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92,651 करोड़ रुपये की बर्बादी
श्ांकर अय्यर
Updated Mon, 30 Jan 2017 08:02 PM IST
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शंकर अय्यर
- फोटो : AU
सियासी चक्र में यह ऐसा समय है, जब राजनीतिक वर्ग किसानों के हित के नाम पर नारों की बुआई कर रहे हैं, ताकि वोट की फसल काटी जा सके।जिन पांच राज्यों में विधानसभा चुनाव हैं, उनमें देश के खाद्यान्न उत्पादक उत्तर प्रदेश और पंजाब, कृषि संबंधी मनीऑर्डर व्यवस्था पर चलने वाला उत्तराखंड, गोवा तथा मणिपुर शामिल हैं, जहां की ग्रामीण अर्थव्यवस्था नकदी फसल और बागवानी पर निर्भर है। यह बजट का समय है, जब सरकार इससे जुड़ी समस्याओं का रास्ता निकालने की कोशिश करती है, यानी जब बेहतर परिणाम के वायदे के साथ खर्च का खाका प्रस्तुत किया जाता है। यह बड़े सुधारों का मौसम भी है और यह देखने का भी कि आखिर आंकड़े क्या बोलते हैं।
राजनीति और अर्थव्यवस्था के इस संगम में चलिए आंकड़ों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाते हैं। जरा इस पर गौर करें- 92,651 करोड़ रुपये। खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय के मुताबिक, यह फसल तैयार होने के बाद होने वाला कुल नुकसान है। खेत से बाजार के बीच इतनी कीमत के अनाज, दूध, मांस, फल, सब्जियां, नकदी फसल और तिलहन बर्बाद हो जाते हैं। किसान सालाना इतना धन इसी तरह गंवा देते हैं, इसे सिवाय व्यवस्थागत काहिली के और क्या कहेंगे।
आखिर 92,651 करोड़ रुपये का मतलब क्या है? यदि इस धन को देश में प्रति व्यक्ति सालाना आय के पैमाने पर देखें, तो इसे एक करोड़ लोगों में बांटा जा सकता है। यदि ग्रामीण भारत में प्रति व्यक्ति आय को देखें, तो यह दो करोड़ ग्रामीण भारतीयों की औसत सालाना आय है। यही नहीं, ग्रामीण पंजाब की प्रति व्यक्ति आय के रूप में देखें, तो तीन करोड़ लोगों में और ग्रामीण उत्तर प्रदेश के पैमाने पर देखें, तो चार करोड़ लोगों में इसे बांटा जा सकता है। वृहत रूप में देखें, तो 92,651 करोड़ रुपये देश के सकल घरेलू उत्पाद का 0.6 फीसदी है। यह 2016-17 के बजट में पूरे ग्रामीण क्षेत्र को आवंटित किए गए 87,765 करोड़ रुपये से अधिक है। यह प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के लिए किए गए आवंटन का चार गुना है। यह केंद्र द्वारा कृषि के लिए किए गए कुल आवंटन 35,984 करोड़ रुपये से तो अधिक है ही, यह 2015-16 और 2016-17 के लिए मनरेगा पर हुए खर्च से भी ज्यादा है।
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फसल को होने वाले नुकसान की यह दुखद कथा साठ के दशक से चली आ रही है। 1968 में डॉ. वीजी पनसे की अगुआई वाली एक समिति ने आकलन किया था कि 9.33 फीसदी खाद्यान्न खेतों से निकलकर बर्बाद हो जाता है, जिसके पीछे चूहे और कीट जैसे कारण भी थे। इसके बाद खाद्यान्न बचाओ अभियान शुरू हुआ और कई समीक्षाएं की गईं, कई समितियां बनीं, लेकिन फसल कटाई, फसल सुखाने, प्रसंस्करण, संग्रहण और परिवहन में होने वाला नुकसान जारी रहा। बात सिर्फ खाद्यान्न, दालों और तिलहन की नहीं है। खेतिहर उत्पाद से संबंधित हर क्षेत्र जानी-पहचानी समस्या से ग्रस्त है और विडंबना यह है कि इसका समाधान पता है, पर यह कायम है।
सर्वाधिक प्रभावित होने वाले उत्पाद फलों और सब्जियों को ही देखिए। सीफेट का अध्ययन बताता है कि 40,811 करोड़ रुपये के फल-सब्जियां बर्बाद हो जाती हैं। यह बर्बादी फसल और उसकी भौगोलिक स्थिति पर भी निर्भर करती है। सड़ने वाले 5 से 16 प्रतिशत उत्पाद जैसे फल और सब्जियां खेत या फिर रास्ते में ही नष्ट हो जाते हैं। फलों और सब्जियों की इस तरह बर्बादी को रोकने के लिए कई अध्ययन हुए हैं, कमेटियां और आयोग तक बनाए गए हैं।
