फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Simplicity of Authority has changed politics

सत्ता की सादगी से बदलती राजनीति

Tue, 07 Jan 2014 12:40 AM IST
सुभाष चंद्र कुशवाहा
सुभाष चंद्र कुशवाहा Updated Tue, 07 Jan 2014 12:40 AM IST
विज्ञापन
Simplicity of Authority has changed politics

आम आदमी पार्टी के दिल्ली में सत्ता संभालने के साथ ही चर्चाओं के तमाम बिंदु फफोलों की तरह उभरने लगे हैं। कोई उनके वादों, नारों और सत्ता की उम्र का कयास लगा रहा है, तो कोई आशंका व्यक्त कर रहा है कि अब आया ऊंट पहाड़ के नीचे।

विज्ञापन


अब तक सत्तारूढ़ रही पार्टियों की कुंठा तो समझ में आ रही है, मगर टीवी और अखबारी स्तंभों पर सत्ता जमाए विद्वान भी बिन बादल बरस पड़े हैं। आखिर ऐसे कयासों की फिलहाल जरूरत क्या है? क्या हम ऐसे कयासों पर सिर खपा कर, अपनी कुंठा, पूर्वाग्रह और स्वार्थपरता को परिलक्षित नहीं कर रहे? 67 सालों से यह देश जिस सत्ता संस्कृति से शासित रहा, क्या वह इस मुल्क की बदसूरती के लिए जिम्मेदार नहीं है? और अगर है, तो दूसरे को आप साल भर का भी समय देने को तैयार क्यों नहीं हैं।
विज्ञापन


सरकार और सत्ता को काम करने देना ही सभी सवालों की तह में जाने का सबसे उत्तम माध्यम होगा, न कि मीन-मेख निकालकर खबरों को खदबदाए रखना। बेशक समग्र तंत्र में परिवर्तन वैचारिकी और वर्ग चरित्र को बदले बिना आसान चीज नहीं है। हम यह भी दावा नहीं कर रहे कि कोई चमत्कारिक परिवर्तन होने जा रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन


फिर भी अरविंद केजरीवाल ने सत्ता के करीब जाकर और उसे धारण करते हुए जिस सादगी को हथियार बनाया है, वह भारतीय राजनीति को प्रभावित करने वाला सबसे सशक्त तरीका कहा जा सकता है। लोग इसे पसंद कर रहे हैं। बिना गाड़ियों के काफिले के साथ, दिल्ली में विचरण करने वाला मुख्यमंत्री, जनता को प्रभावित कर रहा है।

पहले भी, सादगी का यही तरीका जन आंदोलनों की बागडोर संभालने में कारगर रहा है। यह तरीका हमारे स्वाधीनता आंदोलन की कोख से पैदा हुआ है। केजरीवाल ने लाल बत्ती गाड़ी और सुरक्षा के तामझाम से खुद को मुक्त रख जनता के दिलो-दिमाग में जो जगह बना ली है, उसका स्वागत होना चाहिए।

दूसरे दल, इसी सादगी को स्वीकार करने को तैयार हो जाएं, तो सत्ता और समाज का रिश्ता और मजबूत होगा। सादगी का हिंदुस्तान की सत्ता से गहरा नाता रहा है। यहां की धड़कनों को सादगी आसानी से प्रभावित करती रही है। उसकी दिशा और वर्ग चरित्र चाहे जो हो, उसका भविष्य भले ही जनपक्षधर न हो, लेकिन तात्कालिक रूप से जन-गोलबंदी के लिए सादगी को हथियार बनाने वाले ही इस देश को प्रभावित कर सकते हैं।

आज त्रिपुरा के मुख्यमंत्री माणिक सरकार की सादगी और ईमानदारी इसी तरह समाज की तमाम विद्रूपताओं को प्रभावित कर रही है। सादगी की समझ को समझे बिना, जनता का सेवक नहीं बना जा सकता। कैम्ब्रिज या ऑक्सफोर्ड में पढ़े भारतीय कर्णधार, इसलिए सत्ता पर काबिज होने के बावजूद, जनता को प्रभावित नहीं कर पाते।

सुभाष चंद्र बोस ने द इंडियन स्ट्रगल में महात्मा गांधी के बारे में लिखा है, ‘महात्मा गांधी में ऐसा कुछ था, जिसने यहां कि जनता को प्रभावित किया । ... उनका सरल जीवन, शाकाहारी खान-पान, बकरी का दूध पीना, सप्ताह में एक दिन मौन व्रत, कुर्सी के बजाय, पालथी लगा कर जमीन पर बैठना, घुटने के ऊपर, कमर में पहने जाने वाली धोती, वास्तव में ये प्रत्येक चीजें उन्हें पुराने जमाने का असाधारण महात्मा बनाती थीं और उन तक जनता को खींच लाती थीं। वह जहां भी जाते, गरीब से गरीब आदमी समझता था कि वह उन्हीं के बीच के आदमी हैं।

वह उसके जैसे हाड़-मांस के हैं। उनकी भाषा भगवतगीता और रामायण की लगती थी। जब वह जनता से स्वराज की बात करते तो प्रांतीय स्वराज या संघ के सद्गुणों के संबंध में जानकारी नहीं देते, बल्कि उन्हें रामराज्य की ख्याति की याद दिलाते, जिसे लोग आसानी से समझ लेते।

जब वह प्रेम और अहिंसा से विजय प्राप्त करने के बारे में बातचीत करते तो बुद्ध और महावीर की याद दिलाते और लोग उन्हें स्वीकार कर लेते।’ गांधी जी की सादगी और जनता से सीधे जुड़ने की नीति ने ही उनको लोकप्रियता के शिखर पर पहुंचा दिया।


आम आदमी पार्टी, जिस सादगी की संस्कृति को स्थापित करती जा रही है, इसके सकारात्मक तत्वों का भरपूर स्वागत होना चाहिए। इससे जन और अभिजन, शासक और शासित के बीच की दूरी कम होगी।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed