रूस-यूक्रेन युद्ध और महंगाई: काले से एक उजला निकला
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विस्तार
बीते वर्ष में मानवता कई चुनौतियों की गवाह बनी। दुनिया के सबसे बड़े अनाज और उर्वरक आपूर्तिकर्ताओं में से एक, यूक्रेन और रूस के युद्ध ने वैश्विक खाद्य और ऊर्जा आपूर्ति के समक्ष मुश्किलें पेश कीं, जिससे महंगाई में बेतहाशा बढ़ोतरी हुई। युद्धरत समूहों द्वारा खाद्य सहायता को रोके जाने से कुछ स्थानों पर सूखे जैसी स्थितियां पैदा होने लगी हैं, जिससे हॉर्न ऑफ अफ्रीका के कुछ हिस्सों में अकाल पड़ गया। भयावह मौसमी आपदाओं ने लगभग हर महाद्वीप पर विनाश के निशान छोड़े हैं। इन हालात में अधिकतर देशों ने खुद को कर्ज के जंजाल में फंसा पाया है। लेकिन इन बुरी खबरों की सतह के ठीक नीचे, कुछ अहम बदलाव भी हो रहे हैं, जिनमें वैश्विक व्यवस्था में स्थायित्व लाने की क्षमता है। ये बदलाव मानवता को वह ताकत देंगे, जिससे वह जलवायु परिवर्तन, प्रजातियों की विलुप्ति का संकट और खाद्य व ऊर्जा असुरक्षा की चुनौतियों से निपट सकेगी।
रूस व यूक्रेन के युद्ध की गूंज यूरोप के साथ उन सभी देशों में सुनी गई, जो प्राकृतिक गैस के लिए इस क्षेत्र पर निर्भर हैं। गौरतलब है कि जहां तेल उत्पादक देश और गैस की पैरवी करने वाले अधिक ड्रिलिंग के लिए बहस कर रहे हैं, वहीं, वैश्विक ऊर्जा निवेश का झुकाव स्वच्छ ऊर्जा की ओर हो रहा है। इसे पुतिन का प्रभाव ही कहा जाएगा कि इस युद्ध से दुनिया का ध्यान पेट्रोल-गैस के पारंपरिक जीवाश्म ईंधन से हटता हुआ विकल्पों पर जा रहा है।
इस संबंध में अंतरराष्ट्रीय ऊर्जा एजेंसी (आईईए) ने दो महत्वपूर्ण रिपोर्ट प्रकाशित की थीं जो अक्षय (नवीकरणीय) ऊर्जा के भविष्य की ओर इशारा करती हैं। सबसे पहले, आईईए ने नवीकरणीय ऊर्जा में होने वाली वृद्धि के अनुमान को 30 फीसदी तक संशोधित करते हुए उम्मीद जताई है कि दुनिया अगले पांच वर्षों में उतनी ही सौर और पवन ऊर्जा विकसित करेगी, जितनी उसने पिछले 50 वर्षों में की थी। यानी पचास साल का काम पांच साल में होगा। वहीं, दूसरी रिपोर्ट बताती है कि विश्व स्तर पर ऊर्जा का उपयोग प्रतिवर्ष 2% वृद्धि के साथ अधिक सुविचारित होता जा रहा है। हालांकि, अभी भी कुछ देश पारम्परिक जीवाश्म ईंधन संसाधनों का दोहन करने के लिए सौदों में उत्सुकता दिखा रहे हैं। आईईए ने चेतावनी दी है कि नए जीवाश्म ईंधन का उत्पादन अगले 20 वर्षों में मुनाफे का सौदा नहीं रहेगा। हालांकि, नवीकरणीय ऊर्जा के विकास में सबसे बड़ी बाधा यह है कि ऊर्जा नीति के जो फ्रेमवर्क, नियम और अनुदान व्यवस्थाएं बनी हुई हैं, वे उस पृष्ठभूमि में बनी थीं, जब पूरी ऊर्जा व्यवस्था जीवाश्म ईंधन आधारित थी। इन्हें बदलना होगा।
स्पष्ट संकेत हैं कि वर्ष 2023 में स्वच्छ ऊर्जा की व्यवस्था के लिए क्षमताओं के विकास पर अधिक ध्यान दिया जाएगा। अमेरिका में, हाल ही में पारित मुद्रास्फीति न्यूनीकरण अधिनियम और द्विदलीय अवसंरचना कानून से स्वच्छ ऊर्जा और प्रौद्योगिकी के क्षेत्र में सैकड़ों अरब डॉलर के निवेश की उम्मीद है।
नए वर्ष में जिन दूसरे व्यवस्थागत सुधारों वाले क्षेत्र पर सबकी नजर रहेगी, वे हैं अंतरराष्ट्रीय वित्त क्षेत्र। यह देखना खासा दिलचस्प होगा कि निर्धन देश किस तरह से अपनी ऊर्जा जरूरतों की व्यवस्था करते हैं और पर्यावरणीय आपदाओं के लिए खुद को तैयार करते हैं। समस्या यह है कि समृद्ध देशों ने ऊर्जा सशक्तीकरण के क्षेत्र में विकासशील देशों के उभरते बाजारों को वैसी मदद नहीं की है, जैसी कि उनसे दरकार थी। यही वजह है कि विकासशील देश अभी तक पारंपरिक ऊर्जा व्यवस्थाओं से उबर नहीं सके हैं। एक उम्मीद के तौर पर बारबाडोस की प्रधानमंत्री मिया मोटले ने अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों से आह्वान किया है कि वे थिंक टैंक और परोपकारी लोगों के साथ मिलकर काम करें और बदलाव को प्रेरित करने का साधन बनें। उनकी यह पहल इस निराशा से उपजी है कि अंतरराष्ट्रीय वित्त की वर्तमान व्यवस्था, खासकर, अंतरराष्ट्रीय मुद्रा कोष और विश्व बैंक समेत बहुध्रुवीय विकास बैंक जलवायु परिवर्तन संबंधी बढ़ती चुनौतियों से निपटने में नाकाफी साबित हो रहे हैं।
2023 में यह देखना भी दिलचस्प होगा कि जी-7 और जी-20 जैसे वैश्विक समूह अपनी वैश्विक आर्थिक नेतृत्व भूमिकाओं को किस तरह से पुनर्परिभाषित करते हैं। गौरतलब है कि इन समूहों के सदस्य ही अंतरराष्ट्रीय वित्तीय संस्थानों में भी प्रमुखता से काबिज हैं। और, यही देश पृथ्वी पर कार्बन डाई ऑक्साइड के सबसे बड़े उत्सर्जक भी हैं। नए वर्ष में भारत जी-20 समूह का अध्यक्ष बनेगा और फिर 2024 में उसका स्थान ब्राजील लेगा। वैश्विक संतुलन के लिहाज से इन देशों का नेतृत्व काफी महत्वपूर्ण साबित हो सकता है। 2023 में, छोटे राष्ट्रों को वैश्विक परिवर्तन के लिए तेजी से आगे बढ़ते हुए देखने की उम्मीद की जा सकती है। इसके अलावा, जैव विविधता पर संपन्न ऐतिहासिक समझौता 2023 के लिए उम्मीदें पैदा करता है। दुनिया की 30 फीसदी जैव विविधता के संरक्षण और दुनिया की 30% बंजर भूमि को बहाल करने के लिए देश सहमत हुए हैं। इससे हम 2023 को एक ऐसे साल के रूप में देखने उम्मीद कर सकते हैं, जब प्रकृति के खिलाफ हमारे युद्ध में शांति के अंकुर दिखने लगेंगे।
- रशेल काईट, डीन, टफ्ट्स यूनिवर्सिटी, अमेरिका