खांटी सरकारी तौर-तरीका यह है कि जब कोई समस्या हो, तो उसके समाधान के लिए आयोग गठित कर दिया जाए। 1988 में राजीव गांधी सरकार ने एक अच्छा रास्ता निकाला और खाद्य प्रसंस्करण नामक एक नए मंत्रालय का गठन किया गया। यह उम्मीद की गई थी कि यह मंत्रालय कृषि उत्पादों के जीवन और उनका मूल्य बढ़ाने में मदद करेगा। दो दशक बाद भी सिर्फ 2.2 फीसदी कृषि उत्पाद का ही प्रसंस्करण होता है और नुकसान का आंकड़ा 58,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। 2015 में सिर्फ 6.5 उत्पादों का ही प्रसंस्करण हो सका था।
पिछले वर्ष 23 सांसदों ने सरकार से पूछा था कि फसल तैयार होने के बाद होने वाला कुल नुकसान कितना है और इसे रोकने के लिए उसने क्या किया है। छह पृष्ठों में इसका जवाब दिया गया, जिसमें जो कदम उठाए गए, उनके ब्योरे थे। इसमें खाद्य प्रसंस्करण को मजबूत बनाने के लिए केंद्र द्वारा राज्यों को दी गई मदद भी शामिल थी। 2013-14 और 2016-17 के बीच कोल्ड चेन (प्रशीतन शृंखला) और संरक्षित रखने संबंधी ढांचे के लिए 475 करोड़ रुपये दिए गए। इसी तरह से दिसंबर में 12 सांसदों ने सरकार से पूछा कि खाद्य प्रसंस्करण के लिए राज्यों को कितना धन दिया गया। जवाब था, अप्रैल, 2013 से दिसंबर, 2016 के बीच 410 करोड़ रुपये जारी किए गए।
पैसा महत्वपूर्ण है, मगर यही पर्याप्त नहीं है। दरअसल राज्य सरकारें इस मुद्दे पर काहिली बरतती आई हैं, नतीजतन बर्बादी जारी है। असल में इसका समाधान इस क्षेत्र को मुक्त करने, उत्पादकों को सीधे खरीदारों से जोड़ने और फार्म टू फोर्क इकोनॉमी ( खेत से सीधे उपभोक्ता तक जोड़ने वाली अर्थव्यवस्था) को मजबूत करने में निहित है। बिना किसी व्यावहारिक पीपीपी (पब्लिक, प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल के, जिसमें किसानों की बाजार तक सीधे पहुंच हो, खरीदारों को लचीले विकल्प उपलब्ध हों और सरकार का सक्रिय नियंत्रण हो, खाद्य प्रसंस्करण का विचार कारगर नहीं हो सकता।
यह समस्या सबसे बड़े राजनीतिक वर्ग किसानों और उपभोक्ताओं से जुड़ी हुई है। यह ऐसा राजनीतिक अर्थशास्त्र है, जहां खाद्य संबंधी महंगाई मौसमी है और जहां पार्टियां प्याज के दाम बढ़ने से सत्ता गंवा देती हैं। मुद्दा 92,651 करोड़ रुपये के नुकसान को रोकने, किसानों की आय बढ़ाने और उपभोक्ताओं को बेहतर उत्पाद उपलब्ध कराने से जुड़ा है।
-लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।
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राजनीति और अर्थव्यवस्था के इस संगम में चलिए आंकड़ों को सार्वजनिक विमर्श का हिस्सा बनाते हैं। जरा इस पर गौर करें- 92,651 करोड़ रुपये। खाद्य प्रसंस्करण मंत्रालय के मुताबिक, यह फसल तैयार होने के बाद होने वाला कुल नुकसान है। खेत से बाजार के बीच इतनी कीमत के अनाज, दूध, मांस, फल, सब्जियां, नकदी फसल और तिलहन बर्बाद हो जाते हैं। किसान सालाना इतना धन इसी तरह गंवा देते हैं, इसे सिवाय व्यवस्थागत काहिली के और क्या कहेंगे।
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आखिर 92,651 करोड़ रुपये का मतलब क्या है? यदि इस धन को देश में प्रति व्यक्ति सालाना आय के पैमाने पर देखें, तो इसे एक करोड़ लोगों में बांटा जा सकता है। यदि ग्रामीण भारत में प्रति व्यक्ति आय को देखें, तो यह दो करोड़ ग्रामीण भारतीयों की औसत सालाना आय है। यही नहीं, ग्रामीण पंजाब की प्रति व्यक्ति आय के रूप में देखें, तो तीन करोड़ लोगों में और ग्रामीण उत्तर प्रदेश के पैमाने पर देखें, तो चार करोड़ लोगों में इसे बांटा जा सकता है। वृहत रूप में देखें, तो 92,651 करोड़ रुपये देश के सकल घरेलू उत्पाद का 0.6 फीसदी है। यह 2016-17 के बजट में पूरे ग्रामीण क्षेत्र को आवंटित किए गए 87,765 करोड़ रुपये से अधिक है। यह प्रधानमंत्री ग्राम सड़क योजना के लिए किए गए आवंटन का चार गुना है। यह केंद्र द्वारा कृषि के लिए किए गए कुल आवंटन 35,984 करोड़ रुपये से तो अधिक है ही, यह 2015-16 और 2016-17 के लिए मनरेगा पर हुए खर्च से भी ज्यादा है।
