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सुरक्षा : संप्रभुता की ढाल हैं सीमांत गांव, असीम है इनका सामरिक महत्व

Sat, 10 May 2025 08:17 AM IST
Jay singh Rawat जयसिंह रावत
Updated Sat, 10 May 2025 08:17 AM IST
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सार
जम्मू-कश्मीर से लेकर गुजरात तक पाकिस्तान की सीमा पर बसे करीब एक हजार गांवों का सामरिक महत्व असीम है, क्योंकि ये भारत की संप्रभुता की जीवित ढाल हैं।
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Security: Border villages are the shield of sovereignty, their strategic importance is immense
पाकिस्तान की ओर से गोलीबारी के बाद क्षतिग्रस्त घर - फोटो : अमर उजाला

विस्तार

जब हम अपने घरों में निश्चिंत सो रहे होते हैं, तब भारत-पाकिस्तान सीमा पर बसे गांवों के लोग गोलियों के शोर और मौत के साये में रातें काटते हैं। उनके घरों पर गोले बरसते हैं, लहलहाते खेत तबाह हो जाते हैं और मवेशियों के शव आंखों के सामने होते हैं। यह सब उन्हें विचलित तो करता है, पर गोलाबारी थमते ही वे नियति को गले लगाकर सामान्य जीवन की शुरुआत कर लेते हैं। ये हैं हमारे देश के सीमांत प्रहरी, जिन्हें शहीद का दर्जा तो नहीं मिलता, मगर उनका यहां टिके रहना देश की रणनीतिक ढाल है। भारत-पाकिस्तान सीमा, जो 3,323 किलोमीटर तक फैली है। यह केवल एक भौगोलिक रेखा नहीं, बल्कि हजारों लोगों की जिंदगी की कहानी है।



जम्मू-कश्मीर के पुंछ, राजौरी, कुपवाड़ा, और बारामूला से लेकर पंजाब के खेमकरण, राजस्थान के तनोट और गुजरात के कच्छ तक, लगभग एक हजार गांव सीमा से शून्य से दस किलोमीटर की दूरी पर बसे हैं। इनमें पुंछ और राजौरी के उड़ी, तंगधार और करनाह जैसे क्षेत्र नियमित गोलाबारी का शिकार होते हैं। जम्मू के अरनिया और सुचेतगढ़, पंजाब के अजनाला और तरनतारन, राजस्थान के लोंगेवाला और बीकानेर और कच्छ के लखपत जैसे गांव भी पाकिस्तानी तोपखाने की रेंज में हैं। ये गांव न केवल युद्ध और त्रासदी झेलते हैं, बल्कि सेना के साथ कंधे से कंधा मिलाकर देश की संप्रभुता की रक्षा में योगदान देते हैं।


जम्मू के डोगरा परिवार खेतों में गेहूं और धान की खेती करते हैं, पंजाब के सिख किसान सरसों और धान की फसलों को सहेजते हैं, राजस्थान के जाट और राजपूत मरुस्थल में बाजरा बोते और भेड़-बकरियां पालते हैं, जबकि कच्छ के लोग मछली पकड़ने और हस्तशिल्प जैसे कच्छी कढ़ाई में व्यस्त रहते हैं। बच्चे स्थानीय स्कूलों में पढ़ने जाते हैं, लेकिन गोलाबारी के दिनों में स्कूल बंद हो जाते हैं, और वे बंकरों में समय बिताते हैं। महिलाएं घर संभालती हैं, लेकिन हमेशा बंकर में शरण लेने को तैयार रहती हैं। इन गांवों के लोगों पर मनोवैज्ञानिक प्रभाव गंभीर होते हैं। बच्चे रात को गोलीबारी की आवाज से डरकर जागते हैं, तो बुजुर्गों में तनाव और चिंता आम है। प्राकृतिक चुनौतियां स्थिति को और जटिल बनाती हैं। राजस्थान में पानी की कमी और कच्छ में खारे पानी की समस्या खेती को मुश्किल बनाती है, जबकि जम्मू-कश्मीर में भूस्खलन और बाढ़ जोखिम बढ़ाते हैं। गोलाबारी के दौरान अस्पताल पहुंचना जोखिम भरा होता है। कई गांवों में प्राथमिक स्वास्थ्य केंद्र भी नहीं हैं।

पलायन एक उभरती समस्या है। युवा रोजगार और बेहतर भविष्य के लिए शहरों का रुख कर रहे हैं। यह पलायन न केवल सामाजिक संरचना को कमजोर करता है, बल्कि सीमा की रणनीतिक सुरक्षा के लिए भी खतरा है। सरकार इन गांवों की रणनीतिक अहमियत को समझती है और उनकी सुरक्षा के लिए कई कदम उठा रही है। नियंत्रण रेखा पर सेना और अंतरराष्ट्रीय सीमा पर बीएसएफ तैनात है। बाड़बंदी और एंटी-इन्फिल्ट्रेशन ऑब्स्टेकल सिस्टम घुसपैठ को रोकते हैं। 2018 से लेकर 2020 के बीच जम्मू-कश्मीर और पंजाब में 14,000 से अधिक व्यक्तिगत और सामुदायिक बंकर बनाए गए, जो गोलाबारी के दौरान ग्रामीणों को सुरक्षा देते हैं। वाइब्रेंट विलेज कार्यक्रम इन गांवों के लिए एक आशा की किरण है। 1947 के कबाइल युद्ध से लेकर 1971 के युद्ध, कारगिल युद्ध और आज के तनाव तक, ये गांव हर संकट में अडिग रहे हैं। इनका सामरिक महत्व असीम है, क्योंकि ये भारत की संप्रभुता की जीवित ढाल हैं। लेकिन इनके साहस और बलिदान को केवल बंकरों और सुरक्षा से नहीं, बल्कि बेहतर जीवन से भी सम्मानित करना होगा।

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