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मुद्दा: सेबी की कहानी का सच लगातार पीछे क्यों जा रहा? चीजें वैसी नहीं हैं जैसी वे दिखती हैं!

Sun, 18 Aug 2024 05:18 AM IST
Palaniappan Chidambram पी. चिदंबरम
Updated Sun, 18 Aug 2024 05:18 AM IST
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सार
अगर आप अंधविश्वास, नाटक और अराजकता को हटा दें तो किसी कहानी में से आप सच को पा लेंगे। लेकिन सेबी की कहानी का सच लगातार पीछे क्यों जा रहा है?
 
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SEBI story catches attention of business economic world things are not as they seem!
SEBI - फोटो : ANI

विस्तार

भारतीय प्रतिभूति एवं विनिमय बोर्ड (सेबी) की कहानी ने व्यापार और आर्थिक जगत का ध्यान अपनी ओर खींचा है। शर्लक होम्स ने कहा है, “अगर आप अंधविश्वास, नाटक और अराजकता को हटा दें तो आपके पास सिर्फ तथ्य बचेंगे।” इस कहानी में अंधविश्वास यह है कि सरकार हमेशा लोगों के हित में बोलती और काम करती है। नाटक यह है कि बड़े व्यवसायी छोटे निवेशकों के खिलाफ खड़े हो जाते हैं और आखिर में हम खून-खराबे से बचना चाहते हैं। अराजकता यह है कि अनेक लोग अनेक तरह से आवाजें उठाते हैं, जो सिर्फ शोर बनकर रह जाती हैं।



अगर आप अंधविश्वास, नाटक और अराजकता को हटा दें तो आप सच को पा लेंगे।

सेबी की कहानी से जुड़ा मुख्य प्रश्न
मुख्य सवाल यह था कि एक व्यावसायिक समूह में निवेश का स्रोत क्या था? समूह ने किसी भी तरह की गड़बड़ी से इनकार किया और दावा किया कि पैसा वैध था। संदेह करने वालों ने आरोप लगाया कि पैसा ओवर-इनवॉइसिंग और राउंड-ट्रिपिंग के माध्यम से था और यह अवैध था। सेबी ने मामले की जांच की और कहा कि पहली नजर में कुछ भी गलत नहीं पाया गया, लेकिन संदेहकर्ता इससे संतुष्ट नहीं थे। अंतत: सुप्रीम कोर्ट ने मामले की जांच के लिए न्यायाधीश सप्रे की निगरानी में पांच सदस्यों की समिति को जांच कर रिपोर्ट देने को कहा।


समिति ने क्या पाया?
यहां यह जानना महत्वपूर्ण है कि जस्टिस सप्रे समिति ने क्या पाया और क्या नहीं? समिति ने पाया कि इसमें 13 निवेशक थे, जिनमें से 12 विदेशी पोर्टफोलियो वाले निवेशक (एफपीआई) थे। इससे लाभ प्राप्त करने वाले प्रत्येक एफपीआई मालिक के नाम उजागर किए गए, लेकिन इस कड़ी के आखिरी निवेशक का नाम नहीं बताया गया, क्यों? क्योंकि इस अंतिम निवेशक का नाम उजागर करने की जरूरत 2018 में खत्म कर दी गई थी। सेबी ने फिर भी अक्तूबर 2020 से 13 विदेशी संस्थाओं के स्वामित्व की जांच की, लेकिन उसका नतीजा कुछ भी नहीं निकला। समिति की टिप्पणी तीखी थी- “इस तरह की जानकारी के बिना सेबी स्वयं के द्वारा किए जा रहे संदेह को संतुष्ट करने में असमर्थ है। प्रतिभूति बाजार नियामक को इस बात की आशंका है कि कुछ गलत हुआ है, लेकिन यह भी पाया गया कि संबंधित नियमों में विभिन्न शर्तों का पालन भी किया गया है। ऐसे में देखा जाए तो यह रिकॉर्ड मुर्गी और अंडे वाली स्थिति को दिखाता है।”

