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खामोश स्वर थिरकती उंगलियां

Thu, 25 Jun 2015 08:55 PM IST
अशोक सण्ड
अशोक सण्ड Updated Thu, 25 Jun 2015 08:55 PM IST
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Silent tone eyecatchers fingers

वे भी क्या दिन थे, जब शौकिया सुबह टहलने निकलते तो अपरिचित हमउम्र भी क्या गुरु, जय हो, राधे-राधे सरीखे अभिवादनों से कानों में आत्मीयता घोल देते थे। अब डॉक्टर की सलाह पर मॉर्निंग वाक को निकलता हूं, तो अलसुबह कानों में हेडफोन ठूंसे, आंखें मोबाइल पर टिकाए नाना प्रकार की भंगिमा बनाते परिचित चेहरे भी अनजान भाव में बिन दुआ-सलाम बगल से गुजर जाते है। घर लौटने पर उनका गुड मॉर्निंग वाट्सएप पर टंगा मिलता है।

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ग्राहम बेल ने जब फोन का आविष्कार किया होगा, तो यह कल्पनातीत रहा होगा कि जमीनी टेलीफोन के इस ‘मजबूर’ यंत्र की आने वाली नस्लें कालांतर में चिट्ठी-पत्री का संहार करते हुए अपने अंदर कंप्यूटर, कैमरा सभी कुछ समेट लेंगी। मोबाइल की गति प्राप्त जन-जन तक पहुंचते संवाद-सेतु के इस तिलस्मी यंत्र में जुबान भी हाशिये पर है इन दिनों। अब उंगलियां बात करती हैं और स्वर खामोश हो गए हैं।
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इनडोर का सीन भी कमोबेश वही है। परिवार के सदस्य एक साथ बैठे दिख जाएंगे, लेकिन गुमसुम। मानो परस्पर कोई सरोकार नहीं, वातावरण शोकसभा सरीखा। हाथ में वही सर्वसुविधा, सर्वगुण संपन्न स्पर्श मात्र से जाग्रत होता यंत्र। आंखें स्क्रीन पर और कत्थक करती उंगलियां। चेहरे पर पल-छिन बदलती नवरस की छटा। कभी हंसते, कभी मुस्कराते, कभी विस्मय, कभी घृणा। एकाग्रता इतनी कि इधर-उधर एक दूसरे को देखने की फुर्सत नहीं। भूख-प्यास पर भी उंगलियों ने विजय प्राप्त कर ली है।
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इंटरनेट पर फेसबुक की मुफ्त सेवा के बाद फोकटिया वाट्सएप के उदय ने एसएमएस को भले विदा कर दिया हो, वसुधैव कुटुंबकम  का भाव पैदा हो गया। दूर-दराज के संबंधी भी ‘ग्रुप’ बनाकर क्लोज फ्रेंड बन गए। नित नए गठित होते ग्रुप की डिजिटल अराजकता ने वाणी को विश्राम दे दिया है। चिंता तो यह है कि रहीम की जिह्वा बावरी अगर ऐसे ही सुप्त रही, तो जिस प्रकार उपयोग न किए जाने के कारण इंसान की पूंछ लुप्त हो गई, उसी तरह कहीं यह धारदार सबसे प्रबल अंग भी...रक्षा करना प्रभो!

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