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उन्हें ‘सभ्य’ बनाने का स्वार्थ

Thu, 13 Dec 2018 07:04 PM IST
प्रदीप श्रीवास्तव
प्रदीप श्रीवास्तव Updated Thu, 13 Dec 2018 07:04 PM IST
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Selfishness to make them "decent"
जारवा

एक अमेरिकी मिशनरी के मारे जाने के बाद अंडमान-निकोबार द्वीप समूह में रहने वाली अफ्रीकी मूल की जनजातियों की चर्चा गर्म है। आदिवासियों के साथ मैत्री संपर्कों की बात की जा रही है। पर यह जानना जरूरी है कि इन मैत्री संपर्कों के पीछे क्या छिपा था। वर्ष 1990 में जब मैं पोर्ट ब्लेयर में पुलिस अधीक्षक तैनात हुआ, तब जारवा संरक्षण के लिए बनाई गई बुश पुलिस का चार्ज भी मेरे पास आया। अंडमान ट्रंक रोड बन चुकी थी और जारवा रिजर्व फॉरेस्ट के बीच से बसों का आना-जाना शुरू हो गया था। अंडमान ट्रंक रोड जारवा संरक्षण पर पहली बड़ी चोट थी, और यह बहस जारी थी कि जारवा और सेंटिनल द्वीप के आदिवासियों को आधुनिक सभ्यता के दायरे में लाना चाहिए या नहीं। पोर्ट ब्लेयर में रहने वाले तत्कालीन पर्यावरणविद, इस क्षेत्र में काम करनेवाले सक्रिय कार्यकर्ता और हम लोगों जैसे कुछ नए अधिकारी इन्हें उनके हाल पर छोड़ने के पक्ष में थे। पर एक बड़ी लॉबी थी, जो चाहती थी कि इन्हें जंगल से निकाल कर 'सभ्यता' के दायरे में लाया जाए। इनमें से कुछ तो ईमानदार एंथ्रोपॉलिजिस्ट थे, पर इन्होंने ओंग और ग्रेट अंडमानी की दुर्दशा से कुछ सीखा नहीं था।


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जारवा रिजर्व फॉरेस्ट के बाहर समुद्र के किनारे गांव में बंगाली मूल के निवासी रहते थे। कभी-कभी जारवा टोलियां वहां जाकर बाहर रखी बाल्टी, खुरपी, फावड़े आदि उठा ले जाते थे और लोहे का इस्तेमाल अपने तीरों का फल बनाने में करते थे। गांववालों की सुरक्षा के लिए बुश पुलिस की चौकियां बनाई गई थीं। निरीक्षण के दौरान पता चला कि रात में जारवा गांव के पास न आ जाएं, इसलिए पुलिस पार्टी हवा में गोली चलाती है। यह भी पता चला कि सिपाही और गांववाले मिलकर जंगल में हिरण और जंगली सूअर का शिकार करते हैं। ऐसे में यह आशंका बढ़ गई कि जंगल में शिकार करते समय पुलिस की चली गोली से जारवा मारे जा सकते हैं।

यही सोचकर मैंने 1992 में बुश पुलिस को राइफल की गोली की आपूर्ति बंद कर दी और पटाखे मंगाकर दे दिए। गांववाले इससे नाराज हुए और उन्होंने मेरे आदेश के खिलाफ उच्चाधिकारियों को शिकायत की, पर पुलिस पार्टी को गोली न देने का आदेश वापस नहीं हुआ। वह जारवा और वन्य जीवन संरक्षण की दिशा में एक बड़ा कदम था। हालांकि वन विभाग के कर्मियों की बंदूकें और गोलियां वापस नहीं ली गईं और गांववाले उनकी मदद से जंगल में घुसते रहे।

जारवा के कारण ठेकेदार उनके संरक्षित वन में नहीं घुस पाते थे और कई सौ साल पुराने बहुमूल्य लकड़ी की अवैध कटाई नहीं कर पाते थे। अंडमान के वनों का घोर दोहन करने वाले अंग्रेज भी जारवा संरक्षित वन की लकड़ी नहीं काट पाए थे। वन विभाग, ठेकेदार और दिल्ली के एक वर्ग की पूरी कोशिश थी कि यदि जारवा जंगल से बाहर आकर हमारी तरह से 'सभ्य' हो जाएं, तो बेशकीमती लकड़ी की कटाई और तस्करी खुलकर की जा सकेगी। मैत्री संपर्क चलते रहे। जारवा से संपर्क बढ़ता गया। नंगे आदमी, नंगी औरतें कौतूहल का विषय बनती गईं। वर्ष 2000-2005 के बीच जारवा सभ्य समाज के मित्र बन गए। सरकार इन्हें खाने को देती है, पर अब इन्हें बस अड्डे के पास इधर उधर घूमता देखा जा सकता है। ओंग और ग्रेट अंडमानी की तरह जारवा भी नशे और यौन शोषण की लपेट में आकर नष्ट होने के कगार पर हैं। जारवा रिजर्व फॉरेस्ट के पुराने पेड़ कट गए। यह सब देखकर यही कहा जा सकता है कि ईश्वर सेंटिनल द्वीप की रक्षा करे और वहां के लोगों को मिशनरियों और सभ्यता से बचाए।

-लेखक रिटायर्ड आईपीएस अधिकारी हैं।

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