फ्री ई-पेपर
पर्सनलाइज़्ड फ़ीड
पर्सनलाइज़्ड नोटिफ़िकेशन
चलते-फिरते ख़बरें
लॉयल्टी रिवॉर्ड्स
डाउनलोड करें

सब्सक्राइब करें
Hindi News ›   Columns ›   Opinion ›   Rupak jyoti borah editorial, migrant workers can change picture of country

तस्वीर बदल सकते हैं प्रवासी भारतीय

Mon, 15 Jun 2020 07:39 AM IST
संजीव कुमार झा रूपकज्योति बोरा
रूपकज्योति बोरा Published by: संजीव कुमार झा Updated Mon, 15 Jun 2020 07:39 AM IST
विज्ञापन
Rupak jyoti borah editorial, migrant workers can change picture of country
प्रवासी मजदूर(file photo) - फोटो : पीटीआई

भारत ने कोरोना वायरस के चलते विदेशों में फंसे अपने नागरिकों को बचाने के लिए स्वदेश वापसी के प्रयास  (वंदे भारत मिशन) की शुरुआत की है। अब तक करीब 45,000 लोगों को वापस भारत लाया गया है।  यह अपने आप में एक बड़ा काम है। प्रवासी भारतीयों की इतनी बड़ी आबादी को स्वदेश वापस लाने के बाद एक दूसरी चुनौती सामने आने वाली है। नई दिल्ली को विदेशों से आने वाले धन (रेमिटेंस) के प्रवाह में कमी का सामना करना पड़ेगा।


loader

विश्व बैंक के अनुसार, महामारी के चलते इस वर्ष विदेशों से आने वाला धन 2019 के 83 अरब डॉलर से 23 फीसदी घटकर इस साल 64 अरब डॉलर रह जाने की आशंका है। 2018 में विदेशों से आने वाली धनराशि भारत के कुल सकल घरेलू उत्पाद का 2.9 फीसदी थी। संयुक्त राष्ट्र के आर्थिक और सामाजिक मामलों के विभाग (डीईएसए) द्वारा पिछले साल जारी किए गए आंकड़ों के अनुसार, विदेशों में काम करने वाले लोगों की आबादी के हिसाब से भारत 1.75 करोड़ लोगों के साथ शीर्ष पर था।

इनमें से लगभग 85 लाख लोग खाड़ी देशों में कार्यरत हैं, जो भारत में विदेशों से आने वाले धन का आधे से ज्यादा हिस्सा भेजते हैं। भारत में प्रवासियों के परिवारों के भोजन, शिक्षा, चिकित्सा और अन्य जरूरतों के लिए यह धनराशि बहुत महत्वपूर्ण है। इस धनराशि में कमी का सीधा असर देश की अर्थव्यवस्था पर पड़ेगा, क्योंकि यह राशि अधिकांश प्रवासी भारतीय परिवारों के लिए आय का अतिरिक्त और महत्वपूर्ण स्रोत है।

विदेशों से आने वाली धनराशि में यह गिरावट तब आई है, जब नई दिल्ली महामारी के कारण लगाए गए लॉकडाउन के चलतेअपनी अर्थव्यवस्था को पटरी पर लाने की कोशिश कर रही है। विदेशों में काम करने वाले जिन भारतीयों को वापस लाया जा रहा है, उन्हें देश में रोजगार की जरूरत होगी, जो कि एक बड़ी चुनौती होगी, क्योंकि भारत समेत दुनिया भर के बाजारों में सुस्ती के कारण नियोक्ता रोजगार में कटौती कर रहे हैं।

इसके अलावा, भारत को सबसे पहले अपने घरेलू कार्यबल को रोजगार देने के लिए भी रास्ते तलाशने होंगे। केरल जैसे राज्यों में इसका आर्थिक असर सबसे ज्यादा गंभीर होगा, क्योंकि उस राज्य में विदेशों से सबसे ज्यादा धन आता है। इसके अलावा भारतीय उड्डयन उद्योग भी प्रभावित होगा, क्योंकि कुछ कंपनियां भारत और खाड़ी देशों के बीच यात्री विमान से काफी मुनाफा कमाती हैं। कोरोना का प्रकोप अमेरिका में रहने वाले प्रवासी भारतीयों को भी प्रभावित करेगा, क्योंकि वहां बहुत ज्यादा मौतें हुई हैं। अमेरिका में भारी संख्या में लोग बेरोजगार हुए हैं, जिससे चुनावी वर्ष में प्रवासी भारतीय समुदाय भी प्रभावित होंगे, क्योंकि राष्ट्रपति ट्रंप पर पहले अमेरिकी नागरिकों को नौकरी देने का दबाव होगा।

