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रूस को कहां ले जा रहे हैं पुतिन!

Thu, 19 Dec 2013 11:45 AM IST
बिल केलर
बिल केलर Updated Thu, 19 Dec 2013 11:45 AM IST
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Russia Vs Europe

आज दुनिया को नेल्सन मंडेलाओं की जरूरत है, मगर उसके नसीब में व्लादिमीर पुतिन जैसे लोग हैं। दक्षिण अफ्रीकी नायक को तो कब्र में दफना दिया गया, लेकिन रूसी राष्ट्रपति एक नए सीमा शुल्क संघ के तहत, जो कुछ-कुछ सोवियत संघ की तरह है, पड़ोसी यूक्रेन को डरा-धमका रहे हैं और एक कट्टरपंथी राष्ट्रवादी के अधीन नई क्रेमलिन न्यूज एजेंसी का गठन कर राज्य संचालित मीडिया पर अपनी पकड़ मजबूत बनाना चाहते हैं।

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पुतिन का यह कदम अकेली घटना नहीं है। पिछले कुछ वर्षों में कई घटनाएं हुई हैं, जिन्होंने रूस को सामाजिक एवं सांस्कृतिक रूप से उदार पश्चिमी जगत से दूर किया है। जैसे समलैंगिकों को डराने वाले कानूनों को आधिकारिक मंजूरी देना, रूढ़िवादी चर्चों के खिलाफ प्रदर्शन करने वाले समूह के सदस्यों को जेल भेजना, पश्चिम समर्थित लोकतंत्र समर्थक संगठनों को विदेशी एजेंट बताना, राजद्रोह पर नया विस्तृत कानून बनाना और विदेशियों द्वारा गोद लेने पर सीमा तय करना।
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जो हो रहा है, वह पुतिन के राजनीतिक पंख पसारने से ज्यादा खतरनाक है। वह यूरोप के खिलाफ एक सीमारेखा तय करने की कोशिश कर रहे हैं, ताकि उस महाद्वीप के विभाजन को गहरा किया जा सके, जो दो विश्वयुद्धों का जन्मस्थल रहा है। पुतिन न केवल पश्चिम को अपने आधार से खिसकाने या घरेलू विपक्ष को शैशवावस्था में खत्म करने के लिए उकसा रहे हैं, बल्कि इतिहास को 25 साल पीछे ले जाने की कोशिश भी कर रहे हैं।
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पुतिन का उद्देश्य लंबे समय से पत्रकारों एव विद्वानों के लिए शोध का विषय रहा है, जिसके परिणामस्वरूप कुछ अतिवादी सिद्धांत प्रकट होते हैं- वह युद्धोत्तर लेनिनग्राद की खुरदरी जमीन पर सताए हुए व्यक्ति हैं, जिन्होंने केजीबी की वर्दी कभी न उतारने के लिए धारण की है। वह चिड़चिड़े स्वभाव के, व्यावहारिक राजनीति के उस्ताद हैं, जो दुनिया को षड्यंत्रों में लिप्त देखते हैं और उसी तरह से जवाब देते हैं। वह एक बेचैन रूसी आत्मा हैं, जो नास्तिकता, सहनशीलता और नैतिक पतन से दुखी हैं। वह वही सोवियत नागरिक हैं, जो आज भी शीत युद्ध से जूझ रहा है। वह खांटी आत्मप्रेमी हैं, जिन्हें घोड़े की पीठ पर बैठकर नंगी छाती वाली तस्वीर खिंचवाने की उनकी इच्छा से बखूबी समझा जा सकता है।

चूंकि उनका ताजा राष्ट्रपति काल 2012 में शुरू हुआ है, इसलिए वह संजीदगी से महसूस करते हैं कि पश्चिम में उन्हें वाजिब सम्मान नहीं मिला, क्योंकि वैश्विक मंच पर रूस के साथ बराबरी के बजाय एक पराजित राष्ट्र की तरह व्यवहार किया जाता है। उनके अपमान एवं नाराजगी ने उन्हें वैचारिक घृणा में डाल दिया है, जो विशेष रूप से सोवियत नहीं है, बल्कि गहरे रूप में रूसी हैं। पश्चिम के साथ उनकी शिकायत केवल राजनीतिक प्रभाव और आर्थिक लाभ को लेकर नहीं है, बल्कि उनकी नजर में बिल्कुल आध्यात्मिक है। पुतिन की जीवनी की लेखिका माशा गेसन कहती हैं, पुतिन रूस को दुनिया की पारंपरिक मूल्यों की राजधानी बनाना चाहते हैं।

आप हैरान हो सकते हैं कि क्या रूस के पुराने शुचितावाद का कीव की सड़कों पर मची उथल-पुथल से कोई संबंध है, जहां यूक्रेनी प्रदर्शनकारी यूरोपीय संघ से साझेदारी के इच्छुक हैं, ताकि वे पुतिन के प्रतिद्वंद्वी यूरेशियन संघ में शामिल होने का इरादा रखने वाले राष्ट्रपति यानुकोविच से मुकाबला कर सकें? यह आपकी सोच से भी परे है। रूसी संसद के अंतरराष्ट्रीय मामलों की समिति के अध्यक्ष एलेक्सी पुश्कोव की चेतावनी सुनिए कि यदि यूक्रेन यूरोपीय संघ में शामिल हो गया, तो यूरोपीय सलाहकार देश में घुसपैठ करेंगे और गे-कल्चर को बढ़ावा देंगे।

हाल ही में पुतिन ने न्यूज एजेंसी का पुनर्गठन कर इसका मुखिया पश्चिम विरोधी टीवी एंकर दमित्री किसल्योव को नियुक्त किया है, जिन्होंने कहा था कि जब समलैंगिक व्यक्ति मर जाएं, तो उनके अंगों को जलाकर दफना देना चाहिए, ताकि उसे दान में नहीं दिया जा सके।

पिछले दो वर्षों में पुतिन वैचारिक रूप से ज्यादा रूढ़िवादी बन गए हैं, जो यूरोप को ह्रासोन्मुख एवं रूढ़िवादी ईसाई तथा पूर्वी स्लाव दुनिया, जिससे रूस और यूक्रेन दोनों ताल्लुक रखते हैं, बनते देखना चाहते हैं। पुतिन के कार्यों की जटिलता को जानने के लिए इतिहास पर एक नजर डालना जरूरी होगा। जुलाई, 1989 में सोवियत राष्ट्रपति मिखाइल गोर्बाच्योव ने रूस को 'आम यूरोपीय घर (कॉमन यूरोपियन होम)' बताया था। लेकिन आज करीब 25 वर्षों बाद पुतिन उसी 'आम यूरोपीय घर' के विध्वंसक नजर आते हैं।

सच है कि हाल की मंदी और मितव्ययिता के दौर में यूरोप ने अपनी चमक खो दी है, लेकिन यह अब भी यूक्रेन के निष्प्रभावी एवं भ्रष्ट शासकों द्वारा संचालित पिटी हुई अर्थव्यवस्था से ज्यादा आकर्षक है। यूक्रेन के लोगों ने पश्चिम का अंग बनने की उम्मीद को कभी नहीं छोड़ा है।

पुतिन यूक्रेन पर कब्जा करने में सफल हो सकते हैं, लेकिन यह उनके लिए अफसोसनाक हो सकता है। जब वह अतीत पर नजर डालेंगे, तो उन्हें पूर्व शासक जोसफ स्टालिन के अनुभवों के बारे में पता चल सकता है, जिसने पोलैंड से पश्चिमी यूक्रेन छीन लिया था। स्टालिन हालांकि चालाक था, लेकिन अंततः उसने अपनी समस्याओं को बढ़ा लिया। उसने राजनीतिक रूप से अशांत यूक्रेनवासियों को सोवियत खेमे में लाकर अल्पसंख्यक यूक्रेनवासियों से अस्थिर रहने वाले पोलैंड को मजबूत एवं समरूप बनाकर छोड़ दिया।


उसी तरह यदि पुतिन ने रूसी बहुल गठबंधन में यूक्रेन को शामिल किया, तो उसे नए सदस्यों पर उपहारों की वर्षा कर जनभावना को शांत करना होगा, जो वह नहीं कर सकते। और फिर युवा यूक्रेनियों की नाराजगी भी तेजी से बढ़ेगी, जिसे दूर करने की कोशिश रूस की युवा पीढ़ी में असंतोष पैदा करेगी।

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