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संकट के दौर में बचत
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प्रतीकात्मक तस्वीर
हाल ही में ब्रिटेन के प्रधानमंत्री बोरिस जॉनसन ने कहा कि वह चाहते हैं कि लोग ज्यादा से ज्यादा खरीदारी करें। इससे पहले ब्राजील के राष्ट्रपति बोलसोनारो ने भी अपने देश में कोरोना से निपटने के लिए लॉकडाउन के सवाल पर कहा था कि अगर एक गाड़ी दुर्घटनाग्रस्त हो जाए, तो क्या मैं कार का कारखाना बंद कर दूं।
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इनसे भी पहले 9/11 में वर्ल्ड ट्रेड सेंटर टूटने के बाद अगले ही दिन अमेरिका के तत्कालीन राष्ट्रपति जॉर्ज बुश ने फरमाया था कि गो शॉपिंग। यानी खरीदारी करने निकलो। बताया तो यह भी गया था कि डोनाल्ड ट्रंप भी लॉकडाउन के विरुद्ध थे। उनका और कुछ बड़े बहुराष्ट्रीय निगमों का मानना था कि अगर कोरोना से लोग मरते हैं, तो मरें, लेकिन लॉकडाउन करके हम अर्थव्यवस्था को नष्ट नहीं कर सकते।
अधिक से अधिक उपभोग पश्चिमी समाज का मूल मंत्र है, जो इन दिनों अपने यहां भी दिखाई देता है। उपभोग यानी अधिक से अधिक खरीदारी। बाजार गुलजार यानी कि बाजार में मिलने वाले तरह-तरह के उत्पाद बनाने वाली कंपनियों की चांदी। भारी मुनाफा।
कंपनियां चलें, तो लोगों को रोजगार दें। वे आपको रोजगार देंगी, आपकी जेब में पैसा आएगा, आपकी क्रयशक्ति बढ़ेगी, तो कंपनियों का पैसा वापस उन्हीं की जेब में पहुंचेगा। हां, इस बहाने आपका भी जीवन चल जाएगा। इसी को आर्थिक स्थिति का रफ्तार पकड़ना या ग्रोथ कहते हैं।
दरअसल कंपनियां नहीं चाहतीं कि आप बचत करें। इसीलिए वे आपकी जरूरतें पूरी करने के लिए तरह-तरह के प्रलोभन देती हैं। आपको ऋण लेने के लिए उकसाती हैं। अमेरिका के बारे में कहा जाता है कि वहां आदमी बहुत कम तनख्वाह लेकर घर में घुसता है।
अकसर ऋण चुकाने में ही इसका बड़ा हिस्सा निकल जाता है। बुरे दिनों के लिए बचत भी जरूरी है, पर इन दिनों ऐसा कोई नहीं सिखाता। आपकी हैसियत, समाज में तरह-तरह के दिखावे, शादी-ब्याह, त्योहार-इन सब पर दूसरे से अधिक खर्च करने और श्रेष्ठ दिखने की लालसा ही हमारी बचत और जेब को खाली करती है तथा तमाम तरह के व्यापार को लाभ पहुंचाती है।
अपने देश में चार्वाक का यह कथन जब-तब उद्धृत किया जाता है कि चाहे घी पीने के लिए कर्ज लेना पड़े, तो भी कोई हर्ज नहीं, क्योंकि जब तक जिएं सुख से जिएं। या ऐसा भी कहा जाता है कि खाए-खरचे जो बचे, तो जोड़िए करोड़। इन दिनों यह प्रवृत्ति उन अर्थव्यवस्थाओं में भी दिखाई देती है, जहां बचत न करें, तो इलाज न हो, दो जून की रोटी भी न चले।
इन दिनों, जब अगले दिन की नौकरी का भरोसा नहीं, तब तो बचत और भी जरूरी है। पश्चिम में तरह-तरह की सामाजिक सुरक्षा है। बेरोजगारी भत्ता भी है। अपने देश में ऐसा क्या है? हां, यह जरूर है कि आप जो बचत करते हैं, उस पर तो टैक्स देना पड़ता है और जो खर्च करते हैं, उस पर टैक्स में छूट मिलती है।
प्रकारांतर से इस तरह ज्यादा से ज्यादा खर्च को बढ़ावा दिया जाता है। जबकि अपने यहां सामाजिक सुरक्षा जैसी कोई बात ही नहीं है। एक बार रोजगार न रहे, या आप इस तरह से बीमार पड़ जाएं कि काम करने लायक ही न रहें, तो क्या हो। क्योंकि सब सौ फीसदी अपने ही संसाधनों पर निर्भर होते हैं।
अपने संसाधन न हों, तो सरकार, अड़ोसी-पड़ोसी, नाते-रिश्तेदार तो छोड़िए, निकट परिवारी जनों की निगाह में भी आपकी कोई कीमत नहीं रहती। इन दिनों जिन युवाओं से बात होती है, वे अपने भविष्य को लेकर डरे हुए हैं।
वे कहते हैं कि अब तक तो लगता था कि अभी तो जीवन पड़ा है। पहले मजे कर लें, घूम-फिर लें, हर तरह के खाने का स्वाद चख लें, एक से एक ब्रांड के कपड़े और सामान खरीद लें। लेकिन इस मुसीबत से पहली बार पता चला है कि अगर हाथ में पैसे न होंगे, अकाउंट खाली होगा, तो एक दिन जीवन नहीं चलेगा।
इसलिए बचत करने की बुजुर्गों की सलाह ठीक है। अब ऐसा ही करेंगे। बहुत दिनों बाद गांधी जी की पुस्तक सत्य के प्रयोग दोबारा पढ़ रही थी। इसके शुरुआती पृष्ठों में ही उन्होंने बचत पर बहुत जोर दिया है। अफसोस, आज के नेता ऐसा नहीं सिखाते।