यह भी अनुमान है कि कोरोना संक्रमण से सर्वाधिक प्रभावित दस देशों में करीब बीस लाख प्रवासी भारतीय रहते हैं। भारत छोटी अवधि में तो विदेशों से आने वाले धन की कमी की भरपाई नहीं कर पाएगा, लेकिन वह विदेशों से आए कामगारों में से कुछ को उच्च-मूल्य वाले क्षेत्रों में लाभकारी रूप से नियोजित करने में सफल हो सकता है। यह नई दिल्ली को प्रतिभा पलायन को पलटने का मौका भी देगा, जिसने अतीत में भारत से कुछ अत्यंत प्रतिभाशाली लोगों को दूर किया है। पर नई दिल्ली इस काम को कैसे अंजाम दे सकती है? हालांकि कोरोना को खत्म करने की तुलना में इस काम में ज्यादा समय लगेगा, पर इसके लिए पहले ऑटोमोबाइल, तेल और गैस, निर्माण और बंदरगाहों जैसे क्षेत्रों में घरेलू क्षमता बढ़ानी होगी।

एक विस्तृत अध्ययन करना होगा कि किन क्षेत्रों में अधिकांश प्रवासी भारतीयों की नौकरियां गई हैं, फिर देश के भीतर ही इन क्षेत्रों में इनके लिए ज्यादा रोजगार सृजित करने के प्रयास करने होंगे। पाकिस्तान और बांग्लादेश जैसे अन्य दक्षिण एशियाई देश भी कोरोना के कारण विदेशों से आने वाले धन में कमी से प्रभावित हुए हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने पहले ही सार्क देशों के नेताओं के साथ वीडियो कॉन्फ्रेंसिंग में कोविड-19 से जंग के लिए आपातकालीन कोष में एक करोड़ डॉलर देने का वादा किया है। नई दिल्ली विदेशों से आने वाले धन में गिरावट से निपटने और प्रवासी श्रमिकों को रोजगार देने के लिए सार्क देशों से तालमेल बिठा सकती है।

इसके अलावा भारत को आईटी क्षेत्र में अपनी ताकत का लाभ उठाना होगा। उन राज्यों को विशेष सहायता दी जा सकती है, जो विदेशों में नौकरी गंवा चुके भारतीयों को रोजगार देने के लिए आईटी क्षेत्र में रोजगार पैदा कर सकते हैं। निर्माण क्षेत्र में भारत के बाहर बड़ी संख्या में भारतीय काम करते हैं। अगर उन्हें भारत में रोजगार देना है, तो इन्फ्रास्ट्रक्चर सेक्टर को बड़े पैमाने पर बढ़ावा देना होगा। इस पहल में, नई दिल्ली को जापान जैसे मित्र देशों के साथ मिलकर काम करने की भी जरूरत होगी, जो पहले से ही ऐसी परियोजनाओं में भारत की मदद कर रहा है। एक चीज जो इस समय भारत के हित में है, वह है तेल की कम कीमत।

इस वित्त वर्ष में भारत के तेल आयात बिल में 10 प्रतिशत की कमी आने की उम्मीद है, क्योंकि कच्चे तेल की कीमत कम हो गई हैं। यदि तेल की कीमत मौजूदा दर पर ही रही, तो भारत तेल आयात बिल पर भारी बचत कर सकता है। इससे विदेश से आने वाले धन में कमी की भरपाई करने में मदद मिलेगी। हालांकि करने की तुलना में कहना आसान होता है। इसके लिए केंद्र एवं राज्य सरकारों के बीच तालमेल होना भी जरूरी है।

भले ही अभी देश का पूरा ध्यान कोरोना के खिलाफ जंग पर टिका है, पर दीर्घावधि में नई दिल्ली को अन्य देशों में प्रतिभा पलायन को रोकने के लिए खाका तैयार करना पड़ेगा, खासकर ज्यादा कुशल श्रमिकों के मामले में। विदेशों से लौटे कुशल श्रमिक भारत की उद्यमशीलता बढ़ाने में मदद कर सकते हैं। प्रधानमंत्री मोदी ने हाल ही आत्मनिर्भर भारत का आह्वान किया है और इस मिशन में विदेशों से लौटे प्रवासी भारतीयों की भूमिका अहम होगी। विदेशों से आने वाले धन में कमी वरदान में बदल सकती है।
-लेखक जापान फोरम फॉर स्ट्रैटेजिक स्टडीज, टोक्यों में वरिष्ठ शोध अध्येता हैं।

विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन
विज्ञापन

Next Article

Followed