फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   show sincerity towards parliament

संसद के प्रति संजीदगी दिखाएं

Mon, 07 Dec 2015 10:47 AM IST
नीलांजन मुखोपाध्याय/ वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक
नीलांजन मुखोपाध्याय/ वरिष्ठ पत्रकार और नरेंद्र मोदी-द मैन, द टाइम्स के लेखक Updated Mon, 07 Dec 2015 10:47 AM IST
विज्ञापन
show sincerity towards parliament

छले दो दशक या उससे भी अधिक समय से सभी सरकारें संसद के कामकाज और सांसदों के व्यवहार के निरंतर गिरते स्तर के बारे में शिकायतें करती आई हैं। ज्यादातर समय में ऐसी शिकायतें सरकार की तरफ से की जाती है, क्योंकि विपक्ष के आक्रामक व्यवहार से संसद का कामकाज ठप हो जाता रहा है।

विज्ञापन


सत्र चलने के दौरान विपक्ष सत्ता पक्ष के एजेंडे को रोकने की हरसंभव कोशिश करता है। जब कभी संसद में कामकाज बाधित होता है, तब सरकार या सत्तारूढ़ दल उत्सुक मीडिया को यह आंकड़ा देता है कि संसद को चलाने का कितना खर्च आता है, और सदन में कामकाज न होने का नुकसान कितना ज्यादा है। मीडिया के जरिये विपक्ष को निशाना बनाने की कोशिश होती है कि उसके द्वारा संसद में कामकाज बाधित करने से लाखों रुपये बर्बाद हो रहे हैं।
विज्ञापन


पिछले शुक्रवार को लोकसभा में कामकाज लगभग एक घंटे तक रुका रहा और दोपहर को राज्यसभा में भी कुछ समय के लिए काम नहीं हो पाया। संसद में यह गतिरोध इसके बावजूद है कि मौजूदा शीत सत्र में अनेक महत्वपूर्ण विधेयक पारित कराए जाने हैं, विपक्ष के प्रति नरमी दिखाने का फैसला खुद प्रधानमंत्री ने लिया है, और विपक्ष भी इस सत्र में ज्यादा संजीदगी का परिचय दे रहा है।
विज्ञापन
विज्ञापन


विगत शुक्रवार को भोजनावकाश के बाद लोकसभा की कार्यवाही कोरम पूरी न होने के कारण कुछ देर तक शुरू नहीं हो सकी। संसदीय नियम के अनुसार, दोनों सदनों में सदस्यों की कुल संख्या की दस प्रतिशत उपस्थिति पर ही कार्यवाही शुरू हो सकती है। यानी लोकसभा में 55 और राज्यसभा में 25 सांसदों की उपस्थिति जरूरी है। अगर सांसदों की संख्या इससे कम हो, तो कोरम की घंटी इतने जोर से बजती है कि उसकी आवाज बाहर संसद परिसर तक गूंजती है। लिहाजा शुक्रवार को भी सवा दो बजे कोरम की घंटी बजने लगी, क्योंकि सदन में सांसद पर्याप्त संख्या में मौजूद नहीं थे।

चूंकि कोरम पूरा नहीं हुआ, ऐसे में दो बजकर उन्नीस मिनट पर घंटी दोबारा बजने लगी। फिर भी कोरम पूरा नहीं किया जा सका। चार मिनट बाद घंटी फिर बजी, पर उस पर भी ध्यान नहीं दिया गया। अंततः लोकसभा की कार्यवाही पौने तीन बजे शुरू हुई और निर्धारित अवधि छह बजे तक चली। कोरम पूरा था, पर उपस्थिति कम थी।

