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दुखद है, पर नया नहीं

Sun, 12 Aug 2018 06:50 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 12 Aug 2018 06:50 PM IST
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Sad, but not new
मोदी-राहुल

पिछले सप्ताह कांग्रेस अध्यक्ष का भाषण सुनकर मुझे दुख भी हुआ और आश्चर्य भी। राहुल गांधी ने प्रधानमंत्री पर नया आरोप लगाया कि उनके कार्यकाल में देश की बेटियां सुरक्षित नहीं हैं, इसलिए सरकारी संस्थाओं में बच्चियों के साथ घिनौने शोषण की खबरें आ रही हैं। कांग्रेस अध्यक्ष दिल्ली में अपनी महिला कार्यकर्ताओं को संबोधित कर रहे थे। आगे उन्होंने यह भी कहा कि महिलाओं का सम्मान करना, उनको राजनीति में जगह देना कांग्रेस की सभ्यता रही है, लेकिन ऐसा संघ परिवार में नहीं होता। सो पिछले चार वर्ष में महिलाओं का शोषण बढ़ गया है।


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पटना और देवरिया के शरणगृहों में छोटी, बेसहारा बच्चियों के साथ जो हो रहा था, वास्तव में वह शर्मनाक और घिनौना था। लेकिन क्या राहुल जी मानते हैं कि ऐसी घटनाएं कांग्रेस के दौर में नहीं होती थीं? बिल्कुल होती थीं। राहुल जी, ऐसी घटनाएं दशकों से होती आई हैं। मुझे याद है कि दिल्ली के स्टेट्समैन अखबार में 1975 में रिपोर्टर बनने के बाद मैंने पहली बार सरकारी बालगृह में कदम रखा था और वहां के हालात देखकर फौरन समझ गई कि बच्चे क्यों दीवार लांघकर भाग जाया करते थे।

भाजपा के मुख्यमंत्रियों का दोष सिर्फ इतना है कि देश के आधे से ज्यादा राज्यों में शासन संभालने के बाद इनमें से एक ने भी अब तक इन संस्थाओं के तौर-तरीकों में परिवर्तन लाने का प्रयास नहीं किया है। मुंबई में भाजपा सरकार आने के बाद मैंने खुद मुख्यमंत्री के अफसरों का ध्यान डोंगरी स्थित चिल्ड्रेन होम की तरफ आकर्षित करने की कई बार कोशिश की है, लेकिन मेरे सारे प्रयास नाकाम रहे हैं। मेरी जान-पहचान के कई परिवार हैं, जिनको इस बेरहम महानगर के फुटपाथों पर कभी फूल बेचकर, कभी चाय, तो कभी कोई और छोटा-मोटा काम करके गुजारा करना पड़ता है। ये लोग इतने गरीब हैं कि झुग्गी बस्तियों में झुग्गी का किराया भी नहीं दे पाते हैं। सो जब काम पर निकलते हैं, तो अपने बच्चों को साथ रखने पर मजबूर होते हैं। इन बच्चों पर जब पुलिसवालों की नजर पड़ती है, तो वे इनको उठाकर डोंगरी वाले चिल्ड्रेन होम में पटक देते हैं, जो शरणगृह नहीं, बच्चों की जेल है। वहां हालात इतने खराब हैं कि बच्चे अपेक्षाकृत सड़कों पर ज्यादा सुरक्षित और सुखी हैं।

इन्हें छुड़ाने के लिए इनके गरीब माता-पिता अक्सर मेरी सहायता मांगने आते हैं। मैं इनके साथ जाती हूं उस बाल कल्याण समिति (सीडब्ल्यूसी) की अदालत में, जो इस बालगृह के अंदर है। वहां पांच वर्ष के बच्चों को भी चोर और आवारा समझा जाता है। मैंने कई बार समझाने की कोशिश की है कि छोटे बच्चे अपराधी नहीं माने जा सकते। लेकिन इसका कोई असर नहीं हुआ। बच्चों को छुड़ाना उतना ही मुश्किल है, जितना किसी अपराधी को जेल से छुड़ाना होता है। किसी सभ्य देश में बच्चों को अपराधी नहीं माना जाता है, माना जाता है कि छोटे बच्चे 'जुर्म' शब्द भी नहीं समझते हैं, लेकिन जब मैं एक तीन वर्ष की लड़की को छुड़ाने गई थी, तो सीडब्ल्यूसी की अदालत में एक महिला जज ने कहा, ‘मैंने दो साल के बच्चे भी देखे हैं, जो सोच-समझकर चोरी करते हैं।’

ऐसा राहुल जी आपके दौर में हुआ था। ऐसा होता आया है दशकों से। अफसोस आज सिर्फ इतना है हम जैसों को कि भाजपा के मुख्यमंत्रियों ने इस तरफ ध्यान देने की कोशिश तक नहीं की है। अब मोदी सरकार ने घोषित किया है कि नौ हजार सरकारी शरणगृहों की पूरी जांच होने वाली है। अच्छी बात है। आशा करते हैं कि इस तहकीकात के बाद मालूम हो जाएगा कि परिवर्तन कितना जरूरी है।

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