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सुरक्षित हिमालय, सुरक्षित भारत: अब समय आ गया है कि सभी सामूहिक रूप से इसकी रक्षा करें

Sudhir Kulkarni सुधींद्र कुलकर्णी
Updated Sat, 13 Feb 2021 08:34 AM IST
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Safe Himalaya Safe India now time to protect it collectively
हिमालय पर्वत (सांकेतिक तस्वीर) - फोटो : Pixabay

विगत दो फरवरी को बीजिंग में हिमालय की नाजुक पारिस्थितिकी के संरक्षण पर आयोजित एक अंतरराष्ट्रीय (आभासी) सम्मेलन में मैंने कहा था कि 'हिमालय संपूर्ण मानवता को मां प्रकृति का एक अमूल्य उपहार है। हजारों वर्षों से बर्फ से ढंके इन पहाड़ों ने हमारी रक्षा की है। अब समय आ गया कि हम सभी सामूहिक रूप से हिमालय की रक्षा करें।' इसके ठीक पांच दिन बाद उत्तराखंड बड़े पैमाने पर हिमालयी ग्लेशियर के फटने का शिकार बन गया। उस हादसे के चलते अब तक तीस से ज्यादा लाशें बरामद की गई हैं और 200 से ज्यादा लोग लापता हैं।


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हिमालय में यह कोई पहली प्राकृतिक आपदा नहीं है और न ही अंतिम। केदारनाथ में 2013 में आई बाढ़ की यादें अब भी ताजा हैं। हिंदू कुश हिमालय क्षेत्र में ऐसा कोई देश नहीं है, जो हाल के दिनों में आपदाओं की बढ़ती संख्या से मुक्त रहा हो। इसलिए, क्या यह क्षेत्र के सभी देशों की सामूहिक जिम्मेदारी नहीं है कि वे हिमालय की रक्षा के लिए एक साझा रणनीति तैयार करें? वास्तव में, क्या यह पूरे अंतरराष्ट्रीय समुदाय का कर्तव्य नहीं है कि वह इस साझा प्रयास का हिस्सा बने? आखिर, ग्लोबल वार्मिंग और जलवायु परिवर्तन से हिमालयी पर्यावरण को मुख्य खतरा है, जिसके लिए सभी प्रमुख कार्बन डाइऑक्साइड-उत्सर्जक अर्थव्यवस्थाएं जिम्मेदार हैं। ठीक इसी विषय पर आयोजित सम्मेलन में मुझे चीन के उप विदेश मंत्री लुओ झाओहुई ने आमंत्रित किया था, जो इसके आयोजक थे। उन्हें मैं तबसे जानता हूं, जब वह भारत में चीन के राजदूत थे। इस सम्मेलन में दुनिया भर के सरकारी और गैर-सरकारी विशेषज्ञों ने हिस्सा लिया था, जिसमें संयुक्त राष्ट्र के पूर्व महासचिव बान की मून भी शामिल थे।

सभी वक्ताओं के बीच पांच बिंदुओं पर व्यापक सहमति थी। पहली बात, हिमालय को पृथ्वी पर 'तीसरा ध्रुव' कहा जाता है, क्योंकि इन पहाड़ों पर 30,000 वर्ग मील से अधिक क्षेत्र में ग्लेशियर बर्फ है- जो उत्तरी ध्रुव (आर्कटिक) और दक्षिणी ध्रुव (अंटार्कटिका) को छोड़कर दुनिया में कहीं से भी सबसे ज्यादा है। हिमालयी ग्लेशियर एशिया की जीवनदायी 'जल मीनार' हैं। दक्षिण एशिया, चीन और दक्षिण-पूर्व एशिया के 100 करोड़ से ज्यादा लोग अपनी जल सुरक्षा, खाद्य सुरक्षा, ऊर्जा सुरक्षा-यानी अपने अस्तित्व के लिए सीधे उन पर निर्भर हैं। भले ही दुनिया इस सदी के अंत तक पूर्व-औद्योगिक स्तरों की तुलना में ग्लोबल वार्मिंग को 1.5 डिग्री सेल्सियस तक सीमित करने में सक्षम हो (जो बहुत ही महत्वाकांक्षी लक्ष्य है), हिमालय के ग्लेशियर के अब भी गर्म होने, पिघलने, टूटने और तबाही मचाने की आशंका है। इसलिए हम जो झेल रहे हैं, वह वैश्विक पारिस्थितिक आपातकाल से कम नहीं है।

