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स्मार्ट पुलिसिंग की ओर बढ़ते कदम: तकनीक और नए कानूनों से बदलती कानून व्यवस्था
Tue, 17 Feb 2026 07:56 AM IST
आर विक्रम सिंह
विक्रम सिंह, पूर्व डीजीपी, यूपी
विक्रम सिंह, पूर्व डीजीपी, यूपी
Published by: आर विक्रम सिंह
Updated Tue, 17 Feb 2026 07:56 AM IST
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स्मार्ट पुलिसिंग
- फोटो :
ANI
विस्तार
भारत जैसे एक जागृत राष्ट्र के लिए बेहतर कानून व्यवस्था और अपराध नियंत्रण सर्वोच्च प्राथमिकता होनी चाहिए। यह हर्ष का विषय है कि इस दिशा में विगत दो वर्षों में बहुत ठोस कार्रवाई भी की गई है। इसमें सबसे उल्लेखनीय है नक्सलपंथियों और चरमपंथियों के विरुद्ध अभियान चलाकर की गई कार्रवाई। इसमें अभूतपूर्व सफलता भी मिली है। दावा किया जा रहा है कि 31 मार्च, 2026 तक भारत में नक्सलपंथी गतिविधियों पर पूरी तरह से नियंत्रण हो जाएगा।जिन स्थानों पर सफलताएं मिली हैं, वे सभी अत्यंत संवेदनशील स्थान थे, जहां पर सुरक्षाबलों को उच्च तकनीक के प्रयोग के कारण अग्रिम सूचना संकलन और उस पर प्रभावी कार्रवाई करने में सफलता मिली। नतीजतन, न केवल बड़ी संख्या में ईनामी चरमपंथी निष्क्रिय किए गए, अपितु भारी तादाद में उन्होंने आत्मसमर्पण भी किया। इससे पुलिस की विश्वसनीयता पर भरोसा बढ़ा है। भारतीय संविधान की सातवीं अनुसूची के अनुसार, पुलिस व लोक व्यवस्था राज्य के अधीन आते हैं। उसे सुदृढ़ करने के उद्देश्य से समस्त राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों में पुलिस आधुनिकीकरण को लेकर एक योजना चलाई जा रही है, जिसे एएसयूएमपी का नाम दिया गया है। इसके अंतर्गत बहुत व्यापक कार्य योजनाएं शामिल हैं, जिसमें प्रमुखता से सभी राज्यों एवं केंद्रशासित प्रदेशों के पुलिस बलों के आधुनिकीकरण, संसाधनों की उपलब्धता और उन्हें आधुनिकतम तकनीक एवं हथियारों से सुसज्जित किए जाने का प्रावधान है।
यह सर्वविदित है कि उपकरण और शस्त्र कुछ भी हों, पुलिस अधिकारियों और कर्मचारियों के क्षमता निर्माण हेतु विशेष प्रयास किए जाने की आवश्यकता है। इस दिशा में एक सुविचारित कार्ययोजना है, जिसके अंतर्गत साइबर अपराधों की जांच, फोरेंसिक अभियोजन एवं अन्य विशेष पहलुओं पर विशिष्ट पाठ्यक्रम तैयार किया गया है, जो समस्त अधिकारियों के लिए उपलब्ध होगा। क्षमता निर्माण के इस कार्य को एक पोर्टल और ऑनलाइन शिक्षा के जरिये सुनिश्चित किया जाएगा। उल्लेखनीय है कि विभिन्न राज्यों और केंद्रशासित प्रदेशों के एक लाख से अधिक पुलिस अधिकारी इसमें पंजीकृत हुए हैं और लगभग अस्सी हजार से अधिक को प्रमाण पत्र भी निर्गत किए जा चुके हैं। महिलाओं और बच्चों के प्रति बढ़ते साइबर अपराध, साइबर स्टॉकिंग एवं अश्लील कृत्यों के मद्देनजर पुनः विवेचकों और पुलिस विभाग के क्षमता निर्माण तथा साइबर फोरेंसिक सह-प्रशिक्षण प्रयोगशालाओं की स्थापना की जा रही है। इसके अतिरिक्त, साइबर विशेषज्ञों की विशेष भर्ती का भी प्रावधान है। पुलिस कर्मियों के साथ लगभग चौबीस हजार न्यायिक अधिकारियों को भी इस दिशा में प्रशिक्षित किया जा रहा है, ताकि उनकी जागरूकता बढ़े और अभियोजन में आशातीत सफलता मिले।
यह संतोष का विषय है कि साइबर अपराधों को लेकर प्रवर्तन एजेंसियों के साथ केंद्रीय सुरक्षा बलों को भी जागरूक व प्रशिक्षित किया जा रहा है। केंद्र सरकार ने अत्यंत क्रांतिकारी कदम उठाते हुए 1861 और उसके बाद के तीन प्रमुख कानूनों को बदला है। इंडियन पीनल कोड को भारतीय न्याय संहिता, क्रिमिनल प्रोसीजर कोड को भारतीय नागरिक सुरक्षा संहिता तथा इंडियन एविडेंस एक्ट को भारतीय साक्ष्य अधिनियम में रूपांतरित किया गया है। ये तीन नए कानून किसी क्रांति से कम नहीं हैं। इस क्रांतिकारी पहल के तहत जहां साइबर अपराध, इलेक्ट्रॉनिक साक्ष्यों और इन तमाम पक्षों का समावेश किया गया है, वहीं न्यायालयों द्वारा मामले के निष्पादन के लिए समय-सीमा भी निर्धारित की गई है। नए अपराध और अपराधियों के संबंध में, जो वर्षों और दशकों से कानून में समावेश नहीं हो पाए थे, उनका इन कानूनों में समावेश किया गया है। न्यायालयों में लंबित पांच करोड़ उपवादों के शीघ्र और न्यायोचित निपटारे को सुनिश्चित करने हेतु कार्य योजनाएं तैयार की जा रही हैं। इसके लिए नई तकनीकों का उपयोग किया जा रहा है। विश्व के सर्वश्रेष्ठ उपकरण और तकनीकों में रोबोटिक्स, ड्रोन, एआई, फेशियल रिकॉग्निशन सॉफ्टवेयर आदि सम्मिलित हैं। इनका प्रयोग पुलिस बल द्वारा किया जा रहा है, जिससे अपराध, अपराधियों व चरमपंथियों पर नियंत्रण बना रहेगा और जनता में सुरक्षा की भावना जागृत होगी। निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि 25 वर्ष पूर्व जो प्रशिक्षण और शैक्षिक स्तर निरीक्षक या राजपत्रित अधिकारियों का होता था, आज वह कॉन्स्टेबल स्तर के कर्मचारियों का है। पुलिस और अर्धसैनिक बलों में महिलाओं की भरपूर भर्ती की जा रही है, जिसके सकारात्मक परिणाम सामने आ रहे हैं। जनता को पुलिस का मानवीय चेहरा दिखाई पड़ रहा है, सत्यनिष्ठा उच्च कोटि की हो गई है और इसके साथ-साथ विश्वसनीयता का स्तर भी बहुत अच्छा हुआ है।
निस्संदेह, इसे मूर्त रूप देने के लिए प्रधानमंत्री जी ने 2014 की पुलिस महानिदेशक गोष्ठी में पुलिस विभाग को एक छोटा-सा उपनाम दिया था, जिसे ‘स्मार्ट पुलिसिंग’ कहा गया। उसके अनुरूप आज 2026 में पुलिस को सामंती से स्मार्ट बनाने में बहुत सार्थक प्रयास किए गए हैं।