{"_id":"d68e2d96-ae99-11e2-93d9-d4ae52bc57c2","slug":"scams-in-india-and-poor-people","type":"story","status":"publish","title_hn":"घोटाले के तूफान में डूबते गरीब","category":{"title":"Opinion","title_hn":"नज़रिया ","slug":"opinion"}}
घोटाले के तूफान में डूबते गरीब
Updated Fri, 26 Apr 2013 11:21 PM IST
विज्ञापन
खबरें लगातार पढ़ने के लिए अमर उजाला एप डाउनलोड करें
या
वेबसाइट पर पढ़ना जारी रखने के लिए वीडियो विज्ञापन देखें
अगर आपके पास प्रीमियम मेंबरशिप है तो
एक बार फिर 2 जी घोटाला एवं दूरसंचार क्षेत्र की अनियमितता सुर्खियों में है। द्रमुक को छोड़कर कांग्रेस का कोई भी नेता इसमें संलिप्त नहीं है। सुप्रीम कोर्ट ने एक बार फिर दखल दिया है और इस घोटाले से प्रत्यक्ष रूप से जुड़े कई लोग जेल में हैं।
विज्ञापन
बेशक कई लोगों पर आरोप लगाए जा रहे हैं, लेकिन ठोस सुबूत द्रमुक को छोड़कर और किसी के खिलाफ नहीं हैं। द्रमुक को विधानसभा चुनाव में तो इसकी कीमत चुकानी ही पड़ी, आगामी लोकसभा चुनाव में उसके लिए इससे भी बुरी स्थिति होगी।
विज्ञापन
कोई भी गठबंधन मददगार नहीं होगा, और चूंकि कांग्रेस ने गठबंधन की मजबूरियों के चलते समय पर कार्रवाई नहीं की, इसलिए उसे भी कीमत चुकानी होगी।
अभी पश्चिम बंगाल में एक चिटफंड घोटाला उजागर हुआ है। जो सामने आया है, वह तो पूरे घोटाले का एक छोटा-सा हिस्सा है। अकेले पश्चिम बंगाल में ही 400 चिटफंड कंपनियां मिल जाएंगी। इस मामले में तृणमूल कांग्रेस और उसकी मुखिया ममता बनर्जी दूसरे पर आरोप लगाकर अपनी जिम्मेदारी से बच नहीं सकतीं, जैसा कि वह पिछले 23 महीनों से कर रही हैं।
विज्ञापन
समय के साथ वहां और भी चिटफंड कंपनियां डूबेंगी। यह ममता बनर्जी के लिए काफी नुकसानदेह है, क्योंकि इसमें लाखों ग्रामीण गरीबों ने पैसा लगाया था। पंद्रह से पचास प्रतिशत कमीशन पर काम करने वाले इस चिटफंड कंपनी के हजारों एजेंट सड़कों पर उतर आए हैं, क्योंकि न सिर्फ उनकी रोजी-रोटी खतरे में है, बल्कि लाखों गरीब लोग इससे प्रभावित हुए हैं।
यह आंदोलन असम, ओडिशा और झारखंड तक फैल सकता है। शारदा ग्रुप के डूबने से पश्चिम बंगाल में तूफान आया ही है, वहां अब एक और चिटफंड कंपनी रोज वैली के डूबने की खबर है। सेबी की जांच जैसे-जैसे आगे बढ़ेगी, डूबने वाली कंपनियों की सूची भी बढ़ती जाएगी। चूंकि तृणमूल के दो सांसदों की शारदा ग्रुप के घोटाले में लिप्तता है, इसलिए इस तूफान पर अंकुश लगा पाना ममता बनर्जी के बूते की बात नहीं है।
इस बीच, हमारे सामने मानवीयता का संकट आ खड़ा हुआ है। पांच वर्षीय बच्ची को बंधक बनाकर बलात्कार करने की घटना अकथनीय है। सड़कों पर लोगों का गुस्सा बेकाबू है।
हालांकि इसमें राजनीति भी खूब हो रही है, क्योंकि भाजपा एवं वाम दलों से जुड़े छात्र संघों के साथ आम आदमी पार्टी के कार्यकर्ताओं ने आंदोलन किया, लेकिन इन तमाम जनाक्रोश एवं प्रतिरोध की अनदेखी नहीं की जानी चाहिए। समस्या का हल ढूंढते वक्त यह कहना आसान होता है कि बलात्कारियों के खिलाफ कठोर से कठोर कानून बनाया जाना चाहिए।
