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शिवभक्ति, जनेऊ और जाति

Sun, 16 Sep 2018 07:57 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 16 Sep 2018 07:57 PM IST
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Shivbhakti, Janeu and Caste
तवलीन सिंह

क्या आपको लगने लगा है कि राहुल गांधी की शिवभक्ति केवल नाटक है? राजनीति के रंगमंच पर यह एक नया खेल है? पिछले सप्ताह कांग्रेस अध्यक्ष कैलाश से लौटकर वतन वापस आए मानसरोवर का पवित्र जल एक बोतल में भरकर, लेकिन इस जल को घर में पूजा के लिए नहीं रखा गया। इसे वह राजघाट लेकर गए और बापू की समाधि पर चढ़ाया।


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कैलाश-मानसरोवर की यात्रा पर जाने से पहले टीवी पत्रकारों को खबर कर दी गई थी, ताकि उनकी ‘श्रद्धा’ को दुनिया देख सके। कांग्रेस प्रवक्ताओं ने बाद में सफाई दी कि राहुल जी नाटक नहीं कर रहे थे, पवित्र जल को पवित्र स्थान पर पहुंचाने का काम कर रहे थे। तो फिर पुण्य पाने का यह प्रयास उन्होंने चुपके से क्यों नहीं किया? बाबा भोलेनाथ को प्रसन्न करने की ही मंशा होती, तो चुपके से यह काम किया जा सकता था।
 
सच पूछिए, तो मुझे तब से ही कांग्रेस अध्यक्ष की श्रद्धा पर शक होने लग गया था, जब अचानक पिछले वर्ष उन्हें याद आया कि वह हिंदू हैं। गुजरात के चुनाव अभियान में उन्होंने मंदिरों का व्यापक दौरा किया और हर मंदिर में संयोग से कोई न कोई कैमरावाला उपस्थित रहा। कांग्रेस के एक प्रवक्ता से जब मंदिरों के उस दौरे के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने कहा कि राहुल गांधी जनेऊधारी शिवभक्त हैं। असली जवाब उनकी माताजी ने मुंबई में ‘इंडिया टुडे कॉन्क्लेव’ में दिया। जब सोनिया गांधी को उनके बेटे की शिवभक्ति के बारे में पूछा गया, तो उन्होंने स्पष्ट शब्दों में कहा, ‘भारतीय जनता पार्टी कांग्रेस को मुसलमानों की पार्टी कहती रहती है आजकल, सो इस गलत छवि को ठीक करने की आवश्यकता थी।’

जो भी हो, एक बात बिल्कुल साफ होने लग गई है कि कांग्रेस पार्टी अपने ‘सेक्यूलरिज्म’ में थोड़ी-सी शिवभक्ति घोलने की कोशिश कर रही है। तो क्या यह कहना गलत होगा कि कांग्रेस की राजनीति में धर्म-मजहब की सुगंध लाने का प्रयास किया जा रहा है? अगर ऐसा हो रहा है, तो फिर कांग्रेस किस मुंह से भाजपा पर यह आरोप लगा सकती है कि राजनीति में हिंदुत्व लाकर देश की रगों में विष फैलाया जा रहा है? सेक्यूलरिज्म का वास्ता देकर महागठबंधन बन रहा है। राजनीति में धर्म को घोलना भारतीय जनता पार्टी के लिए गलत है, तो कांग्रेस के लिए भी गलत होना चाहिए न?

राहुल जी का यह खेल उनके लिए खतरनाक साबित हो सकता है। बिल्कुल वैसे, जैसे उनके पिता जी के लिए साबित हुआ था। आपको शायद याद होगा कि राजीव गांधी ने 1989 में अपना चुनाव अभियान अयोध्या से शुरू किया था देश में रामराज्य लाने का वायदा करके। इस देश की जनता इतनी भोली नहीं है कि इस तरह की नाटकीय श्रद्धा को असली श्रद्धा मान ले। सो राजीव गांधी की चाल नाकाम रही और वह चुनाव हार गए थे। लगता है कि राहुल गांधी के सलाहकार या तो यह बात भूल गए हैं या सोचते हैं कि भारतवासी बेवकूफ हैं। भारतीय जनता पार्टी के राजनेता जब मंदिरों के चक्कर लगाते हैं और पूजा करते हुए दिखाई देते हैं, तो आम मतदाता चकित नहीं होता, क्योंकि इन राजनेताओं ने कभी छिपाने की कोशिश नहीं की है कि वे हिंदुत्ववादी हैं और राजनीति में हिंदुओं का हित सुरक्षित रखने के लिए आए हैं।

लेकिन अपनी सेक्यूलर राजनीति पर गौरवान्वित होने वाले राजनेता जब अचानक अपनी शिवभक्ति, जनेऊ और जाति याद करने लगते हैं, तो ढकोसला साफ दिखने लगता है। देश के मतदाता अशिक्षित हैं, लेकिन अंधे नहीं।

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