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इक्यानबे से बड़े संकट का खतरा

Sun, 18 Aug 2013 07:31 PM IST
उपेंद्र प्रसाद
उपेंद्र प्रसाद Updated Sun, 18 Aug 2013 07:31 PM IST
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situation is more worst than 1991

मनमोहन सिंह का कहना है कि देश में 1991 के संकट की वापसी की कोई आशंका नहीं है। लेकिन रुपये की लगातार गिरावट के बीच शेयर बाजार भी चारों खाने चित्त हो गया है। मुद्रास्फीति ऊपर जा रही है और खाने-पीने की वस्तुओं के दाम बढ़ रहे हैं। साथ ही, अर्थव्यवस्था की विकास दर गिरती जा रही है। यानी देश के सामने चौतरफा आर्थिक संकट है। यदि अनाज के रिकॉर्ड उत्पादन की बात मान भी लें, तो उसका लाभ न तो उत्पादक किसानों को मिल रहा है, न ही उपभोक्ताओं को। इतने संकटों के बीच भी यदि प्रधानमंत्री को लगता है कि 1991 के संकट को वापस नहीं आने दिया जाएगा, तो उनके इस आशावाद की दाद देनी होगी।

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पर क्या वास्तव में प्रधानमंत्री इक्यानबे के संकट को फिर आने से रोक पाएंगे? या देश उससे भी ज्यादा गंभीर संकट में फंस जाएगा? यह सवाल जवाब मांगता है, क्योंकि आज हमारे देश का संकट वस्तुतः इक्यानबे के संकट से ज्यादा गंभीर लग रहा है। वह संकट विदेशी मुद्रा भंडार का संकट था। तीन सप्ताह से ज्यादा आयात के बिल का भुगतान करने के लिए विदेशी मुद्रा हमारे पास नहीं थी। विदेशी कर्ज की वापसी और आयात बिल की भरपाई करने में डिफॉल्ट करने का खतरा पैदा हो गया था और उससे बचने के लिए देश के सोने को विदेश में गिरवी रखना पड़ा था। संकट के उसी दौर में नरसिंह राव सरकार में मनमोहन सिंह वित्त मंत्री बने थे और उन्होंने नई आर्थिक नीतियों के तहत आर्थिक सुधार कार्यक्रम शुरू किए। उसके कारण हमारी स्थिति सुधरी। गिरवी रखा सोना हमने छुड़ाया और विदेशी मुद्रा का एक बड़ा भंडार तैयार कर अंतरराष्ट्रीय बाजार में दिवालिया होने के खतरे को समाप्त कर दिया।
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तब एक अमेरिकी डॉलर की कीमत 12 रुपये हुआ करती थी। रुपये की विदेशी विनिमय दर सरकार तय करती थी। मनमोहन सिंह ने रुपये की कीमत दो झटके में करीब 50 फीसदी तक गिरा दी और एक अमेरिकी डॉलर करीब 18 रुपये का हो गया। बाद में उन्होंने रुपये की विनिमय दर को सरकारी नियंत्रण से मुक्त कर बाजार के हवाले कर दिया। आज बाजार के हाथों रुपया गिरकर एक डॉलर के मुकाबले 62 रुपये की सीमा को भी लांघ चुका है। इक्यानबे में आर्थिक सुधारों की सफलता का एक कारण रुपये का सरकार द्वारा किया गया अवमूल्यन था। उस नीति ने हमारे निर्यात को प्रोत्साहित किया और विदेशी मुद्रा अर्जित करने की हमारी भूख तेज की। रुपया चूंकि अंडर वैल्यूड था, इसलिए उसके अवमूल्यन में कोई परेशानी नहीं आई।
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आज रुपया तेजी से नीचे गिर रहा है, जिस कारण आयात बिल महंगा होता जा रहा है। हमारे ऊपर चढ़ा विदेशी कर्ज भी रुपये की इकाई में अपने आप ज्यादा हो जा रहा है। नतीजतन आयातित सामान और आयातित इनपुट से बने उत्पाद भी महंगे हो रहे हैं। यानी रुपये के कमजोर होने से महंगाई और विकट रूप धारण कर रही है। यह देश की अर्थव्यवस्था में अस्थिरता का भी संकेत है। इस कारण भारत में किए गए वित्तीय निवेश को विदेशी वापस निकालना शुरू कर चुके हैं। इसका असर शेयर बाजार पर पड़ रहा है। शेयर बाजार के कमजोर होने से देश का कॉरपोरेट सेक्टर भी कमजोर होगा और उसकी बाजार पूंजी कम होगी।

