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सत्संग ने बदल दिया जीवन

शिवकुमार गोयल Updated Tue, 12 Feb 2013 12:16 AM IST
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satsang changed his life

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हमारे धर्मग्रंथों में कहा गया है कि ईमानदारी से कमाए हुए धन से ही जीवन का निर्वहन किया जाना चाहिए। गलत तरीकों से अर्जित धन का दुष्प्रभाव परलोक पर भी पड़ता है। इसी से जुड़ी एक कहानी फूलसिंह पटवारी की है। आर्यसमाज के सत्संग से जब वह संस्कारित हुए, तो उन्होंने संकल्प लिया कि वह कभी रिश्वत नहीं लेंगे। हर दिन वह प्रभु का स्मरण करते। सरकारी कामकाज से निवृत्त होने के बाद लोगों की सेवा में समय लगाते।
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एक बार आर्यसमाज के एक समारोह में मंच पर उनका सम्मान किया गया। उनके सेवा कार्यों की प्रशंसा की गई। उनके अंतःकरण में यह भावना पैदा हुई कि भले ही आज उनका जीवन शुद्ध हो गया है, किंतु वर्षों तक पटवारी के पद पर रहने के कारण उन्होंने किसानों व जमींदारों से रिश्वत तो ली ही थी। इस कलंक को दूर किया ही जाना चाहिए। एक महीने का अवकाश लेकर वह अपने गांव पहुंचे।


रिश्वत के धन से खरीदी गई जमीन बेची तथा उससे मिले रुपयों को लेकर वहां-वहां गए, जहां वह पटवारी रहे थे। वह गांवों में पहुंचते तथा हाथ जोड़कर लोगों को रिश्वत के रुपये लौटा देते। बाद में अपनी निजी भूमि को बेचकर उन्होंने गुरुकुलों की स्थापना की। आर्य संन्यासी स्वामी स्वतंत्रानंद जी ने कहा था, उसी सत्संग की सार्थकता है, जो फूलसिंह की तरह जीवन को पूरी तरह बदल डाले।

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