रूमानियत से जुदा गांव का सच
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केरल में पैदा हुए जिनेट मैथ्यू दो दशक से भी अधिक समय से बंगलूरू में रबड़ उत्पादों का व्यवसाय सफलतापूर्वक चला रहे हैं। मगर, प्रतिस्पर्धा बढ़ी, तो उनके लिए मुश्किलें बढ़ने लगी। खर्चे आसमान छूने लगे, जबकि मुनाफा कम हो रहा था। आखिरकार उन्होंने शहर में अपनी संपत्ति बेचकर दूरदराज के एक गांव में बसने का फैसला कर लिया। शहर की संपत्ति बेचने से मिले पैसों से उन्हें गांव में जमीन का बड़ा टुकड़ा सस्ते में मिल गया, जिस पर उन्होंने रबड़, फल और सब्जियां उगानी शुरू कर दी। हालांकि एक कारोबारी के लिए परिवार के साथ गांव में बसने का फैसला बेहद कठिन था। लेकिन ऐसा करने के लिए जिन चीजों से उनका आत्मविश्वास बढ़ा, उनमें कृषि के प्रति लगाव, ग्रामीण परिवेश से प्यार, नवोन्मेषी विचार और मार्केटिंग में उनकी महारत की भूमिका काफी अहम थी। दुर्भाग्यवश, मैथ्यू को इनमें से कोई बचा नहीं सका और उन्हें अपने इस ग्रामीण प्रयोग के फैसले पर पछतावा होने लगा। कर्ज चुकाने के लिए उन्हें जमीन बेचनी पड़ गई और बच्चों की बेहतर शिक्षा के लिए वह शहर में दोबारा बसने की संभावनाएं तलाशने में जुट गए। वह जोर देते हुए कहते हैं,'ग्रामीण इलाके में रहने वाले व्यक्ति के लिए खेती ही सबसे बेहतर विकल्प है और यदि कृषि फायदेमंद न हो, तो कोई क्या कर सकता है? सरकारी मदद के बिना टिकाऊ खेती की उम्मीद करना बेमानी है।'
भारतीय संदर्भ में शहरों से गांवों की ओर पलायन बेहद कम ही देखने के मिलता है। ज्यादातर मामलों में, जिनके बारे में मेरा व्यक्तिगत अनुभव है, गांवों की ओर पलायन करने वाले लोग एक अस्थायी पड़ाव के बाद शहरों की ओर वापस लौट आए। इनमें से कइयों की शिकायत होती है कि कोई सामान्य कूरियर भी गांव में पहुंचने में हफ्तों लग जाते हैं। बहुत से गांवों में सामान्य स्वास्थ्य सुविधाएं भी नहीं मिल पातीं। यह कहने वालों की भी कमी नहीं है कि ग्रामीण इलाके में कुछ दिन तक ठहरने के बाद गांवों के बारे में सारे रोमांटिक आइडिया धराशायी हो सकते हैं।
हमारे योजनाकार, नीति निर्माता और मीडिया स्पष्ट रूप से शहरों के प्रति पक्षपाती नजर आते हैं। ज्यादातर मामलों में गांवों को हमारे मुख्यधारा के मीडिया में गलत कारणों से ही जगह मिल पाती है। एक अनुमान के मुताबिक, मुख्यधारा के मीडिया में ग्रामीण मुद्दों को महज पांच प्रतिशत जगह मिल पाती है। आजादी के बाद से अब तक सरकारें किसानों और ग्रामीण लोगों के हालात में सुधार को ही अपना प्रमुख मिशन बताती रही हैं। मगर, इसे विडंबना ही कहा जाएगा कि यह मिशन अब तक अधूरा ही है। मौजूदा दौर में भी ग्रामीण भारत में निर्धनता और दरिद्रता की तस्वीर झलकती है। इस बात से इन्कार नहीं किया जा सकता कि भारत ने कृषि क्षेत्र में काफी तरक्की की है। खाद्यान्नों के मामले में हरित क्रांति ने आत्मनिर्भर बना दिया है। बहुत सी नई खोजें भी हुई हैं, इसके बावजूद कृषि क्षेत्र में सुधार की गति एवं तकनीकी तरक्की काफी धीमी है।