यदि इस क्रम को नहीं रोका गया, तो स्थिति इक्यानबे से भी भयावह होगी, क्योंकि उस समय तो सरकार के पास विदेशी मुद्रा दर के अवमूल्यन का एक उपकरण मौजूद था, पर आज तो रुपया ही संकट में है। उस समय संकट विदेशी मुद्रा की कमी से शुरू हुआ था। इस बार विदेश मुद्रा का पर्याप्त भंडार होने के बावजूद रुपया संकटग्रस्त है। यदि रुपये की गिरावट नहीं रुकी, तो हमारे पास जो भी विदशी मुद्रा भंडार है, वह खाली हो जाएगा और फिर हम इक्यानबे की तरह अंतरराष्ट्रीय बाजार में दिवालिया होने के कगार पर पहुंच सकते हैं।

लेकिन लगता नहीं कि मनमोहन सिंह इस आर्थिक संकट को दूर करने के लिए सही दिशा में सोच रहे हैं। यह सब कुछ देश की आर्थिक नीतियों का ही नतीजा है। यह तो कृषि आधारित भारतीय अर्थव्यवस्था की अंदरूनी शक्ति और बचत करने की भारतीयों की स्वाभाविक प्रवृत्ति का नतीजा है कि मनमोहन सिंह की आर्थिक नीतियों ने 20 साल तक काम किया और देश को उच्च विकास दर पर ले जाने में सफलता पाई, लेकिन उन नीतियों की अंतर्निहित कमजोरियों को कभी न कभी तो रंग दिखाना ही था।

इसलिए समय आ गया है कि केंद्र सरकार आर्थिक नीतियों की दिशा बदले। ये नीतियां देश में भ्रष्टाचार बढ़ा रही हैं। आर्थिक सुधार के पहले प्रशासनिक सुधार करना चाहिए था, लेकिन वह सुधार किया ही नहीं गया। नतीजा यह है कि आज का प्रशासन तंत्र दलाल तंत्र में तब्दील हो चुका है। प्रधानमंत्री खुद भी एक बार स्वीकार कर चुके हैं कि नई आर्थिक नीतियों के कारण भ्रष्टाचार बढ़ा है। ऐसे में उन्हें यह भी समझना चाहिए कि नीतियों की दिशा बदले बिना हम भ्रष्टाचार समाप्त नहीं कर सकते।


भ्रष्टाचार काले धन की समानांतर अर्थव्यवस्था को पैदा करता है। कुछ अर्थशास्त्री मानते हैं कि यह समानांतर अर्थव्यवस्था अब सफेद धन वाली अर्थव्यवस्था से भी बड़ी हो चुकी है। काले धन की यह अर्थव्यवस्था सरकार के नियंत्रण से बाहर है और वर्तमान आर्थिक नीतियों के परिवेश में सरकार न तो उस पर नियंत्रण कर सकती है और न ही उसका नियमन कर सकती है। लिहाजा वर्तमान संकट हमारे नीति निर्माताओं के लिए खतरे की घंटी जैसा है। उन्हें नीतियों की दिशा बदलने पर गंभीर होना ही पड़ेगा, अन्यथा वर्तमान अर्थ संकट खतरनाक रुख अख्तियार कर लेगा।

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