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मानव पूंजी की अंशधारक

Fri, 01 Dec 2017 09:34 AM IST
पत्रलेखा चटर्जी
पत्रलेखा चटर्जी Updated Fri, 01 Dec 2017 09:34 AM IST
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Shareholders of human capital
महिलाएं

लखनऊ में सौ वर्षों में आज पहली बार महिला महापौर निर्वाचित होने जा रही हैं। यह जश्न मनाने लायक घटना है। लेकिन लैंगिक समानता और महिला सशक्तिकरण के बारे में एक के बाद एक सत्ता में आने वाली सरकारों के ऊंचे दावों के बावजूद उत्तर प्रदेश में आम तौर पर महिलाओं की स्थिति निराशाजनक ही रही है।


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ताजा राष्ट्रीय परिवार स्वास्थ्य सर्वेक्षण (2015-2016) के मुताबिक, पांच वर्ष से कम उम्र के बच्चों की मृत्यु दर के मामले में उत्तर प्रदेश शीर्ष पांच राज्यों में शामिल था। इस सूची के अन्य राज्य हैं-मध्य प्रदेश, छत्तीसगढ़, बिहार और असम। अंदाज लगाइए कि उस रिपोर्ट में और क्या था? इंडियास्पेंड के एक विश्लेषण के अनुसार, उत्तर प्रदेश समेत बाकी के चारों राज्यों में दस वर्ष से ज्यादा स्कूल में पढ़ाई करने वाली महिलाओं का प्रतिशत राष्ट्रीय औसत (35.7 फीसदी) से भी कम था।

आखिर यह क्यों महत्वपूर्ण है? यह इसलिए महत्वपूर्ण है कि शिक्षित महिलाओं के बच्चे स्वस्थ होते हैं और स्वस्थ बच्चों का जीवन ही बेहतर होता है। वे राज्य, जहां महिलाएं ज्यादा शिक्षित होती हैं, वहां आम तौर पर बच्चों का स्वास्थ्य बेहतर होता है। इसलिए यदि उत्तर प्रदेश (जिसकी आबादी ब्राजील के बराबर यानी बीस करोड़ है) को अपना भविष्य बेहतर बनाना है, तो यह महत्वपूर्ण है कि राज्य के नीति-निर्माता महिलाओं की शिक्षा में ज्यादा निवेश करें। योगी आदित्यनाथ सरकार ने कहा है कि शिक्षा उसकी शीर्ष प्राथमिकताओं में से एक है, लेकिन अगर राज्य की लड़कियों को आगे बढ़ना है, तो इतनी बड़ी चुनौती को देखते हुए सरकारी प्रयास भी बड़े पैमाने पर होने चाहिए।

एएसईआर (असर) यानी शिक्षा पर वार्षिक स्थिति रिपोर्ट (ग्रामीण), 2016 के चिंताजनक आंकड़े पर जरा गौर करें-उत्तर प्रदेश में शिक्षा से वंचित लड़कियों की संख्या राष्ट्रीय औसत (5.2 फीसदी) से दोगुनी है। एएसईआर (असर) ग्रामीण भारत में सबसे बड़ा घरेलू सर्वेक्षण करता है और उसकी रिपोर्ट बच्चों की स्कूली शिक्षा की स्थिति और बुनियादी शिक्षा पर केंद्रित होती है। प्रथम द्वारा समर्थित यह सर्वेक्षण स्थानीय सहयोगी संगठनों के स्वयंसेवकों द्वारा लगभग पूरे देश के सभी ग्रामीण जिलों में किया जाता है। और इसके नतीजे को गंभीरता से लिया जाता है।
 
उत्तर प्रदेश के लिए एकमात्र सांत्वना की बात यह है कि असर, 2016 की रिपोर्ट के मुताबिक, राज्य के 94.7 फीसदी से ज्यादा बच्चों (छह से चौदह वर्ष के) का स्कूलों में दाखिला हो गया है। आठ साल से ज्यादा समय से राज्य में नामांकन संख्या 93 फीसदी से ज्यादा है।

