फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   shankar sharan article.

मोल तोल के बोल

Sat, 07 Mar 2015 11:50 PM IST
शंकर शरण
शंकर शरण Updated Sat, 07 Mar 2015 11:50 PM IST
विज्ञापन
shankar sharan article.

भाषा बड़ी नाजुक चीज है। कला के माध्यमों में सबसे कमजोर। इतनी कि जिसे आसानी से तोड़ा-मरोड़ा जा सकता है। भ्रष्ट किया जा सकता है। बेचारी भाषा कुछ नहीं कर सकती। किसी साधारण या घटिया चीज, जैसे कोई पाउडर या पार्टी, विचारधारा, पर्चा, नेता, आदि – को भी  ‘सर्वोत्तम’, ‘शानदार’, ‘महान’, आदि बता कर धड़ल्ले से परोसा जा सकता है। धन-बल या संगठन, गुटबंदी, दबाव, आदि के सहारे आक्रामक तड़क-भड़क के साथ, तब वह लफ्फाजी पाठकों, श्रोताओं, दर्शकों के विवेक को अनिवार्यतः ध्वस्त कर सकती है। तब भाषा उन ठगे जाते लोगों का तो क्या, अपना भी बचाव नहीं कर पाती।

विज्ञापन


लेकिन वही भाषा किसी सच्चे लेखक, कवि, कलाकार के हाथों ऐसी अतुलनीय शक्ति हासिल कर लेती है कि उस का लेखन समानांतर सरकार जैसी सत्ता बन जाता है। बड़ी-बड़ी तानाशाही सरकार उस से डरती है। वैसे लेखक को प्रतिबंधित करती, देश-निकाला देती है। कला के किसी अन्य माध्यम में इतने शक्ति-संचय और प्रभाव की संभावना नहीं है।
विज्ञापन


भाषा की यह शक्ति रहस्यमय है। यह कभी प्रयोजी को, तो कभी प्रयोज्य को चकमा भी दे देती है। इसलिए साहित्य ही नहीं, राजनीति में भी भाषा के प्रयोग के प्रति सावधानी रखना, बल्कि उस की साधना करना सब से अधिक ध्यान रखने की चीज है।
विज्ञापन
विज्ञापन


कवि अज्ञेय ने अपने समय के अनोखे नेता डॉ. राममनोहर लोहिया की आलोचना इसी बिंदु पर की थी। दोनों मित्र भी थे। लोहिया राजनीति में मौलिक, रंग-बिरंगे मुहावरों का उपयोग करने के लिए जाने जाते थे। मगर उसी में गच्चा भी खाते थे, और अनुयायियों को भी खिलाते थे। भाषा की सधी पकड़ रखने वाले कवि ने उन में यह गड़बड़ी देखी थी, 'अपने गंभीर अध्ययन और मौलिक चिंतन के बावजूद लोहिया बराबर अपने को ऐसा स्थिति में डालते (या रखते), जहां उनकी नीतियों की बुनियाद एक सर्वथा नकारात्मक ‘हटाओ’-वाद के सिद्धांत पर कायम रही है।' अज्ञेय ने आगे कहा था, 'लोहिया की ठेठ भाषा में ऐसे बिंब उभारने की शक्ति है, जिन की छाप मन पर बनी रहे; पर तर्क में जब हम बिंबों और प्रतीकों का सहारा अधिक लेने लगते हैं तब सचाई के खो जाने का खतरा रहता है।'

लोहिया जैसी ही बात जयप्रकाश नारायण के संदर्भ में भी आई थी। जेपी से भी अज्ञेय का जुड़ाव रहा था। जेपी के आग्रह पर उन्होंने अंग्रेजी साप्ताहिक ‘एवरीमैन्स’ का संपादन भी किया। अपनी एक पुस्तक स्त्रोत और सेतु भी जेपी को समर्पित की। फिर भी, जेपी के ‘समग्र क्रांति’ नारे की सब से कठोर आलोचना अज्ञेय ने ही की थी। उन्होंने उसे संपूर्ण राजनीतिकरण को गलत बढ़ावा देना कहा था, 'टोटल रिवोल्यूशन टोटल पॉलिटिक्स की प्रेरणा देता है और टोटल पॉलिटिक्स अनर्थकारी से सिवा कुछ नहीं हो सकता।' इस तरह, संपूर्ण क्रांति का नारा भी अतिबोल के दूरगामी, बुरे प्रभाव का ही उदाहरण था। जिस का दुष्प्रभाव बिहार, उत्तर प्रदेश की राजनीति में अभी तक देखा जा सकता है।

अब अभी-अभी, संसद में कहा गया हैः हमारा धर्म संविधान है, भारतीय संविधान ही हमारी एक मात्र धर्म-पुस्तक है। क्या सचमुच? समय ही बताएगा कि यह बोल सटीक है या अति। देश के बीस करोड़ लोग तो किसी और ही पुस्तक को अपना धर्म मानते हैं। दूसरी ओर, नब्बे करोड़ लोगों के लिए कोई एक, और एक-मात्र धर्म-पुस्तक की धारणा ही विजातीय है। वे अनेक देवी-देवताओं और अनेक धर्म-पुस्तकों का आदर करते हैं। उसमें भारतीय संविधान तो नहीं है!

फिर देश के बुद्धिजीवी और शासनतंत्र के कर्मचारी हैं। वे भी संविधान को धर्म-पुस्तक जैसा मानते हों, इस में संदेह है। प्रभावी बुद्धिजीवी तो दशकों से मार्क्स, माओ, फूको, आदि विदेशी विचारकों की चित्र-विचित्र बातों को अपने लिए धर्म-वाक्य मानकर जीते-डूबते, ऊभ-चूभ होते रहे हैं। उनकी एक लाडली लेखिका-बुद्धिजीवी देश के संविधान, झंडे, आदि को मूर्खतापूर्ण चीजें मानती हैं। यह सब, उनके अनुसार, 'दिमाग को तंग बनाता है, और मुर्दों को लपेटने के काम आता है।'


यद्यपि, जो अब तक नहीं हुआ वह आगे भी न होगा, ऐसा मानना भी ठीक नहीं। कोई नेता या पार्टी भारतीय संविधान को धर्म-पुस्तक बनाने के प्रति गंभीर है, तो उसे अपनी कार्य-योजना वैसी ही बनानी होगी। अतः समय ही बताएगा कि यह अतिबोल है या सुबोल।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed