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राजनीति में बलिदान

Sun, 13 May 2018 06:19 PM IST
तवलीन सिंह
तवलीन सिंह Updated Sun, 13 May 2018 06:19 PM IST
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Sacrifice in politics
तवलीन सिंह
जब भी मैं किसी राजनेता के मुंह से यह एक शब्द सुनती हूं, तो यह मुझे बहुत तकलीफ देता है। यह शब्द है बलिदान, जो पिछले सप्ताह राहुल गांधी के मुंह से सुनने को मिला। कांग्रेस अध्यक्ष पत्रकारों को संबोधित कर रहे थे। जब किसी टीवी पत्रकार ने उनसे पूछा कि जब प्रधानमंत्री ने उनकी मातृभाषा का मजाक उड़ाया, तब उन्हें कैसा लगा। उन्होंने कहा कि उनकी मां बेशक इतालवी मूल की हैं, लेकिन उन्होंने  भारत के लिए बहुत बलिदान किया है।

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अगर राहुल जी का इशारा अपने पिता की हत्या की तरफ था, तो शायद वह भूल गए थे कि उस हत्या को श्रीलंका के तमिल आतंकवादियों ने अंजाम दिया था। उनकी दृष्टि में राजीव गांधी ने उनके साथ धोखा किया था। पहले उनको भारत में सेना द्वारा प्रशिक्षित किया, फिर उसी सेना को उनसे युद्ध करने जाफना भेजा। राजीव गांधी की हत्या दर्दनाक थी, गलत थी, लेकिन उसे सोनिया गांधी का ‘बलिदान’ कहना ठीक नहीं। 

सोनिया गांधी को जितना प्यार, सम्मान भारतवासियों ने दिया है, उसका हिसाब लगाना मुश्किल होगा। शायद ही कोई दूसरा देश होगा, जहां विदेशी मूल की एक महिला को देश के मतदाताओं ने राजनीतिक ऊंचाइयों तक इस तरह पहुंचने का मौका दिया हो। 2004 के लोकसभा चुनाव में जीत के बाद सोनिया जी ने प्रधानमंत्री बनना स्वीकार नहीं किया, क्योंकि उनकी ‘अंतरात्मा’ की आवाज ने उन्हें ऐसा करने से रोक दिया, लेकिन इस पद पर न बैठकर भी दस साल तक देश की असली प्रधानमंत्री वही थीं। दिल्ली के राजनीतिक गलियारों में चपरासी भी जानते थे कि अपने प्रिय डॉक्टर मनमोहन सिंह साहब सोनिया जी के आदेश के बिना कुछ नहीं कर सकते थे। अब तो यह भी मालूम हो गया है कि सोनिया जी के कहने पर प्रधानमंत्री फाइलें 10, जनपथ में भेजा करते थे।

खुद राज करने से पहले सोनिया जी प्रधानमंत्री निवास में बहु बनकर रहीं और फिर प्रधानमंत्री की पत्नी बनकर। भारत की राजनीति अगर वास्तव में उनको पसंद न होती, जैसा कि कहा जाता है, तो चुनावी राजनीति में वह खुद न आतीं और न ही अपने एकलौते बेटे को आने देतीं। सो बलिदान कैसा? राजनीति में आना अगर बलिदान होता, तो तकरीबन अपने सारे बड़े राजनेता तब तक राजनीतिक मैदान क्यों नहीं छोड़ते,  जब तक अपना चुनाव क्षेत्र बेटे या बेटी के हवाले नहीं कर पाते?

वास्तव में जनता की सेवा करने की भावना से जो राजनीति में आते हैं, उनके मुंह से आप कभी बलिदान शब्द नहीं सुनेंगे। यह शब्द उन्हीं से सुनने को मिलता है, जो राजनीति के ठाठ-बाट के इतने आदी हो जाते हैं कि जब मतदाता उनको इससे वंचित करते हैं, तो उनके लिए जीवन के सारे रंग फीके पड़ जाते हैं। कांग्रेस अध्यक्ष इनमें से हैं। सो पिछले सप्ताह उन्होंने स्वीकार किया कि 2019 में वह प्रधानमंत्री बनना चाहते हैं। जैसे अभी से तय हो गया हो कि कांग्रेस अगले लोकसभा चुनाव में सबसे बड़ी पार्टी बनकर आएगी। 

ऐसा बिल्कुल तय नहीं है राहुल जी और न ही अभी तय है कि जिन ‘सेक्यूलर’ राजनेताओं का सहारा लेकर आप सरकार बनाना चाहते हैं, वे आपका नेतृत्व स्वीकार करने को तैयार हैं। इन में से शायद ही कोई होगा, जो स्वयं प्रधानमंत्री बनना न चाहता हो। लेकिन अभी तक इनमें से किसी ने बलिदान की बातें नहीं की हैं। समझदार राजनेता जानते हैं कि जनता की सेवा को अगर बलिदान कहने लगेंगे, तो मतदाता फौरन पहचान लेंगे कि उनके इरादों में सेवा की भावना कम है और राज करने का शौक ज्यादा।
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