राष्ट्रीय नमूना सर्वेक्षण के आंकड़ों के मुताबिक, ग्रामीण भारत के दो तिहाई परिवार खाना पकाने के लिए जलावन की लकड़ी पर निर्भर हैं। इसके उलट आज इतने ही शहरी परिवार एलपीजी का इस्तेमाल कर रहे हैं। पिछले साल की पहली छमाही तक खुले में शौच जाने वाले ग्रामीण परिवारों की संख्या 52.1 प्रतिशत थी। 2011 की जनगणना के मुताबिक, ग्रामीण साक्षरता दर 70 प्रतिशत से कम है। जबकि शहरी साक्षरता दर 84.11 प्रतिशत है। हमारे शहर समस्याओं से जुदा हों, ऐसा नहीं है। भारत की करीब 31 प्रतिशत आबादी शहरों में रहती है। 2030 तक शहरी आबादी की भारतीय जनसंख्या में हिस्सेदारी 40 प्रतिशत और जीडीपी में शहरी क्षेत्र का योगदान 75 प्रतिशत होने का अनुमान है। इस बात को ध्यान में रखते हुए शहरों के ढांचागत, संस्थागत, सामाजिक एवं आर्थिक विकास के लिए नरेंद्र मोदी की सरकार ने स्मार्ट सिटी मिशन शुरू किया है। इसमें कोई शक नहीं कि इन उपायों को अमली जामा पहनाया जा सका, तो लोगों के जीवन स्तर की गुणवत्ता में सुधार होगा और विकास को गति मिलेगी।
ऐसे में सवाल उठ सकता है कि क्या स्मार्ट विलेज मिशन भी इसी तर्ज पर गांवों में तरक्की के द्वार खोल देगा? बिल्कुल नहीं! 1991 की औद्योगिक नीति में प्रस्तावित भारी निवेश और बुनियादी ढांचा परियोजनाओं ने भारत में आर्थिक उदारीकरण का मार्ग प्रशस्त किया था, जो आगे चलकर विशेष आर्थिक क्षेत्र (सेज) की स्थापना का अग्रदूत बन गया। हम देख चुके हैं कि निजी उद्यमी और बडे़ कारोबारियों ने किस तरह गरीब किसानों से जमीन हड़पने की रणनीति अपनाई और उन्हें शहरों के बाहरी इलाकों की ओर पलायन करने के लिए विवश कर दिया। जमीन हड़पने की ज्यादातर घटनाओं में सरकारें कारोबारियों का समर्थन कर रही थीं, या फिर मूकदर्शक बनी हुई थीं। जबकि केंद्रीय सरकार इन विशेष आर्थिक क्षेत्रों में किसानों को हिस्सेदार बनाकर टकराव और पलायन को रोक सकती थी। पर ऐसा नहीं किया जा सका। हमें यह समझना होगा कि पिछड़े ग्रामीण इलाकों में बड़े पैमाने पर ढांचागत निवेश किसानों को उनकी जड़ों से उखाड़ने और उनकी सीमित आय को बंद करने का ही कारण बनेगा। आज किसानों की प्राथमिक जरूरतों में क्रेडिट तक आसान पहुंच, बाजार एवं तकनीक हैं, जिससे उनकी आय में वृद्धि हो सकती है और उनकी मुश्किलें दूर हो सकती हैं। ग्रामीण इलाकों में कृषि के अलावा अन्य क्षेत्रों में सरकार को रोजगार के अवसरों की ओर ध्यान देना चाहिए। हालांकि, स्मार्ट शहरों के कुछ तत्व, जैसे डिजिटल एवं सूचना तकनीक को गांवों में बड़े पैमाने पर प्रसारित होना ही चाहिए, क्योंकि इससे सेवाओं की पहुंच आसान होगी और किसानों का बाजार से जुड़ाव बढ़ेगा। जिनेट मैथ्यू का उदाहरण देते हुए मैं अपनी बात को खत्म करुंगा, जिन्होंने एक जापानी खरीदार को देसी प्रजाति के दो किलो केले बेचकर तीन हजार रुपये कमाए, मगर स्थानीय बाजार में उन्हें बमुश्किल चालीस रुपये ही मिलते।
-लेखक वरिष्ठ पत्रकार है