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ताकि किसान भी चैन की सांस लें
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वी एम सिंह
देश के अन्नदाताओं की हालत दिन पर दिन पतली होती जा रही है। खेती किसान के लिए घाटे का सौदा साबित हो रही है। इसलिए पिछले कई दशकों से किसान खेती के साथ-साथ गांव छोड़कर पलायन कर रहा है। उसके बावजूद न राज्य सरकारों को किसानों की फिक्र है, न ही केंद्र सरकार को। वर्ष 2014 में नरेंद्र भाई मोदी ने किसानों की नब्ज पकड़ते हुए उनकी समस्याओं के निदान की बात कही, तो किसानों को लगा कि अब उनकी भी सुनी जाएगी, और देश की 65 फीसदी खेती से जुड़ी जनता ने भाजपा को बड़ी जीत दिलाई। मोदी भी किसान चैनल, फसल बीमा योजना और हेल्थ कार्ड आदि अनेक योजनाएं लेकर आए। यह अलग बात है कि ये योजनाएं दूर-दूर तक कार्यान्वित होती नजर नहीं आ रहीं।
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हाल ही में मोदी सरकार ने केंद्रीय कर्मचारियों के लिए 7वें वेतन आयोग की सिफारिशों को मानते हुए 23 फीसदी से ज्यादा वेतन वृद्धि का एलान किया है। जबकि आजादी के इतने वर्षों बाद भी किसान की आय सुनिश्चित करने के लिए या महंगाई भत्ते के रूप में फसलों पर बोनस देने के लिए एक भी ठोस कदम नहीं उठाया गया। किसानों की आमदनी बढ़ाने के लिए यूपीए के साथ ही भाजपा सरकार ने भी वायदे बहुत किए, पर उनको अमली-जामा नहीं पहनाया गया। चुनावी घोषणापत्र में स्वामीनाथन आयोग की रिपोर्ट लागू करने की बात तो कही गई, लेकिन चुनाव जीतने के बाद उसे ठंडे बस्ते में डाल दिया गया।
प्रधानमंत्री ने उत्तर प्रदेश में 2014 की अपनी हर रैली में कहा था कि गन्ना किसान अगर अपना बकाया भुगतान चाहते हैं, तो कमल खिलाएं, भाजपा गन्ना किसानों की तकदीर बदल देगी। मोदी जी ने अपनी सरकार के दो साल का ब्योरा देते हुए विगत 26 मई को सहारनपुर की रैली में गन्ना मिल मालिकों को चेतावनी देते हुए देश को बताया था कि मई, 2014 में गन्ना किसानों का 14,000 करोड़ रुपये बकाया था, जो घटकर 700-800 करोड़ रह गया है। ये आंकड़े सही नहीं हैं। उस समय उत्तर प्रदेश के किसानों के 6,400 करोड़ रुपये (5,795 करोड़ मूल एवं 600 करोड़ ब्याज) बकाया थे और जिस समय भाजपा की सरकार सत्ता में आई, उस वक्त भी लगभग यही आंकड़े थे। जुलाई महीने में मोदी जी ने फेसबुक पर लिखा कि उन्हें गन्ना किसानों की चिंता है, और वह इस पर नजर रखे हुए हैं और बकाया राशि 1,925 करोड़ रुपये बताई गई। अगर सहारनपुर रैली में 700-800 करोड़ रुपये गन्ने का बकाया भुगतान था, तो अब 1,925 करोड़ रुपये कैसे हो गया? चीनी मिलें तो अप्रैल में ही बंद हो गईं। ये आंकड़े गलत हैं, क्योंकि आज भी किसानों का 5,000 करोड़ रुपये का बकाया भुगतान है। हो सकता है कि प्रधानमंत्री की नीयत साफ हो, लेकिन यह सब कार्यान्वित कैसे हो, इसकी नीति उनकी कार्यसूची में नजर नहीं आती।