सभी राजनीतिक पार्टियां संसद में अपना सचेतक (ह्विप) नियुक्त करती हैं। उनका काम अपनी पार्टी के सांसदों की सदन में उपस्थिति सुनिश्चित करना, उन्हें पार्टी के अनुसार काम करने और पार्टी लाइन के अनुरूप वोटिंग करने के लिए बताना है। पार्टी ह्विप का उल्लंघन करने पर सांसदों के खिलाफ अनुशासनात्मक कार्रवाई होती है। ऐसे उदाहरण हैं, जब पार्टी ह्विप का उल्लंघन कर दूसरी पार्टी के लिए वोटिंग करने पर संबद्ध सांसदों को पार्टी से निलंबित किया गया। चूंकि 16 वीं लोकसभा में भाजपा के सर्वाधिक सांसद हैं, इसलिए उसने तेरह ह्विप नियुक्त किए हैं; मुख्य सचेतक के रूप में उसने राजस्थान के सांसद अर्जुन राम मेघवाल को नियुक्त किया है। राज्यसभा में संख्या कम होने के कारण भाजपा के तीन सचेतक हैं, जबकि मुख्य सचेतक पंजाब से सांसद अविनाश राय खन्ना हैं।

इन सचेतकों को संसदीय कार्य मंत्री और उनके सहायक से भी मदद मिलती है। इस समय संसदीय कार्य मंत्री वेंकैया नायडू हैं, जबकि लोकसभा में उनके सहायक राजीव प्रताप रूडी और राज्यसभा में मुख्तार अब्बास नकवी हैं। जाहिर है, भाजपा सांसदों को संसद में उपस्थिति और उनके आचरण के बारे में इतने सारे लोगों से दिशानिर्देश मिलता है। पर ये सत्तरह लोग यह सुनिश्चित नहीं कर पाए कि लोकसभा में पचपन सांसद मौजूद रहें और कोरम पूरा न होने के कारण बार-बार सदन की कार्यवाही स्थगित न हो।

शुक्रवार को लोकसभा की कार्यवाही बाधित होने की वजह यह थी कि सुबह के सत्र के बाद अनेक सदस्य अपने संसदीय क्षेत्र के लिए निकल गए थे। पर तब भी इस बारे में तो सोचा ही जाना चाहिए था कि फिर कोरम कैसे पूरा होगा। उस दिन कोई महत्वपूर्ण कामकाज नहीं हुआ, और प्राइवेट मेंबर्स बिल पर चर्चा के दौरान भी उपस्थिति बहुत कम थी। ऐसे विधेयक सांसदों द्वारा अपनी पार्टी के अनुमोदन के बगैर लाए जाते हैं, और इनका उद्देश्य संसदीय विमर्श को बढ़ावा देना है। उल्लेखनीय है कि चालीस साल से भी अधिक समय बाद विगत अप्रैल में ऐसा एक विधेयक पारित हुआ था।

संसद में सांसदों की कम उपस्थिति चिंता का विषय इसलिए है, क्योंकि सरकारें इसे बहस का मंच मानती ही नहीं। अमूमन सरकारें संसद को अपने विधेयकों को पारित कराने का मंच मानने लगी हैं। विपक्ष भी संसद को इसी तरह देखता है। चूंकि मौजूदा सत्र में भाजपा और सरकार का मुख्य उद्देश्य जीएसटी को पारित कराना है; और कांग्रेस का रुख भी इस मामले में बहुत आक्रामक नहीं है, इसलिए भाजपा के प्रबंधकों को बहुत चिंता नहीं है।


पार्टी के सचेतक और संसदीय कार्य मंत्री अपने सांसदों की सदन में मौजूदगी पर अक्सर तभी ध्यान देते हैं, जब विपक्ष सदन के कामकाज को बाधित करने की मंशा जताता है। सामान्य स्थितियों में सांसदों की गैरमौजूदगी किसी को बहुत चिंतित नहीं करती। शुक्रवार को कार्यवाही का लगातार बाधित होना इसलिए भी विद्रूप था, क्योंकि उससे कुछ ही घंटे पहले एक समारोह में प्रधानमंत्री ने संसद के सुचारु रूप से चलने पर संतोष जताया था। उन्होंने बहुत जल्दबाजी कर दी। अब पूरे सत्र में उन्हें अपने पार्टीजनों को विशेष निर्देश देना होगा, ताकि बीते शुक्रवार जैसी घटना दोबारा न हो।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed