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सेंसर और सरकारें
अरविंद कुमार
Updated Tue, 28 Nov 2017 11:25 AM IST
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अरविंद कुमार
जब मैं यह लेख लिख रहा हूं, तब एक तरफ पद्मावती फिल्म और दूसरी तरफ उग्र भीड़ और हमारा सेंसर बोर्ड चर्चा में है। सेंसर बोर्ड के अध्यक्ष कवि-गीतकार प्रसून जोशी इस बीच कई तरह के बयान दे चुके हैं, जैसे-हमारा (सेंसर बोर्ड का) काम राष्ट्र की रक्षा है, मानो सरकार ने इस कार्य से पल्ला झाड़ लिया हो। या फिर जब निर्माता ने एक प्राइवेट स्क्रीनिंग में प्रमुख पत्रकारों को फिल्म दिखाई, तो उन्होंने कहा कि वह स्क्रीनिंग नियम विरुद्ध थी। एक बार तो उन्होंने फिल्म उद्योग से यह तक कहा कि हमसे दूर रहो। दूसरी ओर, मुंबई फिल्म उद्योग ने पंद्रह मिनट शूटिंग बंद कर पद्मावती के समर्थन में एकजुटता का संदेश दिया। जो हो रहा है, वह सही नहीं है। सेंसर बोर्ड और फिल्म उद्योग को एक दूसरे का शत्रु नहीं होना चाहिए।
वर्ष 2014 से बोर्ड की गतिविधि पर चर्चा शुरू हुई है। सेंसर बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष पहलाज निहलानी खुद को सामाजिक व्यवहार और नैतिकता के तथाकथित उच्च आदर्शों का स्वघोषित अलमबरदार मानते थे और उग्र एकांगी दृष्टिकोण से ग्रस्त संस्कारी व्यक्ति थे। साथ ही, वह सरकार की आलोचना को देशद्रोह मानते थे। उनके दौर में उड़ता पंजाब फिल्म से सेंसरशिप का मामला आम आदमी के स्तर तक चर्चा का विषय बना। पहलाज निहलानी ने उस फिल्म के नाम से पंजाब शब्द निकालने का आदेश दिया था। साथ ही, उन्होंने कई ‘अमान्य’ दृश्य काटने को कहा था। उन्होंने साफ-साफ यह भी कहा था : फिल्म के प्रदर्शन से पंजाब में होने वाले चुनाव में सत्ता पक्ष के विरोध में वातावरण बनेगा। इसी तरह नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री भारत रत्न अमर्त्य सेन पर बनी डॉक्यूमेंटरी द आर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन में से गाय, गुजरात, हिंदू भारत और हिंदुत्व जैसे शब्द काटने के अटपटे आदेश उन्होंने दिए थे।
अब सेंसर का एक और उद्देश्य बताया जाने लगा है : देश के सांस्कृतिक तथा सामाजिक मूल्यों की रक्षा। मतलब सेंसर बोर्ड उन माता-पिता की भूमिका बड़ी सख्ती से निभाने लगा है, जो सोचते हैं कि उनकी छत्रछाया से निकलने के बाद संतान भ्रष्ट हो जाएगी। अंग्रेजी राज में भी स्त्री-पुरुष के बीच निकटता के दृश्यों को निकालने के आदेश दिए गए थे। कारण बताया गया था-अंग्रेजी फिल्मों में भारत की जनता के सामने ब्रिटिश जीवन शैली की गलत छाप पड़ती है। धीरे-धीरे हालत यहां तक पहुंची कि स्त्री त्वचा का प्रदर्शन निषिद्ध कर दिया गया। मूर्खता यहां तक पहुंची कि पंडित जवाहर लाल नेहरू की बहन और संयुक्त राष्ट्र में भारत की प्रतिनिधि विजयलक्ष्मी पंडित के स्लीवलेस ब्लाउज वाला सीन एक डॉक्यूमेंटरी में से काट दिया गया था! तब सेंसर में छूट देने की मांग उठती, तो बहस चुंबन दिखाने की अनुमति पर ही अटक कर रह जाती थी। फिल्मों में चुनौतीपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक विचार व्यक्त करने की बात इस बेमतलब बहस में खो जाती थी।
सत्ता के विरोध प्रदर्शन पर निषेध ब्रिटिश काल से ही चला आ रहा है। मूक फिल्म विदुर को प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई थी। कारण- विदुर को महात्मा गांधी के सांचे में ढाला गया था। लिखित सरकारी आदेश था कि इस फिल्म से देश में विद्रोह को और अंग्रेजी राज के विरुद्ध आक्रोश को प्रोत्साहन मिलेगा। अतः इसे दिखाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल में तो हालत और भी खराब थी। फिल्म आंदोलन की पृष्ठभूमि स्वतंत्रता संग्राम था। उसके लेखक मेरे परिचित उमाशंकर थे। निर्देशक लेख टंडन तो मेरे मित्र ही थे। उस फिल्म का प्रदर्शन सरकार ने रोक दिया था। कारण इसे देखकर लोग इसी तरह तोड़फोड़ पर आमादा हो जाएंगे। सुचित्रा सेन की मुख्य भूमिका वाली गुलजार की फिल्म आंधी तो जब्त ही कर ली गई। आंधी की शूटिंग शुरू होने से पहले पूरे एक महीने सुचित्रा सेन को इंदिरा गांधी की ढेरों डॉक्यूमेंटरियां दिखाई गई थीं, ताकि वह चाल-ढाल में इंदिरा लगें। उसी दौर की फिल्म किस्सा कुर्सी का (निर्देशक अमृत नाहटा) इंदिरा गांधी और संजय गांधी पर सीधा व्यंग्य थी। उस फिल्म में शबाना आजमी जनता की प्रतिनिधि थीं। अन्य मुख्य भूमिकाओं में उत्पल दत्त, रेहाना सुल्तान, मनोहर सिंह थे। वह फिल्म सरकार ने जब्त करके जला दी। लेकिन इनके निषिद्ध होने के पीछे सेंसर बोर्ड नहीं, सरकार थी। आजकल राजनीतिक आधार पर फिल्मों को रोकने का काम सरकार नहीं, अति सक्रिय सेंसर बोर्ड कर रहा है।
आज भीड़ तंत्र की भी बहुत अधिक सक्रियता है। फिल्मों को आसान टारगेट माना जाता है। रिलीज होने के समय तक निर्माता की आर्थिक हालत खस्ता हो चुकी होती है। एक दिन की देरी से सूद के लाखों रुपये उस के सिर चढ़ जाते हैं। वह किसी भी शर्त पर समझौता करने को तैयार हो जाता है। आज किसी भी जाति, पेशे, धर्म की बदनामी के नाम पर फिल्म के खिलाफ आंदोलन खड़े कर दिए जाते हैं। जैसे, शाहरुख खान की बिल्लू बार्बर। नाम में बार्बर देखकर चंद शरारती नेताओं ने शोर मचा दिया, सिनेमा घरों पर हमले की धमकियां दी जाने लगीं। रातोंरात निर्माता को फिल्म के थीम सांग तक में से बार्बर शब्द हटाना पड़ा और पर्दे के पीछे लेन-देन भी हुआ। कई बार इस भीड़ के पीछे राजनीतिक पार्टियां भी होती हैं। पाकिस्तानी कलाकारों वाली फिल्मों के खिलाफ उद्धव ठाकरे के फरमान से सिद्ध हो गया कि महाराष्ट्र में सरकार की कम और भीड़ की ज्यादा चलती है। सरकार को घुटने टेकने पड़े। ऊपरी तौर पर निर्माता ने पांच करोड़ का चंदा दिया। पर्दे के पीछे किसने क्या वसूला, यह कोई नहीं जानता।
