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हौले-हौले से झाड़ू चलती है
संजय जोशी
Updated Tue, 07 Oct 2014 06:17 PM IST
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जब किसी सफाई अभियान में झाड़ू लगाई जाती है, तो झाड़ू हौले-हौले से चलती दिखती है। झाड़ू लगाने वाले के चेहरे पर विजयी मुस्कान होती है और उसका पूरा ध्यान कैमरों की ओर होता है। साफ-सफाई तो बिना नहाए व पुराने कपड़े पहनकर किए जाने की परंपरा है, लेकिन स्वच्छता अभियान तो प्रेस किए कपड़े, पॉलिश किए हुए जूते और विशेष प्रकार की खुशबू वाले परफ्यूम से महकता रहता है, क्योंकि यह तो सांकेतिक अभियान है।
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असल में सफाई तो वही करेंगे, जिन्हें करना है। इस अभियान से स्वच्छता के प्रति देश में जागरूकता तो आई ही, लेकिन जिन्होंने अपनी नौकरी के अंतिम पड़ाव तक कभी अपनी टेबल पर कपड़ा न मारा था, उन्होंने भी हाथ में झाड़ू उठा ली। उनके हाथों में झाड़ू देखकर अधीनस्थ कर्मचारी मन ही मन जरूर सोचते होंगे कि अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे।
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कुछ दृश्य ऐसे भी थे, जिनमें एक झाड़ू पकड़े हुए व्यक्ति को चार-पांच लोग घेरे हुए थे। यह कुछ ऐसा लग रहा था, मानो बेट्समैन को चार-पांच फील्डर घेरे हुए हों। कुछ दृश्य तो साफ जगह को ही साफ करने के अभिनय जैसे लग रहे थे। साहबों के हाथ में झाड़ू देखकर हर कोई अभिभूत था।
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एक ने कहा, और कुछ हो या न हो, अगर इतना ही ये लोग समझ लें कि गंदगी नहीं करनी है, तो समझो आधी सफाई हो गई। कुछ अधिकारियों एवं नेताओं को 'गंदगी न करने और न करने देने' की शपथ लेते देखकर एक अन्य व्यक्ति ने कहा, जब संविधान की कसम खाकर लोग कानून तोड़ते हैं, तो ऐसी शपथ खाने से क्या होगा!
नेताजी कहने लगे, हर क्षेत्र गंदगी से पटा पड़ा है, लोगों के दिमाग के जालों की सफाई भी जरूरी है। केवल शपथ लेने से कुछ नहीं होना है, जब तक हर आदमी न सुधरे।
एक मेडिकल शॉप वाले ने नई जानकारी दी कि जब से बड़े लोगों ने झाड़ू उठा ली है, बाम की खपत बढ़ गई है। कुछ की कमर लचक गई, तो कुछ को शर्म और भय के मारे सरदर्द होने लगा कि कहीं कल से कमरे और टेबल की सफाई भी न करनी पड़े। कुछ पत्नियां इस अभियान से अति प्रसन्न दिखीं कि चलो गुरूर तो टूटा, अब घर की भी सफाई इनसे करवा सकते हैं। जब बाहर हौले-हौले झाड़ू चला सकते है, तो घर पर क्यों नहीं !