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कल्याण का साधन है आत्मचिंतन
Updated Wed, 29 May 2013 09:39 PM IST
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सनक, सनंदन, सनातन और सनत्कुमार-ये चारों मुनि सनकादिक के नाम से विख्यात हुए। ये ब्रह्मा के मानस पुत्र थे। परम विरक्त होने के कारण देवता भी सनकादिक का बहुत आदर करते थे।
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अत्यंत ज्ञानी होने के बावजूद वे समय-समय पर ब्रह्मा जी आदि का सत्संग कर उनसे और अधिक ज्ञान प्राप्त करने को तत्पर रहा करते थे।
एक दिन सनकादिक ने अपने पिता ब्रह्मा जी से प्रश्न किया, सांसारिक विषय विपत्तियों के घर हैं। सांसारिक ऐश्वर्य और भोग-विलास मानव की अशांति व पतन के कारण हैं, यह जानते हुए भी मानव पशु के समान उनके भोग में क्यों लिप्त रहता है? उसे सांसारिक लगाव से मुक्त करने का क्या उपाय हो सकता है?
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ब्रह्मा जी अचानक किए गए इस प्रश्न का उपयुक्त उत्तर नहीं दे पाए। उन्होंने भगवान विष्णु का स्मरण कर उनसे सनकादिक की जिज्ञासा का समाधान करने की प्रार्थना की। श्रीविष्णु ने हंस के रूप में प्रकट होकर सनकादिक की जिज्ञासा का समाधान करने के लिए कई कथाएं सुनाईं।
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उन्होंने बताया कि इंद्रियों के विषयों का चिंतन व विषयों में आसक्ति नहीं करनी चाहिए। शरीर क्षणभंगुर है, उसे महत्व न देकर आत्मचिंतन करने में ही कल्याण है। भगवान का चिंतन करते रहने से ही सांसारिक मोह-ममता से बचा जा सकता है।
सनकादिक ने उनसे प्राप्त ज्ञान के माध्यम से असंख्य जीवों को सन्मार्ग पर चलने की प्रेरणा दी।