आजकल पद्मावती भीड़ तंत्र की शिकार है। जब जोधा अकबर बन रही थी, तो कहा गया कि अकबर की कोई राजपूत रानी थी ही नहीं! इसे राजपूतों और हिंदुओं का अपमान घोषित किया गया। फैसला होना था, हुआ भी। सौदे में क्या तय हुआ, यह कोई नहीं जानता।गनीमत है कि यह मुद्दा मुगल-ए-आजम के जमाने में नहीं हुआ। शायद इसलिए कि तब तक हिंदुत्व का उग्र रूप नहीं उभरा था। हमारे देश और लोकतंत्र को कभी न कभी तो प्रौढ़ होना ही होगा।
-लेखक चर्चित पत्रिका माधुरी के संपादक रहे हैं
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वर्ष 2014 से बोर्ड की गतिविधि पर चर्चा शुरू हुई है। सेंसर बोर्ड के पूर्व अध्यक्ष पहलाज निहलानी खुद को सामाजिक व्यवहार और नैतिकता के तथाकथित उच्च आदर्शों का स्वघोषित अलमबरदार मानते थे और उग्र एकांगी दृष्टिकोण से ग्रस्त संस्कारी व्यक्ति थे। साथ ही, वह सरकार की आलोचना को देशद्रोह मानते थे। उनके दौर में उड़ता पंजाब फिल्म से सेंसरशिप का मामला आम आदमी के स्तर तक चर्चा का विषय बना। पहलाज निहलानी ने उस फिल्म के नाम से पंजाब शब्द निकालने का आदेश दिया था। साथ ही, उन्होंने कई ‘अमान्य’ दृश्य काटने को कहा था। उन्होंने साफ-साफ यह भी कहा था : फिल्म के प्रदर्शन से पंजाब में होने वाले चुनाव में सत्ता पक्ष के विरोध में वातावरण बनेगा। इसी तरह नोबेल पुरस्कार विजेता अर्थशास्त्री भारत रत्न अमर्त्य सेन पर बनी डॉक्यूमेंटरी द आर्ग्यूमेंटेटिव इंडियन में से गाय, गुजरात, हिंदू भारत और हिंदुत्व जैसे शब्द काटने के अटपटे आदेश उन्होंने दिए थे।
अब सेंसर का एक और उद्देश्य बताया जाने लगा है : देश के सांस्कृतिक तथा सामाजिक मूल्यों की रक्षा। मतलब सेंसर बोर्ड उन माता-पिता की भूमिका बड़ी सख्ती से निभाने लगा है, जो सोचते हैं कि उनकी छत्रछाया से निकलने के बाद संतान भ्रष्ट हो जाएगी। अंग्रेजी राज में भी स्त्री-पुरुष के बीच निकटता के दृश्यों को निकालने के आदेश दिए गए थे। कारण बताया गया था-अंग्रेजी फिल्मों में भारत की जनता के सामने ब्रिटिश जीवन शैली की गलत छाप पड़ती है। धीरे-धीरे हालत यहां तक पहुंची कि स्त्री त्वचा का प्रदर्शन निषिद्ध कर दिया गया। मूर्खता यहां तक पहुंची कि पंडित जवाहर लाल नेहरू की बहन और संयुक्त राष्ट्र में भारत की प्रतिनिधि विजयलक्ष्मी पंडित के स्लीवलेस ब्लाउज वाला सीन एक डॉक्यूमेंटरी में से काट दिया गया था! तब सेंसर में छूट देने की मांग उठती, तो बहस चुंबन दिखाने की अनुमति पर ही अटक कर रह जाती थी। फिल्मों में चुनौतीपूर्ण सामाजिक और राजनीतिक विचार व्यक्त करने की बात इस बेमतलब बहस में खो जाती थी।
सत्ता के विरोध प्रदर्शन पर निषेध ब्रिटिश काल से ही चला आ रहा है। मूक फिल्म विदुर को प्रदर्शन की अनुमति नहीं दी गई थी। कारण- विदुर को महात्मा गांधी के सांचे में ढाला गया था। लिखित सरकारी आदेश था कि इस फिल्म से देश में विद्रोह को और अंग्रेजी राज के विरुद्ध आक्रोश को प्रोत्साहन मिलेगा। अतः इसे दिखाने की अनुमति नहीं दी जा सकती।
इंदिरा गांधी द्वारा लगाए गए आपातकाल में तो हालत और भी खराब थी। फिल्म आंदोलन की पृष्ठभूमि स्वतंत्रता संग्राम था। उसके लेखक मेरे परिचित उमाशंकर थे। निर्देशक लेख टंडन तो मेरे मित्र ही थे। उस फिल्म का प्रदर्शन सरकार ने रोक दिया था। कारण इसे देखकर लोग इसी तरह तोड़फोड़ पर आमादा हो जाएंगे। सुचित्रा सेन की मुख्य भूमिका वाली गुलजार की फिल्म आंधी तो जब्त ही कर ली गई। आंधी की शूटिंग शुरू होने से पहले पूरे एक महीने सुचित्रा सेन को इंदिरा गांधी की ढेरों डॉक्यूमेंटरियां दिखाई गई थीं, ताकि वह चाल-ढाल में इंदिरा लगें। उसी दौर की फिल्म किस्सा कुर्सी का (निर्देशक अमृत नाहटा) इंदिरा गांधी और संजय गांधी पर सीधा व्यंग्य थी। उस फिल्म में शबाना आजमी जनता की प्रतिनिधि थीं। अन्य मुख्य भूमिकाओं में उत्पल दत्त, रेहाना सुल्तान, मनोहर सिंह थे। वह फिल्म सरकार ने जब्त करके जला दी। लेकिन इनके निषिद्ध होने के पीछे सेंसर बोर्ड नहीं, सरकार थी। आजकल राजनीतिक आधार पर फिल्मों को रोकने का काम सरकार नहीं, अति सक्रिय सेंसर बोर्ड कर रहा है।
आज भीड़ तंत्र की भी बहुत अधिक सक्रियता है। फिल्मों को आसान टारगेट माना जाता है। रिलीज होने के समय तक निर्माता की आर्थिक हालत खस्ता हो चुकी होती है। एक दिन की देरी से सूद के लाखों रुपये उस के सिर चढ़ जाते हैं। वह किसी भी शर्त पर समझौता करने को तैयार हो जाता है। आज किसी भी जाति, पेशे, धर्म की बदनामी के नाम पर फिल्म के खिलाफ आंदोलन खड़े कर दिए जाते हैं। जैसे, शाहरुख खान की बिल्लू बार्बर। नाम में बार्बर देखकर चंद शरारती नेताओं ने शोर मचा दिया, सिनेमा घरों पर हमले की धमकियां दी जाने लगीं। रातोंरात निर्माता को फिल्म के थीम सांग तक में से बार्बर शब्द हटाना पड़ा और पर्दे के पीछे लेन-देन भी हुआ। कई बार इस भीड़ के पीछे राजनीतिक पार्टियां भी होती हैं। पाकिस्तानी कलाकारों वाली फिल्मों के खिलाफ उद्धव ठाकरे के फरमान से सिद्ध हो गया कि महाराष्ट्र में सरकार की कम और भीड़ की ज्यादा चलती है। सरकार को घुटने टेकने पड़े। ऊपरी तौर पर निर्माता ने पांच करोड़ का चंदा दिया। पर्दे के पीछे किसने क्या वसूला, यह कोई नहीं जानता।
आजकल पद्मावती भीड़ तंत्र की शिकार है। जब जोधा अकबर बन रही थी, तो कहा गया कि अकबर की कोई राजपूत रानी थी ही नहीं! इसे राजपूतों और हिंदुओं का अपमान घोषित किया गया। फैसला होना था, हुआ भी। सौदे में क्या तय हुआ, यह कोई नहीं जानता।गनीमत है कि यह मुद्दा मुगल-ए-आजम के जमाने में नहीं हुआ। शायद इसलिए कि तब तक हिंदुत्व का उग्र रूप नहीं उभरा था। हमारे देश और लोकतंत्र को कभी न कभी तो प्रौढ़ होना ही होगा।
-लेखक चर्चित पत्रिका माधुरी के संपादक रहे हैं