अतीत का गुणगान और उसकी उपेक्षा भी करते हैं?
मेरे सवाल के जवाब में सुनीता ने एक जोरदार प्रतिक्रिया दी। उन्होंने बताया कि एक ओर तो हम प्राचीन अतीत के बारे में पूरी तरह से रोमांटिक हैं, दूसरी ओर हम अपनी चुनौतियों का समाधान तलाशने के लिए प्रौद्योगिकी पर इतने निर्भर हैं कि हम खुद को आधुनिक मानते हैं। यह अजीब विरोधाभास है। हम जिस चीज में सक्षम नहीं हैं, वह यह है कि ‘हम इतिहास और प्राचीन ज्ञान को भविष्य के संदर्भ में सुस्थापित नहीं कर सकते।
जैसा कि सुनीता बताती हैं, भारत के पास एक अत्यंत समृद्ध जल संस्कृति थी। लेकिन यमुना की एक धारा पूर्वी दिल्ली से गायब हो गई, या हमारी कई नदियों और झीलों की आज जो स्थिति है, उसके बारे में क्या कभी किसी ने सोचा है? आखिर भारत की समृद्ध जल संस्कृति क्यों बर्बाद हो गई? सुनीता का कहना है कि ऐसा इसलिए हुआ, क्योंकि हमने पानी के संचालन और प्रबंधन का जिम्मा राज्यों को सौंप दिया और पानी पर सामुदायिक स्वामित्व तथा सामुदायिक ज्ञान को नष्ट कर दिया। पानी के उस ज्ञान को वापस लाने और अपने भविष्य को सुखद बनाने के लिए हमें समुदायों को सशक्त बनाने की आवश्यकता है।
इसलिए यह सिर्फ एक प्रौद्योगिकी से संबंधित मुद्दा नहीं है, बल्कि एक सामाजिक मुद्दा भी है। अपनी पुस्तक में सुनीता नारायण कई भारतीय शहरों का जिक्र करती हैं, जिसने जल संस्कृति की विरासत के अवशेषों को ढक दिया है। जैसे राजस्थान के जैसलमेर को ही ले लीजिए। यह ऐसा शहर है, जहां मात्र पचास से सौ मिलीमीटर वर्षा होती है, लेकिन यह पश्चिम से लेकर पूरब तक के व्यापारियों के कारवां का एक पड़ाव था। आखिर इसने कैसे एक समृद्ध सभ्यता का निर्माण किया था? इसका जवाब इस शहर के नियोजन में छिपा है, जहां छतों से लेकर टैंक तक वर्षा जल के संचयन की शानदार व्यवस्था थी। यह सब कुछ इसलिए किया गया था, ताकि भविष्य में कठिन, प्रतिकूल परिस्थिति के बावजूद पानी की सुरक्षा सुनिश्चित हो सके।
सुनीता लिखती हैं, 'देश के हर क्षेत्र में वर्षा जल के संचयन, संरक्षण और सिंचाई व पेयजल के रूप में इसके इस्तेमाल के लिए अपना एक अनूठा तरीका था। हर प्रणाली को क्षेत्र की विशेष, पारिस्थितिकीय जरूरतों की पूर्ति के लिए अनुकूलित किया गया था, लेकिन हर प्रणाली तकनीकी रूप से परिष्कृत थी। दरअसल वे इंजीनियरिंग का चमत्कार थी, जो क्षेत्र की बारिश की आमद को सबसे बेहतर तरीके से संरक्षित करने के लिए बनाई गई थीं। बारिश के साथ जीना, बारिश को अनुकूलित करना, यह जीवन का मंत्र था।' इस मरनासन्न ज्ञान को हमें पुनर्जीवित करना होगा, क्योंकि पानी की कमी पूरे देश में एक संवेदनशील मुद्दा बन गई है। भारत अभी 'पानी के तनाव' को झेल रहा है और धीरे-धीरे उस स्थिति की ओर बढ़ रहा है, जिसे विशेषज्ञ 'पानी की कमी की स्थिति' कहते हैं।
देश के लाखों लोगों की पहुंच केवल उसी पानी तक है, जो एक या दूसरे प्रदूषकों के कारण प्रदूषित है, बहुत से लोगों को वह पानी भी नहीं मिलता है। आधिकारिक आंकड़े के मुताबिक, देश के 640 जिलों में से 320 जिलों का पानी फ्लोराइड, आर्सेनिक, और क्रोमियम व शीशा जैसे भारी धातु के कारण प्रदृषित है। प्रदूषित पानी प्रत्यक्ष रूप से छह लाख लोगों को प्रभावित करता है। प्रदूषित पानी के कारण पांच बीमारियों ने सात वर्षों में 18,000 लोगों की जान ली है। प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता यदि 1,700 क्यूबिक मीटर से कम हो, तो उसे पानी से संबंधित तनावपूर्ण स्थिति माना जाता है और भारत में इस समय प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता मात्र 1,545 क्यूबिक मीटर है। विशेषज्ञों को आशंका है कि प्रति व्यक्ति पानी की उपलब्धता वर्ष 2025 में घटकर मात्र 1,341 क्यूबिक मीटर रह सकती है और वर्ष 2050 में उससे भी कम मात्र 1,140 क्यूबिक मीटर रह सकती है।
जब हम तेजी से भूजल की तलाश में बोरबेल ड्रिल के बढ़ते तनाव के बारे में पढ़ते हैं, तो हमें इस बात का ध्यान रखना चाहिए। देश के कई क्षेत्र भूजल के अतिशय दोहन की चपेट में हैं, जिसके कारण भूजल का स्तर और नीचे चला जा रहा है। यह अनिश्चित भविष्य का सूचक है।
अतीत की महिमा का गुणगान करना और अतीत को रोमांटिक बनाना आसान है। अब जबकि हम वर्ष 2017 को अलविदा कहने वाले हैं और एक नए वर्ष के स्वागत के लिए तैयार हो रहे हैं, तब हम अपने प्राचीन ज्ञान का वास्तविक और व्यावहारिक उपयोग करने के लिए अतीत की महिमा का गुणगान करें। जल संरक्षण के लाभों को कैसे हासिल किया जा सकता है, यह जानना अत्यंत जरूरी है, चाहे वह आधुनिक तरीके से हो या जल संरक्षण के प्राचीन ढांचों से।