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मिल-बैठकर सुलझाएं यह विवाद

Tue, 28 Mar 2017 09:56 AM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Tue, 28 Mar 2017 09:56 AM IST
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Settle this dispute by dialough
तवलीन सिंह

पिछले सप्ताह अयोध्या में नया दौर शुरू हुआ, जब सर्वोच न्यायालय ने हिंदुओं और मुसलमानों को आदेश दिया कि आस्था से जुड़े इस पुराने झगड़े का समाधान आपस में बैठकर ढूंढने का प्रयास करें। प्रधान न्यायाधीश ने यह भी कहा कि वह स्वयं मध्यस्थता करने को तैयार हो सकते हैं या किसी अन्य न्यायाधीश को यह काम सौंपा जा सकता है। उनके इस सुझाव पर मुस्लिम नेताओं की प्रतिक्रिया से मुझे ऐसा लगा कि पिछले बीस वर्षों में इन्होंने कुछ नहीं सीखा हैं। अगर सीखा होता, तो प्रधान न्यायाधीश का सुझाव न ठुकराते।

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आस्था की शक्ति मैं कम समझती हूं, इसलिए कि इस पर न मैंने कभी ज्यादा ध्यान देने की जरूरत महसूस की है और न ही मैं मानती हूं कि भारत को और मंदिरों और मस्जिदों की आवश्यकता है। मेरा यह भी मानना है कि बाबरी मस्जिद के विध्वंस के बाद अधिकतर हिंदुओं की भी राम जन्मभूमि में रुचि कम हो गई है। अयोध्या में विशाल राम मंदिर बन जाता है, तो उनको अच्छा लगेगा, पर नौजवान हिंदू पीढ़ी को इससे भी ज्यादा अच्छा लगेगा, अगर उनके लिए रोजगार के अवसर बढ़े। लेकिन अगर थोड़ी-सी भी भूमिका होती मुसलमानों को नेतृत्व दिखाने में, तो मैं उनको जरूर कहती कि इस पुराने झगड़े को समाप्त करना उनके हाथ में है। हिंदुओं की दृष्टि में अयोध्या की वही जगह है, जो मुसलमानों की दृष्टि में मक्का-मदीना की है। सो अयोध्या पर हिंदुओं का मुसलमानों से ज्यादा अधिकार है, लेकिन राम के नगर में वे मस्जिद चाहते ही हैं, तो सुब्रह्मण्यम स्वामी ने यह सुझाव दिया है कि सरयू नदी के उस पार हिंदू मस्जिद के लिए बिना किसी आपत्ति के जगह देने को तैयार हैं।
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मैं सुब्रह्मण्यम स्वामी की बातों पर ज्यादातर सहमत नहीं होती, लेकिन उनकी इस बात से सहमत हूं कि मुस्लिम समुदाय अगर राम जन्मभूमि और कृष्ण जन्मभूमि को हिंदुओं को वापस लौटाने का काम करते हैं, तो  मंदिर-मस्जिद का सारा झगड़ा हमेशा के लिए  समाप्त हो जाएगा।
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मेरा अपना मानना है कि धार्मिक प्रचार की जितनी आजादी मुसलमानों को भारत में मिलती है, किसी दूसरे गैर-मुस्लिम देश में नहीं मिलती होगी। विश्व में जब से जेहादी आतंकवाद का दौर शुरू हुआ है, हाल यह है कि नकाबपोश महिलाओं और दाढ़ी वाले मर्दों को देखकर लोग घबराते हैं। भारत ही ऐसा देश रह गया है, जहां आतंकवाद के सैंकड़ों हमलों के बावजूद न दंगे हुए हैं और न ही आम मुसलमान को सताया गया है। 26/11 के हमले के समय मैं मुंबई में थी और सच पूछिए, तो मैंने लोगों में इतना गुस्सा देखा कि विश्वास था कि इस महानगर में दंगे जरूर होंगे। पर दंगे नहीं हुए। अक्षरधाम मंदिर के अंदर लोगों को मारा गया और दंगे नहीं हुए। बनारस में संकटमोचन मंदिर के अंदर जेहादी हमला हुआ और तब भी शांति रही।


इस सत्य को भी स्वीकार करना होगा कि सांप्रदायिक दंगे करवाने की कोशिश हमारे राजनीतिज्ञों ने बार-बार की है, लेकिन हर हमले के बाद हमारे यहां भाईचारा कायम रहा। सो क्या अब नहीं आ गया है कि मुस्लिम नेता आपस में मिल-बैठकर तय कर लें कि अयोध्या में राम मंदिर बन जाए और साथ में सरयू नदी के उस पार मस्जिद की भी नींव रखने का काम किया जाए? सर्वोच्च न्यायालय का सुझाव बिलकुल सही समय पर आया है। उसका जल्दी से जल्दी पालन किया जाना चाहिए, ताकि हम इस गरीब, बेहाल देश को धर्म-मजहब के झगड़ों से मुक्त करके संपन्नता की दिशा में ले जा सकें।

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