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फसल को होने वाले नुकसान की यह दुखद कथा साठ के दशक से चली आ रही है। 1968 में डॉ. वीजी पनसे की अगुआई वाली एक समिति ने आकलन किया था कि 9.33 फीसदी खाद्यान्न खेतों से निकलकर बर्बाद हो जाता है, जिसके पीछे चूहे और कीट जैसे कारण भी थे। इसके बाद खाद्यान्न बचाओ अभियान शुरू हुआ और कई समीक्षाएं की गईं, कई समितियां बनीं, लेकिन फसल कटाई, फसल सुखाने, प्रसंस्करण, संग्रहण और परिवहन में होने वाला नुकसान जारी रहा। बात सिर्फ खाद्यान्न, दालों और तिलहन की नहीं है। खेतिहर उत्पाद से संबंधित हर क्षेत्र जानी-पहचानी समस्या से ग्रस्त है और विडंबना यह है कि इसका समाधान पता है, पर यह कायम है।
सर्वाधिक प्रभावित होने वाले उत्पाद फलों और सब्जियों को ही देखिए। सीफेट का अध्ययन बताता है कि 40,811 करोड़ रुपये के फल-सब्जियां बर्बाद हो जाती हैं। यह बर्बादी फसल और उसकी भौगोलिक स्थिति पर भी निर्भर करती है। सड़ने वाले 5 से 16 प्रतिशत उत्पाद जैसे फल और सब्जियां खेत या फिर रास्ते में ही नष्ट हो जाते हैं। फलों और सब्जियों की इस तरह बर्बादी को रोकने के लिए कई अध्ययन हुए हैं, कमेटियां और आयोग तक बनाए गए हैं।
खांटी सरकारी तौर-तरीका यह है कि जब कोई समस्या हो, तो उसके समाधान के लिए आयोग गठित कर दिया जाए। 1988 में राजीव गांधी सरकार ने एक अच्छा रास्ता निकाला और खाद्य प्रसंस्करण नामक एक नए मंत्रालय का गठन किया गया। यह उम्मीद की गई थी कि यह मंत्रालय कृषि उत्पादों के जीवन और उनका मूल्य बढ़ाने में मदद करेगा। दो दशक बाद भी सिर्फ 2.2 फीसदी कृषि उत्पाद का ही प्रसंस्करण होता है और नुकसान का आंकड़ा 58,000 करोड़ रुपये तक पहुंच गया है। 2015 में सिर्फ 6.5 उत्पादों का ही प्रसंस्करण हो सका था।
पिछले वर्ष 23 सांसदों ने सरकार से पूछा था कि फसल तैयार होने के बाद होने वाला कुल नुकसान कितना है और इसे रोकने के लिए उसने क्या किया है। छह पृष्ठों में इसका जवाब दिया गया, जिसमें जो कदम उठाए गए, उनके ब्योरे थे। इसमें खाद्य प्रसंस्करण को मजबूत बनाने के लिए केंद्र द्वारा राज्यों को दी गई मदद भी शामिल थी। 2013-14 और 2016-17 के बीच कोल्ड चेन (प्रशीतन शृंखला) और संरक्षित रखने संबंधी ढांचे के लिए 475 करोड़ रुपये दिए गए। इसी तरह से दिसंबर में 12 सांसदों ने सरकार से पूछा कि खाद्य प्रसंस्करण के लिए राज्यों को कितना धन दिया गया। जवाब था, अप्रैल, 2013 से दिसंबर, 2016 के बीच 410 करोड़ रुपये जारी किए गए।
पैसा महत्वपूर्ण है, मगर यही पर्याप्त नहीं है। दरअसल राज्य सरकारें इस मुद्दे पर काहिली बरतती आई हैं, नतीजतन बर्बादी जारी है। असल में इसका समाधान इस क्षेत्र को मुक्त करने, उत्पादकों को सीधे खरीदारों से जोड़ने और फार्म टू फोर्क इकोनॉमी ( खेत से सीधे उपभोक्ता तक जोड़ने वाली अर्थव्यवस्था) को मजबूत करने में निहित है। बिना किसी व्यावहारिक पीपीपी (पब्लिक, प्राइवेट पार्टनरशिप) मॉडल के, जिसमें किसानों की बाजार तक सीधे पहुंच हो, खरीदारों को लचीले विकल्प उपलब्ध हों और सरकार का सक्रिय नियंत्रण हो, खाद्य प्रसंस्करण का विचार कारगर नहीं हो सकता।
यह समस्या सबसे बड़े राजनीतिक वर्ग किसानों और उपभोक्ताओं से जुड़ी हुई है। यह ऐसा राजनीतिक अर्थशास्त्र है, जहां खाद्य संबंधी महंगाई मौसमी है और जहां पार्टियां प्याज के दाम बढ़ने से सत्ता गंवा देती हैं। मुद्दा 92,651 करोड़ रुपये के नुकसान को रोकने, किसानों की आय बढ़ाने और उपभोक्ताओं को बेहतर उत्पाद उपलब्ध कराने से जुड़ा है।
-लेखक वरिष्ठ पत्रकार हैं।