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पेड़ किस मर्ज की दवा हैं?

Wed, 26 Jun 2013 08:58 PM IST
राजेंद्र शर्मा
राजेंद्र शर्मा Updated Wed, 26 Jun 2013 08:58 PM IST
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satire on tree

पेड़ आखिरकार होते किस मर्ज की दवा हैं? इतना तो खैर प्रधानमंत्री जी ने पहले ही चेता दिया था कि पेड़ों से पैसे देने की उम्मीद कोई न करे। पैसे पेड़ों पर नहीं लगते। अभी उत्तराखंड में भारी तबाही हो गई। इतने सारे पेड़ थे, खड़े देखते रहे, पर कुछ कर पाए? जंगल बचाओ, जंगल लगाओ, सब बेकार। और अब मुंबई के ठाकरे का रहस्योद्घाटन आया है कि सहयोगी पार्टियां भी पेड़ पर नहीं लगतीं। फिर पेड़ के पेड़ होने का फायदा ही क्या? सिर्फ फल, फूल, पत्तों के लिए तो पेड़ को सिर पर नहीं चढ़ाया जा सकता! पेड़ और काम की चीजें लगाकर दिखाएं, तब कोई बात भी है।

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वैसे इस पर भी हुज्जत करने वाले उठकर खड़े हो गए हैं। यह तो कोई नहीं कह रहा कि सहयोगी पार्टियां पेड़ पर उगती हैं, पर इस तरह की बातें जरूर हो रही हैं कि शिव सेना को बड़ी देर से समझ आई कि सहयोगी खोजने के लिए, दूसरी पार्टियों से रिश्ते बनाने-निभाने पड़ते हैं। नीतीश कुमार भी तो यही कह रहे थे। आडवाणी जी तो और भी पहले से यह कह रहे थे। तब तो उनकी बात उनके अपनों ने भी नहीं सुनी। अब पछताए होत क्या जब चिड़िया चुग गई खेत!
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वैसे कोई कुछ भी कहे, नरेंद्र भाई की पार्टी पर इतने भोलेपन का इल्जाम कोई नहीं लगा सकता कि उसे पता ही नहीं था कि सहयोगी पार्टियां पेड़ पर नहीं लगतीं? पेड़ पर लगती होतीं, तो क्या सहयोगी पार्टियों के इतने नखरे होते कि उसे मत बनाओ, यह मंजूर नहीं है, ऐसी नहीं, वैसी छवि बनाओ, ऐसे नेता प्रधानमंत्री बनने चाहिए वगैरह, वगैरह। सवाल यह है ही नहीं कि सहयोगी पार्टियां कहां लगती हैं और कहां नहीं?
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सवाल यह है कि उनकी जरूरत ही किसे है? जिसे सहयोगी पार्टियों की जरूरत ही नहीं है, उसे इस पर माथाफोड़ी करने की जरूरत ही क्या है कि सहयोगी पार्टियां पेड़ पर उगती हैं या कहीं और? सहयोगियों के भरोसे वह रहता है, जो खुद कमजोर हो! कमजोर ही दूसरों के तरह-तरह के नखरे उठाने के लिए तैयार होगा। जो दबंग होते हैं, वे सहयोगियों के पीछे नहीं भागते। अलबत्ता कई बार सहयोगी उनके पीछे लग लेते हैं। झुंड तो गीदड़ों के होते हैं, शेर तो अकेला ही राज करता है। यह देश भी किसी जंगल से कम है क्या!

हां! एक छोटी-सी प्रॉब्लम जरूर है। कुर्सी हो या तख्त, पेड़ की लकड़ी से बन तो सकते हैं, पर सहयोगी पार्टियों की तरह ये भी पेड़ पर नहीं लगते।

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