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इतने कितने प्रधानमंत्री
अनूप वाजपेयी
Updated Mon, 11 Feb 2013 09:11 AM IST
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एक कवि की पंक्तियां, राजनीति की मंडी बड़ी नशीली है, इस मंडी में सबने मदिरा पी ली है, अचानक मेरी जुबान पर आकर लड़खड़ाने लगी है। इसने मेरा ध्यान एक ब्रांडेड शराब की ओर खींचा, जिस पर आकर्षक ढंग से पीएम लिखा रहता है। पीएम यानी प्रधानमंत्री। पहले मैं इत्तफाक नहीं रखता था कि सबने मदिरा पी ली है, लेकिन अब ऐसा लगने लगा है। जिस पीएम को लेकर इन दिनों जुबानी जमा खर्च चल रहा है, उसका नशा लोकसभा चुनाव के बाद ही उतरने वाला है।
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जनता अपनी तर्जनी में धार देने में जुटी है। उसे लग रहा है कि आम चुनाव में आम आदमी अपनी ताकत दिखाएगा। जबकि देश के नेता चुनाव से पहले ही प्रधानमंत्री का टंटा समाप्त कर लेना चाहते हैं। सभी को ब्रांडेड प्रधानमंत्री चाहिए। मौटे तौर पर इस बार भी दो टीमें आमने-सामने दिख रही हैं। कुछ ऐसे होंगे, जो पहले ए के साथ होंगे और चुनाव के बाद बी के साथ हो लें या फिर बिना ए-बी के पहले अपनी ब्रांडिंग करेंगे, उसके बाद किसी टीम को बाहर से धक्का लगा देंगे।
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बचपन से यही सुनता आया हूं कि विजयी पार्टी के सांसद अपने नेता के रूप में प्रधानमंत्री का चयन करते हैं। लेकिन इन दिनों व्यक्तिगत स्तर पर प्रधानमंत्री चुने जा रहे हैं। एक नेता हैं, जिन्होंने व्यक्तिगत स्तर पर यह तय कर लिया है। अब उन्हें जो चेहरा पसंद है, उस पर पार्टी मुहर लगा दे। जबकि उनकी एक सहयोगी टीम को दूसरी सहयोगी पार्टी अधिक भा रही है। लंबे समय से वेट कर रहे एक नेता ने अब भी लाइन नहीं छोड़ी है। उनका धैर्य भी जायज है।
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भारत जैसे लोकतंत्र में प्रधानमंत्री पद कब किसके पास अचानक टपक पड़े, कहा नहीं जा सकता। नेता जी सांसद बने, न बनें, लेकिन ब्रांडेड प्रधानमंत्री के लिए ढेरों विकल्प हैं। एक नेता यह मानते हैं कि ब्रांडेड प्रधानमंत्री वही बनता है, जिसमें नेतृत्व का गुण खून में ही हो। एक तबके का कहना है कि छप्पन इंच छाती प्रधानमंत्री बनने की अहम योग्यता है। तो दूसरा तबका कहता है कि जिस परिवार के लोग शुरू से ही प्रधानमंत्री बनते आ रहे हैं, अब उन्हें मौका नहीं देना इस देश की समृद्ध विरासत के साथ अन्याय करना होगा। रही-सही कसर टेलीविजन चैनलों ने पूरी कर दी है। उनका बस चले, तो एक घंटे की गरमागरम बहस के बाद हर उम्मीदवार को प्रधानमंत्री का सर्टिफिकेट दे दें। मुश्किल में आम आदमी है। वह किसको चुनेगा!