फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   saint saryu das nature

संत सरयूदास की करुण भावना

Mon, 28 Jan 2013 09:20 PM IST
शिवकुमार गोयल
शिवकुमार गोयल Updated Mon, 28 Jan 2013 09:20 PM IST
विज्ञापन
saint  saryu das nature

भारतीय धर्मग्रंथों में कहा गया है कि दीन-दुखियों की सेवा करना किसी धार्मिक कार्य से कम नहीं है। जो व्यक्ति दूसरों की सेवा अपने हाथों से करता है, वह मोक्ष का स्वतः हकदार बन जाता है। गुजरात के सुविख्यात संत सरयूदास जी का यह प्रसंग इसी से संबंधित है। एक बार रेलगाड़ी में बैठकर वह डाकोर तीर्थ जा रहे थे। उन्होंने देखा कि सामने की सीट पर बैठा वृद्ध कराह रहा है। वह बार-बार पैर पटकता। उन्हें लगा कि उसके पैरों में पीड़ा है। इसी असह्य दर्द के कारण वह कराह रहा है।

विज्ञापन


संत जी रामायण का पाठ कर रहे थे। उन्होंने पाठ बंद कर दिया और वृद्ध के पैरों को अपनी गोद में रखकर दबाने लगे। इसी बीच टिकट निरीक्षक वहां आ पहुंचा। वह संत जी का परम भक्त था। उसने उन्हें एक वृद्ध के पैर दबाते देखा, तो हतप्रभ रह गया। संत जी के चरण-स्पर्श कर बोला, बाबा, आप इतने बड़े संत होकर यह क्या कर रहे हैं?
विज्ञापन


संत सरयूदास जी बोले, भइया, मेरे भगवान श्रीराम तथा मेरे प्रिय ग्रंथ रामायण से मुझे यही शिक्षा मिली है कि दूसरे के दुख में हाथ बंटाना, उसका दुख-दर्द दूर करना वैष्णव का सर्वोपरि धर्म है। यह बूढ़ा पैरों में दर्द के कारण कराह रहा था। मेरे पैर दबाने से इसे नींद आ गई है। मुझे इससे आत्मसंतुष्टि मिल रही है।
विज्ञापन
विज्ञापन

यह सुनकर टिकट निरीक्षक भक्तिभाव से संत सरयूदास जी के चरणों में झुक गया।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

एड फ्री अनुभव के लिए अमर उजाला प्रीमियम सब्सक्राइब करें

Next Article

AU ऐप में पढ़ें

Followed