जब मैं यह लिख रहा हूं, तब दिल्ली में एक तेरह वर्षीय बालिका एवं मध्य प्रदेश में एक चार वर्षीय बच्ची के साथ बलात्कार की खबरें आ चुकी हैं। ओडिशा, मध्य प्रदेश, उत्तर प्रदेश, आंध्र प्रदेश, असम एवं पश्चिम बंगाल से भी बच्चियों सहित कई सामूहिक बलात्कार की खबरें आई हैं।
हम अभी चुनावी मौसम के दौर से गुजर रहे हैं। यूपीए एवं कांग्रेस रक्षात्मक है, जबकि भाजपा एवं वाम दल आक्रामक मुद्रा में। सभी क्षेत्रीय पार्टियां विचार व्यक्त करने से पहले अपने विकल्पों को तौल रही हैं। जेपीसी एवं कोलगेट मुद्दे को लेकर विवाद जारी है।
इस पर आश्चर्य नहीं होना चाहिए कि वास्तविक दस्तावेज के सामने आने से पहले ही हर कोई अपनी बंदूकें ताने खड़ा है, क्योंकि पिछले कुछ वर्षों से हम दस्तावेजों के लीक होने की घटना से निपटते रहे हैं। भाजपा प्रधानमंत्री का इस्तीफा चाहती है और बसपा एवं सपा की अपनी आपत्तियां हैं, जबकि जद(यू) का रुख भी भाजपा से अलग है।
हर कोई अपनी पार्टी को किसी खास विचारधारा से प्रतिबद्ध करने से पहले अपने वोट बैंक को देख रहा है। पूरी व्यवस्था अनिश्चितता के शिकंजे में है, क्योंकि सभी एक ही नाव में सवार हैं।
मई की शुरुआत में कर्नाटक में विधानसभा के चुनाव होने हैं। पारंपरिक विश्लेषक कांग्रेस को वहां अधिकतम सौ सीटें देंगे और जद (एस) को 35 से 40 सीटें। भाजपा एवं पूर्व मुख्यमंत्री बीएस येदियुरप्पा की वहां भारी हार दिख रही है।
मेरा मानना है कि कांग्रेस को वहां 120 सीटों के साथ बहुमत हासिल होगा, क्योंकि कर्नाटक की जनता ने वहां पिछले पांच वर्षों में अराजकता का सामना किया है और वह अब एक स्थायी सरकार को मौका देगी। अलबत्ता कर्नाटक की चुनावी लड़ाई में पूर्व प्रधानमंत्री एवं जद (एस) के मुखिया एचडी देवगौड़ा एवं उनके बेटों की अनदेखी नहीं करनी चाहिए।
राजनीतिक दलों को व्यवस्था में आपराधिक तत्वों की घुसपैठ कराने एवं उनसे राजनीतिक चंदे (जिनमें 90 फीसदी नकद होते हैं) लेने की भारी कीमत चुकानी पड़ेगी। कर्नाटक में खनन घोटाले की भाजपा को कीमत चुकानी ही पड़ रही है। बेल्लारी के पूरे आपराधिक कारनामे को सर्वोच्च न्यायालय के पूर्व न्यायाधीश संतोष हेगड़े ने उजागर किया।
दुखद है कि भाजपा उसमें घिरी हुई है, क्योंकि बीएस येदियुरप्पा एवं उनके परिजन उसमें शामिल थे। बेशक शीर्ष स्तर का कोई नेता संलिप्त नहीं था और किसी ने भी आडवाणी, अरुण जेटली और सुषमा स्वराज पर कोई गलत काम करने का आरोप नहीं लगाया है, लेकिन पार्टी को इसकी कीमत चुकानी पड़ी।
आंध्र प्रदेश में कांग्रेस भी ऐसी ही स्थिति से जूझ रही है, जहां रेड्डी बंधुओं की हजारों करोड़ की संपत्ति है। दोनों मामलों में शीर्ष अदालत ने हस्तक्षेप किया है, कई लोग जेल में हैं और अदालतों में ये मामले वर्षों चल सकते हैं।