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संकटकाल : यूक्रेन पर हमारी चुप्पी, रूस के साथ लंबे युद्ध पर चीन की मौन स्वीकृति के मायने

Sun, 31 Jul 2022 09:02 AM IST
Ramchandra Guha रामचंद्र गुहा
Updated Sun, 31 Jul 2022 09:02 AM IST
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सार
Russia Ukraine Crisis : पुतिन की कार्रवाइयों को चीन के मौन समर्थन को देखते हुए, अगर हमारी सरकार ने हमले की अधिक स्पष्ट रूप से निंदा की होती, तो इससे पुतिन और उनके शासन पर वास्तविक दबाव बनाने में मदद मिल सकती थी। इससे विश्व मंच पर हमारी विश्वसनीयता भी बढ़ती।
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Russia Ukraine Crisis : Indias silence, Chinas tacit on long war
रूस-यूक्रेन युद्ध - फोटो : Twitter

विस्तार

Russia Ukraine Crisis : इस बात को पांच महीने हो गए, जब पहली बार रूसी टैंक यूक्रेन के क्षेत्र में भीतर तक घुस गए थे और जब रूसी विमानों ने यूक्रेन के कस्बों और गांवों में बमबारी की थी। यह एक बर्बर खूनी युद्ध है, जिसमें संभवतः 20,000 रूसी सैनिक मारे गए हैं और इससे दोगुना यूक्रेन के सैनिक मारे जा चुके हैं। काफी संख्या में नागरिक भी मारे गए हैं। लाखों यूक्रेनियों को अपने वतन से भागकर दूसरे देशों में अस्थायी या स्थायी रूप से शरण लेने को मजबूर होना पड़ा है।



यूक्रेन की अर्थव्यवस्था तबाह हो चुकी है; संघर्ष के खत्म होने के बाद उसे पहले जैसी स्थिति में आने में दशकों लगेंगे। आम रूसियों का जीवन और उनकी आजीविका पश्चिमी प्रतिबंधों और राष्ट्रपति पुतिन द्वारा छेड़े गए युद्ध के कारण बुरी तरह से प्रभावित हुई है। मैं रूसी सेना की बर्बरता, उनके द्वारा शहरों के पूरे ढांचे का विनाश, अस्पतालों और नागरिक ठिकानों पर उनकी बमबारी और यूक्रेनी महिलाओं पर उनके हमलों को देखकर भयभीत हो गया। 


भारत के नागरिक के रूप में इस संघर्ष को देखते हुए, मैं अपने देश की सरकार की भीरुता, हमले की निंदा करने से उसके इनकार और रूसी उत्पीड़न पर उसकी चुप्पी से निराश हूं। फरवरी के आखिर में जब युद्ध शुरू हुआ, तब शायद भारत सरकार के लिए 'इंतजार करो और देखो' की नीति अपनाना जरूरी था। यह स्पष्ट नहीं था कि युद्ध कितना लंबा चलेगा; यहां तक कि जल्द सुलह की बात भी की जा रही थी। और हजारों भारतीय विद्यार्थियों की यूक्रेन से घर वापसी स्वाभाविक रूप से शीर्ष प्राथमिकता थी। हालांकि जब मार्च के बाद अप्रैल आ गया और अप्रैल के बाद मई, और रूसी बलों की क्रूरता अधिक व्यापक हो गई, तब लंबे समय तक तटस्थ नहीं रहा जा सकता था।

यह स्पष्ट था कि पश्चिमी उकसावे की प्रतिक्रिया के रूप में आक्रमण की सभी बातें खोखली थीं। जिसमें जरा भी समझ होगी, तो वह देख सकता है कि पुतिन ने यह युद्ध यूक्रेन को नाटो का सदस्य बनने से रोकने के लिए नहीं, बल्कि इसलिए थोपा, ताकि वह उनके आगे न झुकने वाले यूक्रेनियों को सबक सिखा सकें। रूसी राष्ट्रपति को भ्रम है कि वह एक मध्ययुगीन सम्राट का आधुनिक अवतार हैं, जो रूस और उसके सभी पड़ोसियों को एक सर्वशक्तिमान नेता के अधीन एक राष्ट्र के भीतर एकजुट करना चाहता है। 

वह खुद और उनकी सेना इस कल्पना को हकीकत में बदलने की कोशिश कर रहे हैं, फिर यूक्रेनियों और यकीनन खुद रूसियों को भी इसकी चाहे जो कीमत चुकानी पड़े। (नवीनतम, लेकिन किसी भी तरह से पुतिन शासन की बर्बरता का यह कमतर उदाहरण नहीं है कि उसने यूक्रेन को गेहूं निर्यात करने की अनुमति देने वाले समझौते पर हस्ताक्षर करने के तुरंत बाद ओडेसा के बंदरगाह शहर पर बमबारी कर दी।)

राष्ट्रपति पुतिन मानते हैं कि यूक्रेनवासी वास्तव में रूसी हैं, चाहे उनका नाम कुछ और क्यों न हो, और इसलिए अपनी मातृभूमि से उनके एकीकृत होने की आवश्यकता है, जरूरत पड़े तो बल के दम पर भी। हालांकि, अगर इन पांच महीनों के युद्ध ने कुछ भी प्रकट किया है, तो यह है कि यूक्रेनियों के बीच राष्ट्रवाद की भावना वास्तव में बहुत गहरी है। रूसी साम्राज्यवाद के विरुद्ध यूक्रेनी प्रतिरोध को सक्रिय करने वाली राष्ट्रवाद की भावना ने कभी अमेरिकी साम्राज्यवाद के विरुद्ध वियतनाम के प्रतिरोध को प्रेरित करने वाली राष्ट्रवाद की भावना की याद दिला दी है।

यह याद करना समझदारी होगी कि भारत ने, जो कि खुद एक साम्राज्यवादी ताकत के खिलाफ अपने सफल स्वतंत्रता आंदोलन के रूप में एक देश के रूप में आजाद हुआ, वियतनामियों का तब तुरंत समर्थन किया था, जब उन्होंने पहले फ्रांस से और फिर अमेरिका से खुद की मुक्ति चाही थी। 1960 के दशक में अमेरिकी आर्थिक और सैन्य मदद- अकाल से निपटने के लिए आर्थिक मदद जब जरूरी थी- पर भारत की निर्भरता के बावजूद हमने अमेरिकी सरकार से यह कहने में हिचक नहीं दिखाई कि वह वियतनाम में जो कर रही है वह नैतिक रूप से गलत होने के साथ ही राजनीतिक रूप से नासमझी है।

एक और तुलना याद आती है, जो कि हमारे पड़ोस से जुड़ी है। 1970 में पूर्वी पाकिस्तान के लोगों का पश्चिमी पाकिस्तान के आर्थिक शोषण, सामाजिक भेदभाव और राजनीतिक उत्पीड़न के कारण तेजी से मोहभंग हो रहा था। उनका जन्मजात बंगाली राष्ट्रवाद उन्हें उन पर थोपी गई इस्लामी पहचान के खिलाफ मुखर कर रहा था। इस्लामाबाद स्थित सैन्य शासन ने विद्रोह को हिंसक रूप से दबाने की कोशिश की, जिससे भारत का हस्तक्षेप हुआ और बांग्लादेश का एक स्वतंत्र राष्ट्र के रूप में निर्माण हुआ।

रूसियों के लिए यूक्रेनी आज वैसे ही हैं, जैसे कभी पाकिस्तानियों के लिए  बांग्लादेशी थे-  अर्थात्, अपनी स्वयं की एक स्वतंत्र राष्ट्रीय पहचान वाले लोग, जो अपनी पहचान और अपने इतिहास को साझा करने (और प्रतिनिधित्व करने) का झूठा दावा करने वाले एक अधिक शक्तिशाली देश से खुद को मुक्त करने की मांग कर रहे हैं।

1970/71 में भारत ने पाकिस्तानी सेना को उसकी बर्बरता के लिए सही ढंग से फटकार लगाई, पूर्वी पाकिस्तान के लाखों शरणार्थियों को सही तरीके से शरण दी, और जब यह आवश्यक हो गया, तब उचित रूप से मामूली मात्रा में सैन्य बल का इस्तेमाल किया। चूंकि बांग्लादेश पड़ोस में था और यूक्रेन दूर है, इसलिए इस मामले में ऐसा व्यावहारिक रूप से संभव नहीं है। लेकिन क्या हमें दूसरे चरम पर जाना चाहिए और - यूक्रेन पर रूसी आक्रमण की निंदा करने का हमारा निरंतर इनकार— यूक्रेन में पुतिन और उनके लोगों के अपराधों में शामिल होना चाहिए?

यूक्रेन की घटनाओं के प्रति भारत सरकार की गहरी असंतोषजनक प्रतिक्रिया के पीछे के कारणों के बारे में अनुमान लगाया जा सकता है। शायद यह रूसी सैन्य आपूर्ति पर हमारी निर्भरता है, जो यहां काम कर रही है। शायद सत्ताधारी पार्टी के विचारकों को डर है कि अगर हम इस तथ्य पर जोर देते हैं कि यूक्रेनियों को एक स्वतंत्र राष्ट्र होने का अधिकार है, तो कुछ लोग कश्मीरियों या नगाओं के लिए भी ऐसा ही मामला बना सकते हैं। 

शायद सरकार को उम्मीद है कि  तेल के मामले में अपने विकल्प बढ़ाकर वह मुद्रास्फीति को नियंत्रण में रखने में सक्षम हो सकती है और इस तरह सामाजिक असंतोष को टाल सकती है। शायद, प्रधानमंत्री के रूप में आठ वर्षों के बाद भी नरेंद्र मोदी वास्तव में अंतरराष्ट्रीय भू-राजनीति की जटिलताओं से परिचित नहीं हैं, और इसलिए कोई कदम नहीं उठा सकते। कारण जो भी हों, यूक्रेन पर भारत सरकार की स्थिति - या अधिक सटीक रूप से, उसकी स्थिति की कमी- नैतिक रूप से अस्थिर और साथ ही राजनीतिक रूप से अविवेकपूर्ण है।

हमारे विदेशमंत्री ने कृष्णा मेनन की शैली में रूसी गैस खरीदने वाले यूरोपीय देशों पर पाखंड का आरोप लगाया है, जिन्होंने रूसी तेल खरीदने के लिए भारत की आलोचना की है। पश्चिम पाखंडी है, यह कोई ब्रेकिंग न्यूज नहीं है। हालांकि जो प्रासंगिक है, वह है भारत सरकार का दोहरापन। अगले महीने हम ब्रिटिश औपनिवेशिक शासन से अपनी स्वतंत्रता की पचहत्तरवीं वर्षगांठ मना रहे हैं। इस वर्षगांठ को मोदी सरकार द्वारा व्यापक रूप से प्रचारित किया गया है; ऐसा कोई सरकारी विज्ञापन, प्रेस विज्ञप्ति या ई-मेल नहीं है जिसमें यह उल्लेख न हो कि यह हमारी आजादी का अमृत महोत्सव है।

और फिर भी, राजनीतिक स्वतंत्रता के पचहत्तर साल के इस उल्लासपूर्ण उत्सव में भारत सरकार दुनिया में साम्राज्यवाद के निरंतर अस्तित्व को स्वीकार करने को खुद को तैयार नहीं कर सकी, जबकि यूक्रेन पर रूसी हमले से यह स्पष्ट है। यूक्रेनी लोगों के साहसी प्रतिरोध का समर्थन करने के लिए भारतीयों के पास पर्याप्त नैतिक कारण है। और मैं यह भी मानता हूं कि ऐसा करने के लिए एक राजनीतिक वजह भी है। हमारे आर्थिक और जनसांख्यिकीय आकार, और हमारी सैन्य और अन्य संपत्तियों के कारण, भारत को पिछले कुछ समय से वैश्विक सार्वजनिक मामलों में काफी गंभीरता से लिया गया है। 

पुतिन की कार्रवाइयों को चीन के मौन समर्थन को देखते हुए, अगर हमारी सरकार ने हमले की अधिक स्पष्ट रूप से निंदा की होती, तो इससे पुतिन और उनके शासन पर वास्तविक दबाव बनाने में मदद मिल सकती थी। भारत का समर्थन निर्णायक रूप से रूस के खिलाफ आख्यान को बदल सकता था, उन्हें बातचीत की मेज पर आने के लिए मजबूर कर सकता था। अगर हमारी सरकार ने इस तरह से काम किया होता, तो यह विश्व मंच पर हमारी विश्वसनीयता को बढ़ाता और साथ ही तकलीफों को समाप्त करने में मदद करता।

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