ऐतिहासिक मोड़ पर स्कॉटलैंड
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भारतीय महाद्वीप सहित दुनिया के विभिन्न क्षेत्रों में राष्ट्रों को विभाजित करने वाला ब्रिटेन खुद टूटने से बाल-बाल बच गया। यदि सिर्फ चार लाख लोग, यानी लखनऊ के किसी मोहल्ले के बराबर आबादी के लोग भी, स्कॉटलैंड की आजादी के पक्ष में मतदान कर देते, तो साम्राज्यवादी ब्रिटेन को उपनिवेशों के ऐतिहासिक शोषण का दंड मिल जाता। स्कॉटलैंड की आजादी से जुड़ी रायशुमारी के दौरान इंग्लैंड की ओर से प्रचार किया जा रहा था कि यदि स्कॉटलैंड स्वतंत्र हो गया, तो विश्व भर में अलगाववादी आंदोलनों को बल मिलेगा। इसमें भारत के जम्मू-कश्मीर से लेकर नगालैंड, और पाकिस्तान के बलूचिस्तान तक का उल्लेख भी किया गया। स्कॉटलैंड की स्वतंत्रता के विरुद्ध दूसरा तर्क काफी दिलचस्प था और वह यह कि इस विभाजन से स्कॉच ह्विस्की महंगी हो जाएगी।
स्कॉटलैंड की आजादी की मांग के पीछे तीन खास कारण रहे हैं, जो भारत के स्वाधीनता संग्राम से काफी मिलते-जुलते हैं। पहला कारण था, स्कॉटिश जनता पर की जा रही नृशंसता। स्कॉटलैंड की हिमाच्छादित पर्वत शृंखला के वनों की कटाई तीन सदियों से इंग्लैंड की शासकीय नीति का हिस्सा रही है। इस नीति की नृशंसता की गवाह यहां की पहाड़ियां भी रही हैं। वस्तुतः स्कॉटलैंड में अपने फौजियों को नरसंहार का प्रशिक्षण देकर ही ब्रिटिश साम्राज्यवादी अपने कमांडरों को जलियांवाला बाग, मुंबई के अगस्त क्रांति मैदान या बलिया आदि विद्रोही स्थलों पर भेजते थे। दूसरा कारण है, स्कॉटलैंड में मौजूद प्राकृतिक और खनिज संपदा। स्कॉटलैंड की आजादी के पक्षधर लोगों का मानना है कि इंग्लैंड खासतौर से सस्ते में यहां से कच्चा तेल ले जाता है। तीसरा कारण, स्कॉटलैंड को अनावश्यक युद्धों में झोंक देने से संबंधित था। इराक, सीरिया और बोस्निया में हुए युद्धों में स्कॉट सैनिकों को जान गंवानी पड़ी है। स्कॉटलैंड अपनी विपन्नता के कारण यह उत्पीड़न सहता आया है।
अमूमन इंग्लैंड से आए सत्तासीन अंग्रेजों को भारतीय उपनिवेश के विकास में रुचि नहीं रही। मगर जो शासक स्काटलैंड प्रांत से भारत आए थे, उनका दिल शोषित और पीड़ितों गुलामों के लिए धड़कता रहा। मसलन, बंबई और मद्रास प्रांतों में शिक्षा की शुरुआत उन गवर्नरों ने की थी, जो स्कॉट थे। मुंबई 1836 में मछुआरों का एक टापू था, जब माउंट स्टुअर्ट एलफिंस्टन ने वहां टाउन हाल बनवाया और विश्वविद्यालय की नींव रखी। उनके नाम का कॉलेज आज भी लब्धप्रतिष्ठित है। वह इतिहासवेत्ता थे। गनीमत रही कि काशी में वह अवध के नवाब वाजिद अली शाह के सैनिकों द्वारा कातिलाना हमले से बचकर भाग गए। तब वारेन हेस्टिंग्स जालिमाना तरीके से काशी नरेश चेत सिंह, अवध की बेगमों आदि की रियासतों को ब्रिटिश साम्राज्य में मिला रहा था। उनके उत्तराधिकारी जॉन मेल्कम भी स्कॉटलैंड से आए थे, जिन्होंने गवर्नर के पद से बंबई प्रांत में भारतीय कर्मियों को प्रशिक्षण देकर ऊंचे पदों पर नियुक्ति की प्रक्रिया चलाई। उनका स्वामीनारायण महंत से सामीप्य था, जो गुजरात क्षेत्र में वैष्णव धर्म का प्रचार कर रहे थे।
मद्रास प्रांत के गर्वनर टॉमस मुनरो का उदाहरण तो आज भी दक्षिण भारत में सम्मान से दिया जाता है। उन्होंने प्रतिष्ठित प्रेसिडेंसी कॉलेज की स्थापना कर स्नातकोत्तर शिक्षा की बुनियाद रखी। राजा टोडरमल ने जो काम मुगल राज में उत्तरी भू-भाग में किया, टॉमस मुनरो ने वैसी ही रैयतवारी प्रणाली की शुरुआत दक्षिण में की, जिससे काश्तकारों को शोषण से बचाया गया। एक बार वह बेल्लारी जनपद (तब आंध्र मगर आज कर्नाटक) में स्थित स्वामी राघवेंद्रस्वामी मठ में गए। वह मठ की संपत्ति पर कब्जा करने के आदेश के पालन के लिए गए। मगर द्वैत मत से प्रेरित होकर सारी संपत्ति मठ को दे दी। आज भी कड़प्पा (आंध्र प्रदेश) के मंदिर में टॉमस मुनरो की प्रतिमा की आराधना होती है। वह कड़प्पा के कलेक्टर थे। चेन्नई के मध्य-भाग में उनकी घुड़सवार की मुद्रा वाली मूर्ति लगी है। किसी ने तोड़ी भी नहीं, क्योंकि स्कॉटलैंड का यह व्यक्ति भारतीयों का हितैषी रहा। तेलुगू और तमिलभाषी ढाई सदियों बाद भी मनरो को मनरालप्पा के नाम से याद करते हैं।
तीन और स्कॉट विभूतियों का भी जिक्र किया जा सकता है। इनमें से एक कॉलिन कैम्पबेल देहरादून आए थे, जिन्हें इसलिए भी याद किया जाता है कि उन्होंेने भारत का प्रथम भौगोलिक मानचित्र तैयार किया। उसके बाद ही यहां सर्वेयर जनरल का कार्यालय बना। भूगोलविद् की तरह एक वनस्पतिशास्त्री भी आए थे, नाम था एलेक्जेंडर किड्ड। उन्होंने कोलकाता में विश्वविख्यात बॉटनिकल गार्डन बनाया था, जहां देश का प्राचीनतम वटवृक्ष आकर्षण का केंद्र है। तीसरे थे, डेविड ह्यूम, जो एक दार्शनिक थे और जिनकी साम्राज्यवाद विरोधी रचनाओं से भारतीय राष्ट्रवादियों को काफी प्रेरणा मिली थी। लेकिन सर्वाधिक भारतभक्त थे राष्ट्रीय कांग्रेस के अध्यक्ष रहे जॉर्ज यूल (1888), जिन्होंने इलाहाबाद में हुए कांग्रेस सम्मेलन की अध्यक्षता की थी।
यदि स्कॉटलैंड से भारत आए इन राजनयिकों की चलती, तो भारत को 1947 से तेईस वर्ष पूर्व 1924 में ही स्वतंत्रता मिल जाती, जब स्कॉट सोशलिस्ट नेता और भारत मित्र रेम्से मैकडोनल्ड ब्रिटेन की साझा सरकार के प्रधानमंत्री थे। उन्होंने प्रथम गोलमेज सम्मेलन आयोजित किया था, ताकि भारतीय उपनिवेश का मसला हल हो सके। पर मुस्लिम लीग के अड़ियलपन से यह संभव नहीं हो सका।
अब जब स्कॉटलैंड के भविष्य से जुड़ी रायशुमारी के नतीजे आ गए हैं, स्कॉटलैंड के शुभचिंतक और प्रशंसक भारतीयों को इस बात का जरूर संतोष होगा कि 55 फीसदी वोट पाए इंग्लैंड समर्थकों को अब 45 फीसदी स्वाधीनता प्रेमियों का शोषण खत्म करना पड़ेगा। विकास की गति में तेजी लानी पड़ेगी। तेल से होने वाली आय भी साझा करनी होगी।
(लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं)