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सपनों के सौदागर का दुःस्वप्न

Wed, 03 Apr 2013 10:09 PM IST
Updated Wed, 03 Apr 2013 10:09 PM IST
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sfi leaders death unfortunate says west bengal chief minister mamata banerjee

पश्चिम बंगाल में कथित तौर पर पुलिस की पिटाई से मारे गए एसएफआई नेता सुदीप्तो गुप्त का मसला तूल पकड़ रहा है। पुलिस सुदीप्तो की मौत को दुर्घटना बता रही है, जबकि चश्मदीदों का कहना है कि पुलिस की पिटाई उनकी मौत का कारण बनी। पहले ही मुश्किल में घिरी राज्य की ममता सरकार के लिए सुदीप्तो की मौत एक नई मुसीबत बनकर आई है।

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पंचायत चुनाव की तारीखों में उलझी ममता बनर्जी ने प्रमुख विपक्षी दल माकपा को सलाह दी है कि वह अगले दस वर्षों तक आराम करे। उधर विरोधी दल एकजुट होकर तृणमूल कांग्रेस के दिन गिन रहे हैं। एक तरफ सरकार द्वारा बताई गई तारीखों पर चुनाव नहीं कराने को लेकर अड़ी मुख्य चुनाव अधिकारी अदालत चली गई हैं, वहीं सरकार ने आरोप लगाया है कि वह मार्क्सवादियों की हमदर्द हैं।
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चुनाव आयोग का रुख अग्निकन्या ममता बनर्जी को खुली चुनौती है। माकपा भी ममता सरकार की विफलताओं को प्रचारित करने में लगी हुई है। राजनीतिक समीकरण हालांकि कुछ और ही कहानी कह रहे हैं। हाल के उपचुनाव में मुर्शिदाबाद और वीरभूम जैसे कांग्रेसी गढ़ों में तृणमूल ने एक सीट पर कब्जा जमा लिया। माकपा भी स्वीकार रही है कि उसकी जमीन खिसक रही है।
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तृणमूल को शासन में आए बाईस महीने हो चुके हैं। राज्य में चुनाव करीब तीन साल दूर हैं। यही कारण है कि विरोधी दल तृणमूल के खिलाफ जनमत बना रहे हैं, ताकि आगे उन्हें इसका चुनावी लाभ मिले। पार्क स्ट्रीट बलात्कार मामला और कार्टून प्रकरण के बाद हाल में गार्डन रीच में एक कॉलेज के छात्र संघ चुनाव में एक पुलिस अधिकारी की हत्या के बाद कोलकाता पुलिस के कमिश्नर को हटाए जाने को लेकर पुलिस महकमा क्षुब्ध है, तो विरोधी दल कह रहे हैं कि हत्या में शामिल लोग तृणमूल नेताओं के करीबी थे।

राज्य की आर्थिक स्थिति छिपी नहीं है। पिछली सरकार ने 2.21 लाख करोड़ का जो कर्ज लिया था, वह एक फंदा था, जिसमें मौजूदा सरकार जा फंसी। कर्ज में डूबी सरकार को सामान्य ब्याज दर पर कर्ज देने को आर्थिक संस्थान तैयार नहीं हैं। ममता बनर्जी राज्य की इस कंगाली का ठीकरा केंद्र के सिर फोड़ रही हैं। जबकि उत्तर प्रदेश और बिहार के बाद पश्चिम बंगाल को ऋण, सहायता और अनुदान के रूप में सर्वाधिक केंद्रीय सहायता मिलती है। सरकार के सिर पर कर्ज का बोझ तो है ही, वह शाहखर्ची पर भी लगाम नहीं लगा पा रही।