सरकार एवं सत्ताधारी पार्टी की कथनी-करनी में फर्क नहीं होना चाहिए। जहां मोदी जी ने सहारनपुर में मिल मालिकों को चेतावनी दी थी, वहीं मेरठ में भाजपा के बूथ अध्यक्ष सम्मेलन में पार्टी मिल मालिकों के साथ खड़ी दिखी।
किसानों की आय पिछले तीन साल में बढ़ने के बजाय घटी है। उत्तर प्रदेश में गन्ना किसानों को पिछले चार साल से गन्ने का दाम 280 रुपये प्रति क्विंटल ही मिल रहा है, इसमें एक पैसे की बढ़ोतरी नहीं हुई है, और वहीं बकाया भुगतान की सीमा बढ़ती जा रही है। गेहूं के न्यूनतम समर्थन मूल्य में पिछले तीन साल में केवल 125 रुपये की मामूली बढ़ोतरी हुई है। यह बात अलग है कि फसल के समय कई राज्यों में गेहूं की सरकारी खरीद सुचारु नहीं होने से किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से भी 200-300 रुपये कम में गेहूं बेचना पड़ता है।
वर्ष 2014 में बासमती धान की कीमत 4,000 से 5,000 रुपये प्रति क्विटंल थी, लेकिन 2015-16 में उसी धान की कीमत घटकर 1,500 से 2,000 रुपये रह गई। धान की कीमत आधी रह गई, लेकिन बाजार में चावल का दाम जस का तस है। प्याज, टमाटर और आलू उपजाने वाले किसानों की हालत तो और भी दयनीय है। मजदूरी, डीजल, बीज, खाद, कीटनाशक और कृषि यंत्रों की कीमत में हो रही बढ़ोतरी से किसानों की लागत तो लगातार बढ़ रही है, दूसरी ओर, आय में कटौती हो रही है। रबी विपणन सीजन 2014-15 में गेहूं एवं अन्य फसलें ओलावृष्टि से बर्बाद हो गईं। राहत के नाम पर किसानों को ठगा गया और इलाहबाद उच्च न्यायालय द्वारा दिए गए छह अक्तूबर, 2015 के आदेश के बाद भी डेढ़ करोड़ किसानों में से एक को भी मुआवजा नहीं मिला। वहीं केंद्र सरकार भूमि अधिग्रहण अध्यादेश, 2015 लाई और छह माह विरोध के बाद उसने इसे वापस तो लिया, लेकिन आज भी केंद्र सरकार द्वारा पुराने कानून के तहत किसानों को मुआवजा दिया जा रहा है। दलहन और तिलहनी फसलों के न्यूनतम समर्थन मूल्य तो तय किए जाते हैं, पर सरकारी खरीद की गारंटी नहीं होने के कारण अधिकांश किसानों को न्यूनतम समर्थन मूल्य से नीचे बेचना पड़ता है। अतः दलहन और तिलहन की पैदावार बढ़ने के बजाय घट रही है और आजादी के इतने साल बाद भी हम आयात पर निर्भर हैं। ऊपर से नीलगायों, जंगली सूअर और बंदरों के कारण दलहन फसलों को भारी नुकसान हो रहा है।
मौजूदा सरकार के पास तीन साल बचे हैं। जिस भरोसे और आशा से किसानों ने भाजपा को वोट दिया था, उसे पूरा किया जा सकता है। किसान को खेती से जोड़कर, कृषि को घाटे के सौदे से मुनाफे का सौदा बनाने की तरफ कदम बढ़ाने होंगे। जब-जब कर्मचारियों को महंगाई भत्ता दिए जाने की जरूरत महसूस हो, तब-तब यह सरकार महसूस करे कि किसान भी उसी महंगाई का शिकार है, इसलिए वह उसे भी समर्थन मूल्य पर उसी औसत में बोनस देने का एलान करे, जिससे कृषि प्रधान देश में किसान भी चैन की सांस ले सकें।