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लेट-लतीफ देश में जल्दबाजी

Mon, 24 Jun 2013 08:59 PM IST
अरविंद तिवारी
अरविंद तिवारी Updated Mon, 24 Jun 2013 08:59 PM IST
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satire on monsoon

वाह रे मानसून! तूने तो कवियों को भी मात दे दी। कवि को अगर पुरस्कार मिलना हो, तो वह समारोह शुरू होने से बहुत पहले कार्यक्रम स्थल पर पहुंच जाता है! मानसून, तू तो बड़ा दगाबाज निकला, जो समय से पहले ही आ गया। अभी तो कायदे से पूरे देश में सूखा पड़ा भी नहीं था कि तू आ गया। मौसम विभाग ने समय पर ही तुम्हारे आने की भविष्यवाणी की थी। हर बार तू लगभग एक माह देरी से आया करता था, लेकिन इस बार तुझे क्या हो गया कि जल्दी आ गया।

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अभी ‘सूखा नियंत्रण केंद्र’ खुल भी नहीं पाए कि तू आ गया। खैर, उन्हें तो हम ‘बाढ़ नियंत्रण केंद्र’ में बदल देंगे, मगर उन बैनर और होर्डिंग्स का क्या होगा, जो प्रशासन ने सूखे को देखते हुए टांग दिए थे। सूखा हो या बाढ़, प्रशासन इससे ज्यादा कुछ कर भी नहीं पाता। बाढ़ नियंत्रण के लिए रेत की बोरियों में भी कमाई है, मगर नेताओं को ‘हरियाला सूखा’ सेलिब्रेट करने का अवसर नहीं मिल पाएगा।
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अभी तो नेता सूखाग्रस्त इलाके में जाने के लिए तैयार हो ही रहे थे कि तू आ गया। कुछ तो खैर बाढ़ग्रस्त इलाके का दौरा कर आएंगे, मगर सूखे के नाम पर राजनीति चमकाने वाले नेता कहां जाएंगे! एक तो जल्दी, उस पर इस तरह आया कि उत्तराखंड में आफत आ गई! पांच सितारा होटलों के स्वीमिंग पुल से निकलकर वीआईपी उत्तराखंड की त्रासदी पर बैठकें कर रहे हैं। वहां के नेता पहले दिल्ली आते हैं, फिर पहाड़ की ओर रुख कर रहे हैं।
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हमारे देश में लेट-लतीफी की शानदार परंपरा है। समय से पहले आने वाली ट्रेनों को रेल विभाग एवं यात्री उपेक्षा से देखते हैं। वारदात होने के बाद ही पुलिस मौके पर पहुंचती है और सरकारी दफ्तरों में जब कर्मचारी कूलर की मांग करते हैं, तो वह उन्हें सर्दियों में मिल पाता है। ऐसे लेट-लतीफ देश में तेरा समय से पहले आना हम पचा नहीं पा रहे हैं। प्राकृतिक आपदा आने पर हम पहले पर्यावरण असंतुलन पर बहस करते हैं, फिर राहत कार्यों की तरफ ध्यान देते हैं।


यहां आपदा के समय भी राजनीतिक मुद्दे तलाशे जाते हैं। सड़कें अगर टूट जाती हैं, तो स्थानीय प्रशासन चैन की नींद सो जाता है, क्योंकि वह जानता है कि ऐसी स्थिति में जो करेगी, वह सेना ही करेगी। वैसे तेरे जल्दी आने से टीवी चैनलों की टीआरपी बढ़ गई है। प्रशासन भले ही प्रभावित इलाकों में न पहुंचा हो, टीवी वाले वहां जरूर पहुंच गए और सबसे पहले पहुंचने की दावेदारी करने लगे।

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