सत्ता में आने से पहले ममता बनर्जी ने वायदा किया था कि वह अगले दस वर्षों में राज्य को सोनार बांग्ला बना देंगी। उन्होंने दो लक्ष्य तय किए थे, जिसमें से पहला वायदा दो सौ दिनों में दो लाख लोगों को रोजगार दिलाने का था। नया रोजगार मिलना तो दूर, उल्टे बहुतों के रोजगार चले गए। उन्होंने कोलकाता को लंदन, दार्जिलिंग को स्विट्जरलैंड और दीघा को गोवा बना देने की बात कही थी। सिंचाई की सुविधा, गांवों में पेयजल की व्यवस्था, मालदह, दुर्गापुर, कूचबिहार और आसनसोल में हवाई अड्डा, बागडोगरा हवाई अड्डे का विस्तार तथा 10 नए मेडिकल कॉलेज खोलने का वायदा भी वायदा ही रह गया।

उनके कट्टर आलोचक भी मानते हैं कि राज्य में कानून-व्यवस्था की स्थिति वाम मोर्चा सरकार के जमाने से कम खराब है। शिक्षा संस्थानों का राजनीतिकरण तो वाम मोर्चे की विरासत है। फिर भी हालात थोड़े बदले हैं, गांवों में बिजली आपूर्ति में सुधार हुआ है और सड़कों को सुधारने का काम चल रहा है। आपराधिक घटनाओं में पार्टी नेताओं की संलग्नता बढ़ी है, लेकिन उनमें से कुछ गिरफ्तार भी हो रहे हैं। यानी मुख्यमंत्री ने पुलिस को काम करने से रोका नहीं है। लेकिन आर्थिक घोटाले शुरू हो चुके हैं और उसमें सत्ता पक्ष के नेता भी शामिल दिख रहे हैं। अभी ट्राइडेंट लाइट के टेंडर में अनियमितता का भंडफोड़ हो चुका है।

राज्य में नए उद्योग नहीं लगे, न ही भूमि बैंक ऐसी जमीन का पता लगा सका, जिसे उद्योगों को दिया जा सके। उद्योग नहीं लगने की सच्चाई सार्वजनिक तौर पर स्वीकार करने के कारण सलाहकार सौगत राय को इस्तीफा देना पड़ा। नए बजट में बड़े उद्योगों को लुभाने के लिए 540 करोड़ रुपयों का प्रावधान किया गया है। वित्त मंत्री अमित मित्रा का दावा है कि विगत वर्षं 257 उद्योगों की तरफ से 2.13 लाख करोड़ रुपयों का निवेश किया गया है। यह कितना सच है, इसका कोई सुबूत नहीं।

मुख्यमंत्री के तौर पर ममता बनर्जी के कुछ फैसले की कटु निंदा हुई है, जैसे दिनेश त्रिवेदी को पद से हटाया जाना, पुलिस आयुक्त का झटके से तबादला, मामूली गलती या लापरवाही पर कई वरिष्ठ अफसरों का दंडात्मक स्थानांतरण, पंचायत चुनाव के मसले पर राज्य चुनाव आयोग से रस्साकशी, कृषि मंत्री रवींद्रनाथ भट्टाचार्य को पद से हटाए जाने के कदम आदि। वह दरअसल कुछ मुसाहिब किस्म के लोगों से घिर गई हैं। आलोचकों के मुताबिक, वह मानसिक संतुलन खो चुकी हैं और विशाल बहुमत के कारण उनमें भारी दंभ व्याप गया है।


अब उन्होंने यूपीए को समर्थन देने का जो संकेत दिया है, उससे बहुत ज्यादा राजनीतिक अर्थ निकालने की जरूरत नहीं है, क्योंकि उनकी शर्तों को केंद्र सरकार शायद ही स्वीकार करे। उनकी एकमात्र शर्त है कि वह केंद्रीय सहयोग पर लगने वाले ब्याज को तीन वर्षों के लिए रोक दे। ये तीन वर्ष उनके इस बार के कार्यकाल में बाकी हैं। रवींद्रनाथ के सोनार बांग्ला का सपना साकार होना तो कठिन है, पर अगर ममता बनर्जी राज्य को डॉ. विधानचंद्र राय के स्तर तक भी नहीं ले जा पातीं, तो आने वाले दिन उनके लिए अच्छे नहीं होंगे।

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