दूसरी बात, कोई भी देश अकेले इस आपातकाल से नहीं निपट सकता। दुनिया की सभी बड़ी अर्थव्यवस्थाओं को-खासकर अमेरिका, चीन, भारत, जापान और यूरोपीय संघ-स्वच्छ, हरित और कम-कार्बन उत्सर्जन के लिए पेरिस जलवायु परिवर्तन समझौते के लक्ष्यों को प्राप्त करने के लिए मिलकर काम करना चाहिए। इसका मतलब है कि अमेरिका और चीन के बीच टकराव नहीं, बल्कि आर्थिक और राजनीतिक सहयोग की भावना होनी चाहिए। तीसरी बात, आर्थिक विकास का मौजूदा मॉडल, जिसने मनुष्य और प्रकृति के बीच संघर्ष और असहमति पैदा की है, न तो टिकाऊ है और न न्यायसंगत है। यह न गरीबी खत्म कर सकता है, न आर्थिक असमानता को कम कर सकता और न ही स्वास्थ्य एवं खुशहाली बढ़ा सकता है। इसलिए, दुनिया को औद्योगिक सभ्यता से पारिस्थितिक सभ्यता के नए युग में संक्रमण करना होगा।

चौथी बात, सभी प्रमुख अर्थव्यवस्थाओं को कार्बन तटस्थता की ओर बढ़ना चाहिए। इस संदर्भ में काठमांडू स्थित इंटरनेशल सेंटर फॉर इंटीग्रेटेड माउंटेन डेवलपमेंट के प्रमुख डॉ प्रेमा ग्यामश्तो ने अपने देश भूटान का प्रेरक उदाहरण दिया। यह छोटा-सा देश दुनिया का एकमात्र 'कार्बन नकारात्मक' देश है। इसके संविधान में कहा गया है कि इसकी 60 प्रतिशत भूमि हमेशा वनाच्छादित रहनी चाहिए। आश्चर्य नहीं कि 'सकल राष्ट्रीय खुशहाली' के मामले में भूटान दुनिया में पहले स्थान पर है।

पांचवीं बात, हिमालय के अलावा, दुनिया में अन्य जगहों पर अन्य संवेदनशील पारिस्थितिक केंद्र भी हैं, जहां जैव-विविधता को खतरा है। पारिस्थितिक संरक्षण विज्ञान अभी नया है। इसलिए, हिमालयी क्षेत्र और इसकी बहुमूल्य जैव-विविधता के संरक्षण के लिए वैज्ञानिकों, प्रौद्योगिकीविदों, पर्यावरणविदों और सरकारों के बीच व्यापक सहयोग की आवश्यकता है। हमारी संस्कृतियों और सभ्यताओं के प्राचीन ज्ञान को पुनर्जीवित करने की भी आवश्यकता है, जो हमें प्रकृति माता का सम्मान करने और लालच व उपभोक्तावाद
के लिए उसके कानूनों का उल्लंघन नहीं करना सिखाती है। इस तरह वैज्ञानिक, तकनीकी और आध्यात्मिक ज्ञान के आधार पर दुनिया के सभी देशों के बीच बेहतर नीति समन्वय होना चाहिए, खासकर हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र में।

जलवायु परिवर्तन और पारिस्थितिकी खतरे के विकास और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं पर पड़ने वाले प्रभाव के अलावा, हिमालयी क्षेत्र भू-राजनीतिक प्रतिद्वंद्विता के चलते गंभीर जोखिमों का सामना कर रहा है। मसलन, लद्दाख में भारत और चीन के बीच तथा कश्मीर में भारत-पाकिस्तान के बीच विवाद है। ये तीनों परमाणु हथियार संपन्न राष्ट्र हैं। सेनाएं पर्यावरण का ख्याल किए बिना सड़कें, हथियार डिपो, वायु क्षेत्र, सुरंग और भूमिगत मिसाइल बेस बनाती हैं। यदि ये दुश्मनी सहकारी संबंधों में तब्दील नहीं होती हैं, तो हिमालय भारी क्षति और नुकसान का सामना करने के लिए बाध्य है। इसलिए समय आ गया है कि हम सभी हिंदू कुश हिमालयी क्षेत्र को 'नो वार जोन' बनाने की मांग उठाएं।

भारत, चीन और पाकिस्तान के बीच सहयोग और सहमति के बिना यह संभव नहीं है। पूरे मानव इतिहास में, हिमालय शांति-उपदेश देने वाले ऋषियों, संतों, भिक्षुओं और राजाओं का निवास रहा है। मानव जाति के सबसे बड़े सत्य-सत्यम, शिवम, सुंदरम -को हिमालय के पहाड़ों की ऊंचाइयों से घोषित किया गया है। क्या वह समय नहीं आ गया है कि हम उसकी शिक्षा पर ध्यान दें और उसकी रक्षा के साथ अपनी भी रक्षा करें?

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