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अरब जगत की उलझन

Thu, 09 Jan 2014 12:25 AM IST
थॉमस एल फ्रीडमैन
थॉमस एल फ्रीडमैन Updated Thu, 09 Jan 2014 12:25 AM IST
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अरब जगत से आने वाली सुर्खियां दिन-ब-दिन बदतर होती स्थितियों के बारे में बता रही हैं- सीरिया के सबसे बड़े शहर अलेपो और उसके आसपास के क्षेत्रों पर कब्जा जमाने के लिए अल कायदा से संबद्ध समूह, जिसमें विदेशी लड़ाके भी शामिल हैं, स्थानीय सात विद्रोही गुटों के साथ मैदान में जमे हुए हैं।

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बेरूत स्थित ईरानी दूतावास पर बमबारी की गई है। हिजबुल्लाह की बर्बर रणनीति की आलोचना करने के कारण लेबनान के पूर्व वित्त मंत्री मोहम्मद चताह को अपनी जान गंवानी पड़ी। इराक के फालुजा में अल कायदा समर्थित एक अन्य गुट ने कब्जा जमा लिया है। मिस्र में विस्फोट किए गए हैं, जहां अब सेना इस्लामी और धर्मनिरपेक्ष कार्यकर्ताओं को गिरफ्तार कर रही है। और लीबिया प्रतिस्पर्धी लड़ाकों का अड्डा बन गया है।
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अरब जगत में आखिर हो क्या रहा है? कुछ लोगों का मानना है कि 'बाहरी ताकत के निष्क्रिय' हो जाने के कारण ऐसा हो रहा है। दरअसल अमेरिका ने खुद को इन क्षेत्रों से अलग कर लिया है। लेकिन सिर्फ बात यहीं तक सीमित नहीं है। वहां, असल में, 'मूल्यों में भी शून्य' की स्थिति है। मध्य-पूर्व विविधता में बंटा हुआ समाज रहा है। वहां शिया, सुन्नी, कुर्द, ईसाई, ड्रज सहित अनेक समुदायों का निवास रहा है।
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सदियों से ये सभी साथ-साथ रहे हैं, फिर चाहे औपनिवेशिक शक्तियों, राजाओं-महाराजाओं या तानाशाहों का क्रूर व कठोर शासन ही क्यों न हो। लेकिन इस बहुलतावादी समाज के एक वास्तविक जनतांत्रिक विविधता में, जो सहिष्णुता पर टिका हुआ हो और जिसमें समान नागरिक के रूप में लोगों के एक-साथ रहने की भावना निहित हो, बदलने से पहले ही नियंत्रण की वह डोर टूट गई।

लिहाजा अरब के उत्थान के लिए अब जिस विचारधारा की सर्वाधिक जरूरत है, वह है, बहुलतावाद। और जैसा कि मार्वन मुअशर ने अपनी बेहद प्रासंगिक नई किताब द सेकंड अरब अवेकिंग ऐंड द बैटल फॉर प्लुरलिज्म में लिखा भी है कि इस बदलाव के बिना कोई 'अरब क्रांति' सफल नहीं होगी।

हालांकि अमेरिकी राष्ट्रपति बराक ओबामा ने भी इराक, मिस्र, सऊदी अरब, ईरान या सीरिया में नेताओं को उग्र होने से रोकने की काफी कोशिशें कीं। लेकिन, जैसा कि मुअशर का मानना है, वस्तुतः अपने राजनीतिक भविष्य के लिए यह अरब का अपना युद्ध है। इसलिए अगर इराक में डेरा जमाए पांच लाख सैनिक और एक अरब अमेरिकी डॉलर वहां की सांस्कृतिक मिट्टी में बहुलतावाद का बीजारोपण करने में सफल नहीं हो सके, तो कोई भी बाहरी इसे अंजाम नहीं दे सकता। हालांकि जरूरत आंतरिक आत्मविश्वास बढ़ाने की भी है। आखिर क्यों तकरीबन 15,000 अरब और मुस्लिम सीरिया में जेहाद के नाम पर लड़ने और मरने को तैयार हो जाते हैं, जबकि बहुलतावाद की पुनर्स्थापना के लिए उनमें ऐसा रुझान नहीं दिखता? क्या सिर्फ इसलिए कि हमने 'अच्छे लोगों' को ताकत नहीं दी?

