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लिलीपुतियन तुक्कड़

Sat, 01 Mar 2014 09:34 PM IST
संजय उपाध्याय
संजय उपाध्याय Updated Sat, 01 Mar 2014 09:34 PM IST
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sanjay upadhyay poem

चौंक पड़ा मैं/यह देख

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कि कविता मुझमें उतर रही है!
मुझ में!!
हे भगवान,
भक्ति-भाक्ति मैंने जुहारा- ''अरे! अरे!! यह क्या कर रही हैं कविते!
ऊसर में काहे बरस रही हैं?
सत्पात्र को उपकृत करिए न !''

नहीं सुना/ नहीं ही सुना
उद्ग्रीव बोलीं- अरे मूरिख!
नहीं दीख रहा तुझे
कितने बरसों से मैं तो उतर ही रही हूं
मूढ़ों-विमूढ़ों में
निठल्लों में/लफंगों में/बेचरित्रों में
उगा रही हूं फसलें लिलीपुतियन की
घर-घर, गली-गली, गांव-गांव।

वागवरुद्ध था मैं !...
कविता मुझमें उतरती जा रही थी
मेरी औकात विवस्त्र होती जा रही थी।
और तभी से मेरे पीछे याचक कुकुरमुत्तों की
रिरियामन मची हुई है।

-संजय उपाध्याय
इनके शब्द इनकी रचनात्मक बेचैनी को रूपायित करते हैं, जिसे आप सारे अवरोधों को पार कर जाने की युवा सुलभ बैचेनी भी मान सकते हैं। एटा में रहते हैं।

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