इससे जुड़े सवाल पर कि क्या लाभार्थी मालिक, निवेश करने वाली कंपनियों के ‘संबंधित पक्ष’ थे, समिति ने पाया कि ‘संबंधित पक्ष’ और ‘संबंधित पक्ष लेन-देन’ की शर्तों में नवंबर 2021 में कई तरह के संशोधन किए गए, लेकिन 1 अप्रैल, 2022 से लेकर 1 अप्रैल, 2023 तक संभावित प्रभाव देखने को मिला। कंपनी के इस पहलू पर भी समिति की टिप्पणी तल्ख ही थी- “इस तरह संभावित तरीके से शर्तें बनाने से संबंधित पार्टी से लेन-देन को नियंत्रित करने वाले नियमों में छिपे सिद्धांतों का परीक्षण करने की व्यवहार्यता खत्म हो गई है।”

इस समिति का अंतिम निष्कर्ष था- “ऐसा लगता है कि एफपीआई की स्वामित्व संरचना पर सेबी की विधायी नीति एक दिशा में काम कर रही है, जबकि सेबी का प्रवर्तन दूसरी दिशा में।”

सेबी की जांच जारी है
इसके बाद भी सेबी ने 24 मामलों में अपनी जांच जारी रखी। जब समिति की रिपोर्ट सुप्रीम कोर्ट को सौंपी गई तो अदालत ने उसकी दलीलों को सुना और 3 जनवरी, 2024 के एक आदेश द्वारा सेबी की कार्रवाई को बरकरार रखा। कोर्ट ने सेबी को यह निर्देश भी दिया कि तीन महीने के भीतर अपनी जांच पूरी करे, अब तक सात महीने गुजर चुके हैं।

निजी हितों से जुड़ा मामला
सबने यह सोचा कि शॉर्ट सेलर, हिंडनबर्ग रिसर्च द्वारा लगाए गए आरोपों को जनवरी 2024 में ही खत्म कर दिया गया, लेकिन अगस्त में यह एक बार फिर सुर्खियों में तब आ गया, जब उसने सेबी के चेयरपर्सन माधबी पुरी बुच और उनके पति धवल बुच के खिलाफ आरोप लगाए। माधवी बुच को अप्रैल 2017 में सेबी का पूर्णकालिक सदस्य नियुक्त किया गया था। अपना कार्यकाल पूरा करने के एक अंतराल बाद 1 मार्च, 2022 को उन्हें अध्यक्ष नियुक्त किया गया। जब 2018 और 2021-24 में महत्वपूर्ण निर्णय लिए गए तो माधवी बुच सेबी में निर्णय लेने वाले पद पर थीं।

माधवी बुच के खिलाफ आरोप ये हैं कि उनके निर्णय व्यक्तिगत रुचि से प्रभावित हैं। ऐसा लगता है कि उनके और पति के कंपनियों में कुछ आर्थिक हित थे, जिनकी जांच सेबी ने की थी और जस्टिस सप्रे समिति ने उसकी समीक्षा की थी। माधवी बुच ने अपने निवेश को स्वीकार किया, लेकिन उसका स्पष्टीकरण देते हुए कहा कि ये निवेश तब किए गए थे, जब वह और उनके पति प्राइवेट सिटीजन थे। जब माधबी पुरी की नियुक्ति सेबी में हुई तो उन्होंने इस निवेश को भुना लिया। इसके तुरंत बाद ही ये कंपनियां निष्क्रिय हो गईं।

यहां मुद्दा यह नहीं है कि माधवी बुच ने कुछ गलत किया या उनके कुछ निजी हित थे। मुद्दा यह भी नहीं है कि सरकार व्यापारिक समूह को बचाने के लिए माधबी बुच को बचा रही है। मुद्दा बहुत ही सरल और सीधा है कि क्या माधवी बुच ने अपने पिछले संबंधों और काम के साथ हितों के संभावित टकराव का खुलासा सेबी, सरकार, जस्टिस सप्रे समिति और सुप्रीम कोर्ट के सामने किया था? बिल्कुल नहीं। यहां तक कि माधवी बुच ने खुद को जांच से अलग भी नहीं किया।

यह मानते हुए कि सभी तथ्य माधवी बुच के पक्ष में हैं, कम से कम उन्होंने एक गंभीर और दोषपूर्ण गलती की है। उन्हें अपनी स्थिति साफ करनी चाहिए थी और मामले से खुद को अलग कर लेना चाहिए था। उनकी भागीदारी ने जांच को कलंकित किया है। उन्हें इस्तीफा देना चाहिए और आरोपों की नए सिरे से जांच होनी चाहिए।

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