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अपन तो बाजार के हवाले हैं
मुरली मनोहर श्रीवास्तव
Updated Tue, 02 Jul 2013 09:18 PM IST
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पेट्रोल हो डीजल हो या रसोई गैस, अब हमें इसके बढ़े रेट डराते और चौंकाते नहीं। हम सब बाजार के हवाले जो हैं। रुपया बाजार के हवाले पहले से ही था। सोना वैसे ही बाजार नियंत्रित था। सब्जी मौसम के हवाले है। महंगाई जमाखोरों के हवाले है। कल्याण योजनाओं की घोषणा चुनाव के हवाले रहती है और सहायता कार्यक्रम सेना के हवाले। दान-धर्म डरे-सहमे लोगों के हवाले है, तो देश लोक और तंत्र के हवाले। लोक का अर्थ बड़ा मारक है।
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इसे धर्मभीरू लोगों को इहलोक-परलोक बताकर समझाया जाता है। उन्हें कहा जाता है कि पाप मत करो, अच्छे काम करो। यह लोक तो व्यर्थ गया, परलोक बना लो। जो इस जन्म में सुख-संपन्नता भोग रहे हैं, वे पूर्व जन्मों के प्रसाद स्वरूप। जो लोकतंत्र में राजसी जीवन जी रहे हैं, उनकी संपन्नता सदैव बनी रहे, इसके गुर बताए जाते हैं। लोकतंत्र में राजसी जीवन कौन जी रहा है, यह सर्वविदित है। सो तंत्र तंत्र के नियंत्रक के हाथ में है और लोक हमारे हवाले। परलोक कोई और ले गया, पर लोक का दावेदार हमसे बेहतर कोई नहीं है।
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हम लोक हैं और बाजार के हवाले भी। बाजार कहता है कि जब सब एक से हैं और सबकी जरूरतें एक-सी हैं, तो हमें ग्रो करने से कौन रोक सकता है? सो मैं लोक बनकर बाजार की ताकत बन जाता हूं और तंत्र इस लोक को भुना लेता है। वह कहता है, मैं तुम्हें बाजार दूंगा, तुम मुझे क्या दोगे? और तब जिसे बाजार चाहिए, वह तंत्र से बार्गेन करता है। तंत्र फिर लोक से पूछता है, बोलो, क्या चाहिए तुम्हें, रोटी या गाड़ी? फ्रिज, एसी, फ्लैट, हॉस्पिटल, खेत-खलिहान, सस्ती सब्जी, कंडा या लकड़ी का चूल्हा? लोक-परलोक पर इहलोक हावी हो जाता है।
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समाजवाद चर्चा के लिए अच्छा है, पर उपयोग के लायक नहीं। लोक कहता है, विकास बेहतर है, भ्रष्टाचार और महंगाई लाइलाज बीमारी है। हमें किसी न किसी के हवाले तो होना ही है। अब क्या फर्क पड़ता है कि कौन क्या कह रहा है, और क्या कर रहा है? क्या घट रहा है और क्या बढ़ रहा है? लोक के अकेले होने के बाद उसका सुख क्या और दुख क्या? सुख-दुख तो तब होता है, जब कोई मातमपुर्सी करने वाला हो। जब सब कुछ बाजार के हवाले ही है, तो क्या पेट्रोल, क्या रुपया और क्या हमारा सुखी या दुखी होना? हम समझौतावादी मध्यमार्गी है और इसीलिए लोकतंत्र से निर्लिप्त हैं और बाजार के हवाले।