लेकिन जैसा कि सभी जानते हैं, नामांकन के आंकड़े का कोई मतलब नहीं होता, अगर बच्चे, खासकर लड़कियां बीच में ही पढ़ाई छोड़ देती हैं। आखिर लड़कियां बीच में ही पढ़ाई क्यों छोड़ देती हैं? इसका एक महत्वपूर्ण कारण बाल विवाह है। यह पूरी तरह से संयोग नहीं है कि 2011 की जनगणना के अनुसार, विवाहित बच्चों के मामले में उत्तर प्रदेश देश में शीर्ष (28 लाख) पर है, उसके बाद बिहार और राजस्थान का नंबर (16 लाख प्रत्येक राज्य) आता है। बच्चों द्वारा संतान उत्पति के मामले में भी उत्तर प्रदेश सबसे आगे है-दस लाख।

ये सभी आंकड़े मिलकर एक दुश्चक्र बनाते हैं, जो राज्य की मानव पूंजी के विकास को पटरी से उतारते हैं और जिसने राज्य को पिछड़े राज्यों की श्रेणी में कैद कर रखा है। योगी आदित्यनाथ सरकार ने राज्य में बाल विवाह की जांच करने के लिए पुलिस को ब्लॉक और जिला स्तर पर स्थानीय स्कूलों के साथ संपर्क करने के निर्देश दिए हैं। लेकिन कई लोगों ने बाल विवाह पर अंकुश लगाने के लिए स्कूलों की निगरानी करने के लिए पुलिस के इस्तेमाल पर सवाल उठाया है। इससे यह कैसे सुनिश्चित होगा कि पुलिस जबरन वसूली, धमकाने या उत्पीड़न का काम नहीं करेगी? संभवतः इसका सबसे अच्छा तरीका है 'बाल पंचायत'। ओडिशा, बिहार, आंध्र प्रदेश जैसे राज्यों ने इस मॉडल का प्रयोग किया है। यह बच्चों का समर्थन नेटवर्क है, जो बाल विवाह की स्थिति में यथासंभव शीघ्रता से चेतावनी दे सकता है। उदाहरण के लिए, एक शिक्षक सक्रियता दिखाते हुए पुलिस को खबर कर सकता है कि एक बच्चा कई दिनों से स्कूल नहीं आ रहा है और इसका कारण बाल विवाह हो सकता है। इससे पुलिस को अनावश्यक रूप से स्कूल आने की जरूरत नहीं होगी और स्कूल का माहौल खराब नहीं होगा।

इसके लिए माता-पिताओं को परामर्श देने की जरूरत है और समुदाय को संगठित करना होगा, लेकिन यह सब करने के लिए राजनीतिक इच्छाशक्ति और दृढ़ उद्देश्य होना जरूरी है। सबसे महत्वपूर्ण सवाल है कि क्या महिलाएं राज्य के राजनीतिक मुद्दों में दिलचस्पी रखती हैं। अब तक की स्थिति तो यही है कि बहुत कम महिलाएं इसका जवाब 'हां' में देंगी।

लेकिन अगर उत्तर प्रदेश को विकसित होना है, तो उसे महिलाओं को अपने साथ लेना ही होगा, उनकी संभावनाओं को बढ़ाना ही होगा। सशक्तिकरण की जो बातें होती हैं, वे सतही हैं। इन बातों पर चलना और भी मुश्किल है। किसी महिला को शिक्षित करने का मतलब है, उसके लिए विकल्पों को खोलना। विकल्प खोलने का अर्थ है, उसकी पसंद को तवज्जो देना, उसकी क्षमता का सम्मान करना और उसके फैसले को स्वीकार करना।

अक्सर परिवार और समाज अपनी बेटियों को शिक्षित कर खुश होते हैं, लेकिन समस्या तब होती है, जब शिक्षित बेटियां अपनी पसंद के मुताबिक चलना चाहती हैं। लेकिन असली सशक्तिकरण यही है। मौजूदा सामाजिक-राजनीतिक माहौल में देश में चल रही महिला सशक्तिकरण की बड़ी-बड़़ी बातें क्या उत्तर प्रदेश की लड़कियों और महिलाओं की स्थिति से मेल खाती हैं? 

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