मुअशर ने, जो जॉर्डन के पूर्व विदेश मंत्री हैं और अब वाशिंगटन स्थित कार्नेगी एन्डाउमन्ट फॉर इंटरनेशनल पीस में बतौर उपाध्यक्ष कार्यरत हैं, अपने एक इंटरव्यू में कहा है, 'अरब क्रांति के तीन वर्ष ने बताया है कि अरब जगत में मौजूद सभी पुरानी राजनीतिक ताकतें नकारा हो चुकी हैं।' भ्रष्ट धर्मनिरपेक्ष स्वेच्छाचारी शासक, जो अपने यहां के युवाओं को फलने-फूलने का मौका देने में विफल साबित हुए हैं, अब भी इस्लामी ताकतों से संघर्ष में उलझे हुए हैं। ट्यूनीशिया को इसका अपवाद मान सकते हैं।

मुअशर कहते हैं, 'हम जब तक जीरो-सम गेम (ऐसा खेल, जिसमें लाभ और हानि का योग शून्य ही होता है) में उलझे रहेंगे, हमारे हाथ कुछ नहीं आएगा। अरब समाज के हर क्षेत्र में बहुलतावाद की अवधारणा को आत्मसात किए बिना वहां सतत विकास नहीं हो सकता। और समाज के ये क्षेत्र हैं, विचार, लैंगिक अवसर, दूसरे धर्मों को सम्मान देना, अल्पसंख्यकों का संरक्षण, राजनीतिक दलों, व्यक्तिगत सोच आदि। यह आंतरिक संघर्ष है और यहां यह उम्मीद बेमानी है कि यह बाहर से प्रत्यारोपित होगा।
 
यहां यह सोचना गलत है कि सब कुछ अमेरिकी मौजूदगी अथवा अनुपस्थिति पर ही निर्भर है। इराक टूट रहा है, क्योंकि प्रधानमंत्री नूरी अल मलिकी का व्यवहार इराकी मंडेला जैसा होने के बजाय शिया सिपहसलारों जैसा रहा है। अरब युवाओं ने बहुलतावादी अवधारणाओं से प्रेरित होकर अपना भविष्य खुद के हाथों में देखना शुरू कर दिया।

लेकिन पुरानी व्यवस्था इतनी जकड़ी हुई साबित हुई है कि अब भी ये युवाओं की आकांक्षा पूरी करती नहीं दिखती और दिखेगी भी नहीं। मुअशर लिखते हैं, 'अरब जगत एक उथल-पुथल के दौर में जाने वाला है, जहां प्रतिरोधी ताकतें नए तानाशाह और परम सत्य के साथ हावी होने का प्रयास करेंगीं।

लेकिन ये ताकतें भी कमजोर पड़ जाएंगी, क्योंकि अंत में, प्रतिरोधी ताकतें और सत्ताधारी प्रशासन आम लोगों के जीवन की बेहतरी से संबंधित जरूरतें पूरी नहीं कर सकतीं। इतिहास गवाह है कि जहां विविधता का सम्मान किया गया, वहीं समृद्धि आई है। विडंबना यह है कि अरब समाज ने दशकों से अपनी सरकारों से यही सीखा है कि सहिष्णुता, विभिन्न मत वालों की स्वीकार्यता और आलोचनात्मक सोच राष्ट्रीय एकता और आर्थिक विकास के लिए खतरनाक है।


अनुभव बताता है कि इससे समाज खुद अपना नवीनीकरण नहीं कर सकता और वह वैविध्यता के बिना फलता-फूलता है।' अब इसी वैविध्यता की लड़ाई के लिए वापस जॉर्डन लौट रहे मार्वन मुअशर ने अपनी किताब अरब जगत के उन युवाओं को समर्पित की है, जो अपने अभिभावकों के खिलाफ नहीं, बल्कि उनकी ओर से लड़ रहे थे।

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